सुरक्षा खर्च में 1% की बढ़ोतरी से अपराध दर में 0.36% की गिरावट: एसबीआई की शोध रिपोर्ट

The CSR Journal Magazine
भारत में अपराध और विकास दर का आपस में गहरा संबंध है। एसबीआई की हालिया स्टडी के अनुसार, अगर सुरक्षा खर्च में 1% की वृद्धि की जाती है, तो कुल अपराध दर में लगभग 0.36% की कमी आती है। यह स्पष्ट करता है कि सुरक्षा पर होने वाला अधिक खर्च अपराध को कम कर सकता है। ऐसे में एक मजबूत सुरक्षा तंत्र अपराध को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

सीसीटीवी का प्रभाव

जिन क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे अधिक संख्या में लगे हैं, वहां अपराध के मामले भी कम देखने को मिलते हैं। यह सीसीटीवी सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण पहलू को दर्शाता है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों का प्रभाव भी सुरक्षा खर्च पर निर्भर करता है। यह आंकड़े यह सुझाते हैं कि जहां महिलाओं के खिलाफ अधिक अपराध होते हैं, वहां कार्यबल में उनकी भागीदारी भी कम होती है।

उम्मीद की किरण

हाल के सालों में अपराध दर में गिरावट आई है। 2024 में देश में 58.86 लाख संज्ञेय अपराध दर्ज किए गए, जो पिछले साल की तुलना में 6% कम है। ऐसे में अखिल भारतीय अपराध दर प्रति लाख आबादी पर 448.3 से घटकर 418.9 हो गई है। इसका मतलब यह है कि देश में सुरक्षा में सुधार हो रहा है।

राज्यों के बीच अपराध के आंकड़े

राज्यों के बीच तुलना करते समय केरल में प्रति लाख आबादी पर सबसे अधिक 1,389 संज्ञेय अपराध दर्ज हुए। वहीं, नगालैंड में यह आंकड़ा प्रति लाख 61.6 रहा। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भी 1.5% की गिरावट आई है, जो सकारात्मक संकेत है। 2023 में 4.48 लाख मामलों से घटकर 2024 में 4.41 लाख रह गए हैं।

महिलाओं की श्रम शक्ति पर असर

अपराधिक मामलों में गिरावट ने देश की अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है। आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा, बिहार, पंजाब और बंगाल जैसे राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। इससे वहां महिला श्रम बल में भागीदारी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। राजस्थान एक अपवाद है, जहां क्राइम रेट ज्यादा है, फिर भी महिला वर्कफोर्स 50% से अधिक है।

छिपे हुए आंकड़े और असली तस्वीर

कुछ राज्यों में अपराध की संख्या अधिक होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं होने से आंकड़े कम दिखते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, घरेलू हिंसा के कम से कम 5.94 लाख मामले पुलिस के पास पहुंचने चाहिए थे, लेकिन एनसीआरबी के रिकॉर्ड में केवल 1.21 लाख पीड़ित ही दर्ज हुए हैं। इसका मतलब यह है कि केवल 20.4% मामले ही पुलिस के पास पहुंचे हैं।

बंगाल का विशिष्ट केस

बंगाल में लापता बच्चों का हिस्सा 16.11% और हिंसक अपराधों में 14.45% है। हालांकि, चोरी या सेंधमारी जैसे मामलों के आंकड़े कम दर्ज हैं, जिससे संकेत मिलता है कि कई मामलों की रिपोर्ट नहीं की गई है। इस प्रकार के आंकड़े सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता को भी दर्शाते हैं।

महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा की चुनौती

हालिया आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 13,396 है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि राजधानी महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा के

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