राम मंदिर विवाद में नया मोड़, चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा, लेकिन क्या इससे खत्म होंगे सवाल?

The CSR Journal Magazine
राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। दोनों के इस्तीफे ऐसे समय आए हैं जब एसआईटी की जांच जारी है और दान व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि अब तक दर्ज एफआईआर में चंपत राय का नाम नहीं है, जबकि उनसे एसआईटी पूछताछ कर चुकी है और उनके कामकाज को लेकर सवाल उठे हैं। वहीं विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी कहा है कि जांच के दायरे से कोई भी बाहर नहीं होना चाहिए और यदि जरूरत हो तो चंपत राय तथा अनिल मिश्रा की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

क्या योगी सरकार के कहने पर हुआ चंपत राय का इस्तीफा?

विपक्ष अब सवाल उठा रहा है कि इस्तीफा केवल नैतिक जिम्मेदारी है या जांच का दबाव। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि जांच निष्पक्ष तरीके से चल रही है और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा है कि कार्रवाई शुरू हो चुकी है और जन आस्था से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।  फिलहाल यह कहना कि किसी को राजनीतिक संरक्षण मिला या इस्तीफा दिलाया गया, उपलब्ध सार्वजनिक तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। जांच अभी जारी है और आगे की कार्रवाई एसआईटी की रिपोर्ट तथा उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगी।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 306 का प्रावधान

BNS की धारा 306 के अनुसार, किसी क्लर्क या कर्मचारी द्वारा मालिक की संपत्ति की चोरी एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना जाता है। ऐसे मामले में यदि अपराध साबित होता है, तो आरोपी को जुर्माने के साथ-साथ सात साल तक की सजा भी हो सकती है। यह धाराएं ऐसे मामलों में सख्ती से लागू होती हैं।

धारा 316 और 317 की गंभीरता

भरोसा तोड़ने के अपराध को लेकर BNS की धारा 316 में कड़ी सजा का प्रावधान है। इसमें सरकारी कर्मचारियों या बैंकरों जैसे भरोसेमंद व्यक्तियों के लिए पांच साल तक की सजा या जुर्माना और 10 साल तक की जुर्माना काटने का प्रावधान है। वहीं, धारा 317 चोरी की संपत्ति के लेन-देन और निपटान से संबंधित है, जिसमें गंभीर मामलों में आजीवन कारावास या तीन साल तक की सजा हो सकती है।

साजिश और अन्य धाराएं

BNS की धारा 61 के तहत आपराधिक साजिश रचने वालों की परिभाषा स्पष्ट की गई है। यदि कोई व्यक्ति गंभीर साजिश में शामिल पाया जाता है तो उसे मौत की सजा, उम्रकैद या दो साल की कठोर सजा का संभावित दंड मिल सकता है। मामूली साजिश के मामलों में छह महीने तक की जेल भी हो सकती है।

प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट का मामला

इस मामले में प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धारा 13 (1) (a) के तहत भी FIR दर्ज की गई है। इसके अंतर्गत यदि कोई अपराध का आरोप लगता है, तो संबंधित संपत्ति और तारीख का स्पष्ट उल्लेख होना आवश्यक है। दोषी पाए जाने पर आरोपी को चार से दस साल तक की कठोर सजा मिल सकती है, जिसके साथ जुर्माना भी है।

चंदा चोरी का विवाद और SIT की रिपोर्ट

मंदिर में चंदा चोरी का यह विवाद 7 जून को सामने आया था। इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 13 जून को एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने का अनुरोध किया। SIT ने 23 जून को अपनी शुरुआती रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसके बाद FIR दर्ज की गई और आरोपियों की गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू हुई।

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