सैलरी बढ़ी, लेकिन जेब खाली! 1 करोड़ के बाद टैक्स का गणित कैसे बदल देता है खेल

The CSR Journal Magazine

1 करोड़ की कमाई के बाद क्यों बढ़ जाता है टैक्स का बोझ? मामूली सैलरी हाइक भी बन सकती है बड़ा नुकसान, समझिए सरचार्ज और मार्जिनल रिलीफ का पूरा गणित

हर नौकरीपेशा व्यक्ति चाहता है कि उसकी सैलरी बढ़े और हाथ में ज्यादा पैसा आए। लेकिन भारत के इनकम टैक्स सिस्टम में एक ऐसी स्थिति भी आती है, जहां थोड़ी सी अतिरिक्त कमाई कई बार फायदे की बजाय नुकसान का कारण बन जाती है। खासतौर पर उन लोगों के लिए जिनकी टैक्सेबल इनकम 1 करोड़ रुपये के आसपास पहुंचती है। ऐसे मामलों में केवल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त कमाई पर टैक्स का बोझ 1 लाख रुपये से भी ज्यादा बढ़ सकता है। सुनने में यह अजीब लग सकता है, लेकिन इसकी वजह इनकम टैक्स में लागू होने वाला “सरचार्ज” और उससे जुड़ा टैक्स स्लैब है।

1 करोड़ रुपये पार करते ही बदल जाता है टैक्स सिस्टम

भारत में आयकर केवल बेस टैक्स तक सीमित नहीं है। इसके ऊपर सरकार सरचार्ज और 4 प्रतिशत हेल्थ एंड एजुकेशन सेस भी वसूलती है। व्यक्तिगत करदाताओं के लिए मौजूदा नियमों के अनुसार-
  • 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक की टैक्सेबल इनकम पर 10% सरचार्ज लगता है।
  • 1 करोड़ रुपये से अधिक की इनकम पर यह सरचार्ज बढ़कर 15% हो जाता है।
यानी जैसे ही किसी व्यक्ति की आय 1 करोड़ रुपये की सीमा पार करती है, उसके कुल टैक्स पर अतिरिक्त 5 प्रतिशत सरचार्ज लागू हो जाता है। यही बदलाव टैक्स देनदारी को अचानक काफी बढ़ा देता है।

आखिर सरचार्ज होता क्या है?

सरचार्ज को आसान भाषा में “टैक्स पर अतिरिक्त टैक्स” कहा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति का बेस टैक्स 20 लाख रुपये बनता है और उस पर 10% सरचार्ज लागू होता है, तो उसे अतिरिक्त 2 लाख रुपये सरचार्ज के रूप में देने होंगे। इसके बाद कुल टैक्स और सरचार्ज पर 4% सेस भी लगाया जाता है। यानी जैसे-जैसे सरचार्ज बढ़ता है, कुल टैक्स बोझ तेजी से ऊपर चला जाता है।

उदाहरण से समझिए कैसे बढ़ता है टैक्स

मान लीजिए किसी व्यक्ति की टैक्सेबल इनकम ठीक 1 करोड़ रुपये है। इस स्थिति में उसका कुल टैक्स, सरचार्ज और सेस मिलाकर लगभग 29.51 लाख रुपये बन सकता है। अब अगर उसकी आय केवल 1 लाख रुपये बढ़कर 1.01 करोड़ रुपये हो जाए, तो वह अगले सरचार्ज स्लैब में पहुंच जाएगा। ऐसे में 15% सरचार्ज लागू होगा और कुल टैक्स लगभग 30.55 लाख रुपये तक पहुंच सकता है।यानी-
  • अतिरिक्त कमाई: 1 लाख रुपये
  • अतिरिक्त टैक्स: करीब 1.04 लाख रुपये
इसका मतलब यह हुआ कि व्यक्ति ने ज्यादा कमाया जरूर, लेकिन उसका लगभग पूरा फायदा टैक्स में चला गया।

ऐसा क्यों होता है?

इसकी सबसे बड़ी वजह सरचार्ज स्लैब में अचानक होने वाला बदलाव है। 1 करोड़ रुपये की सीमा पार करते ही टैक्स पर लगने वाला सरचार्ज 10% से बढ़कर 15% हो जाता है। क्योंकि यह सरचार्ज कुल टैक्स राशि पर लगाया जाता है, इसलिए टैक्स देनदारी में बड़ा उछाल दिखाई देता है।

क्या है मार्जिनल रिलीफ?

सरकार ने टैक्सपेयर्स को राहत देने के लिए “मार्जिनल रिलीफ” का प्रावधान रखा है। मार्जिनल रिलीफ का मतलब यह है कि अतिरिक्त टैक्स, अतिरिक्त आय से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानी अगर किसी व्यक्ति की इनकम थोड़ी सी बढ़ी है, तो टैक्स में भी सीमित बढ़ोतरी होनी चाहिए। इसी नियम के कारण 1 करोड़ रुपये से थोड़ा ऊपर कमाने वाले लोगों को कुछ राहत मिल जाती है।

फिर भी क्यों नहीं मिलती पूरी राहत?

हालांकि मार्जिनल रिलीफ टैक्स का बोझ कम करती है, लेकिन पूरी राहत नहीं देती। इसकी वजह यह है कि 4 प्रतिशत हेल्थ एंड एजुकेशन सेस पर मार्जिनल रिलीफ लागू नहीं होता। इसलिए अंतिम टैक्स राशि फिर भी काफी ज्यादा दिखाई देती है।यही कारण है कि कई मामलों में अतिरिक्त कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स में चला जाता है और हाथ में बहुत कम पैसा बचता है।

हाई इनकम वालों को क्यों करनी चाहिए पहले से टैक्स प्लानिंग?

टैक्स विशेषज्ञों का मानना है कि जिन लोगों की आय 1 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच रही है, उन्हें पहले से टैक्स प्लानिंग शुरू कर देनी चाहिए। ऐसे लोगों के लिए Corporate NPS एक प्रभावी विकल्प माना जाता है।

Corporate NPS कैसे देता है राहत?

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80CCD(2) के तहत यदि कंपनी कर्मचारी के National Pension System (NPS) अकाउंट में योगदान करती है, तो उस राशि पर टैक्स छूट मिल सकती है। नियमों के अनुसार-
  • कंपनी बेसिक सैलरी का 14% तक NPS में योगदान कर सकती है।
  • यह राशि टैक्सेबल इनकम को कम करने में मदद करती है।
  • इससे कर्मचारी ऊंचे सरचार्ज स्लैब में जाने से बच सकता है।

उदाहरण से समझिए टैक्स बचाने का तरीका

मान लीजिए किसी कर्मचारी की टैक्सेबल इनकम 1.01 करोड़ रुपये है। अगर कंपनी की ओर से 1 लाख रुपये Corporate NPS में जमा किए जाते हैं, तो उसकी प्रभावी टैक्सेबल इनकम फिर 1 करोड़ रुपये के आसपास आ सकती है। इससे:
  • व्यक्ति 15% सरचार्ज से बच सकता है
  • 10% सरचार्ज स्लैब में बना रह सकता है
  • कुल टैक्स बोझ कम हो सकता है
यानी सही टैक्स प्लानिंग कई बार लाखों रुपये की बचत करा सकती है।

किन लोगों पर सबसे ज्यादा असर?

इस तरह की टैक्स स्थिति का सबसे ज्यादा असर इन लोगों पर पड़ता है-
  • कॉर्पोरेट सेक्टर के वरिष्ठ कर्मचारी
  • CXO और उच्च वेतन पाने वाले प्रोफेशनल्स
  • बोनस आधारित इनकम वाले कर्मचारी
  • बड़े शहरों में काम करने वाले हाई-सैलरी प्रोफेशनल्स
  • कंसल्टेंट और फ्रीलांसर
विशेषज्ञों का कहना है कि साल के अंत में मिलने वाला बोनस या ESOP इनकम कई बार व्यक्ति को अचानक अगले सरचार्ज स्लैब में पहुंचा देता है।

टैक्स एक्सपर्ट्स क्या सलाह दे रहे हैं?

विशेषज्ञों के मुताबिक हाई इनकम वाले लोगों को-
  • साल की शुरुआत से टैक्स प्लानिंग करनी चाहिए
  • NPS और अन्य टैक्स-सेविंग विकल्पों का इस्तेमाल करना चाहिए
  • बोनस स्ट्रक्चर की पहले से योजना बनानी चाहिए
  • टैक्सेबल इनकम को सरचार्ज सीमा के आसपास सावधानी से मैनेज करना चाहिए

टैक्स प्लानिंग में जरूरी समझदारी

1 करोड़ रुपये की आय पार करना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि माना जाता है, लेकिन इसके साथ टैक्स की जटिलताएं भी बढ़ जाती हैं। कई बार मामूली सैलरी हाइक भी टैक्स का बड़ा झटका बन जाती है। ऐसे में सिर्फ ज्यादा कमाई करना ही काफी नहीं, बल्कि समझदारी से टैक्स प्लानिंग करना भी उतना ही जरूरी हो जाता है।
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