बंगाल में गूंजा राजस्थान का नाम अशोक कीर्तनिया बने कैबिनेट मंत्री, प्रवासी राजस्थानी नेताओं का बढ़ा दबदबा

The CSR Journal Magazine
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद नई सरकार के गठन के साथ राजस्थान मूल के नेताओं की चर्चा तेज हो गई है। सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी कैबिनेट में अशोक कीर्तनिया को अहम जिम्मेदारी दी गई है। राजस्थान से जुड़े प्रवासी परिवार से आने वाले अशोक कीर्तनिया की जीत और मंत्री पद ने बंगाल में बसे राजस्थानी समाज का राजनीतिक कद बढ़ा दिया है। भाजपा की रणनीति के तहत मैदान में उतारे गए 9 राजस्थानी मूल के उम्मीदवारों में से 5 की जीत ने इस समुदाय को नई पहचान दिलाई है।

सुवेंदु सरकार में राजस्थान मूल के नेता की एंट्री

पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद शनिवार को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में भव्य शपथ ग्रहण समारोह आयोजित हुआ। राज्यपाल आर.एन. रवि ने भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। नई सरकार के गठन के साथ सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हुई, वह था अशोक कीर्तनिया। अशोक कीर्तनिया को सुवेंदु सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। बंगाल की राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ और मतुआ समुदाय के बीच प्रभाव को देखते हुए भाजपा ने उन्हें सरकार में अहम भूमिका दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक नेता को मंत्री बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भाजपा का सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने वाला बड़ा संदेश भी है। बंगाल में लंबे समय से सक्रिय प्रवासी राजस्थानी समाज के लिए यह पल गौरव का माना जा रहा है। राजस्थान से जुड़े परिवार का बेटा अब बंगाल सरकार में मंत्री बन गया है, जिससे प्रवासी समुदाय में उत्साह का माहौल है।

राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी हैं अशोक कीर्तनिया की जड़ें

अशोक कीर्तनिया का परिवार मूल रूप से राजस्थान से जुड़ा हुआ है। दशकों पहले उनका परिवार व्यापार और रोजगार के सिलसिले में बंगाल आकर बस गया था। हालांकि जीवन और राजनीति बंगाल में बीती, लेकिन उनका राजस्थान से सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव हमेशा बना रहा। राजनीतिक मंचों पर भी वे कई बार अपनी राजस्थानी विरासत का जिक्र कर चुके हैं। बंगाल में रहने वाले प्रवासी राजस्थानियों के बीच उनकी खास पहचान है। यही वजह है कि उनकी जीत को केवल एक राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि राजस्थानियों की सामाजिक ताकत के रूप में भी देखा जा रहा है। अशोक कीर्तनिया उन पांच प्रवासी राजस्थानी उम्मीदवारों में शामिल हैं जिन्होंने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की। उन्होंने बनगांव उत्तर (SC) सीट से लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। इस बार उन्होंने करीब 40 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज कर अपनी मजबूत पकड़ साबित कर दी। उनकी यह जीत भाजपा के लिए इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि सीमावर्ती क्षेत्रों और मतुआ समुदाय में पार्टी को मजबूत करने में उनकी भूमिका काफी प्रभावशाली रही है।

मतुआ समुदाय में मजबूत पकड़, भाजपा को मिला बड़ा फायदा

अशोक कीर्तनिया बंगाल के प्रभावशाली दलित नेताओं में गिने जाते हैं। खासतौर पर मतुआ समुदाय के बीच उनकी गहरी पैठ है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा की इस बड़ी जीत में मतुआ वोट बैंक का निर्णायक योगदान रहा और इस समर्थन को मजबूत करने में अशोक कीर्तनिया की अहम भूमिका रही। सीमावर्ती इलाकों में वे लंबे समय से सामाजिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क के जरिए सक्रिय रहे हैं। उन्होंने नागरिकता, पहचान और सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार समुदाय की आवाज उठाई। इसी कारण मतुआ समाज के बीच उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई। भाजपा ने इस चुनाव में सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उन्हें प्रमुख चेहरों में शामिल किया था। पार्टी को उम्मीद थी कि अशोक कीर्तनिया का प्रभाव सीमावर्ती सीटों पर फायदा दिलाएगा और परिणामों ने इसे सही साबित कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कैबिनेट में उन्हें जगह देकर भाजपा ने साफ संकेत दिया है कि पार्टी अब बंगाल में क्षेत्रीय और सामाजिक नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।

भाजपा का ‘राजस्थानी कार्ड’ बना चुनावी मास्टरस्ट्रोक

इस चुनाव में भाजपा ने एक नई रणनीति के तहत राजस्थान मूल के 9 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इनमें से 5 उम्मीदवारों की जीत ने यह साबित कर दिया कि बंगाल में बसे प्रवासी राजस्थानी अब राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगे हैं। जीत दर्ज करने वाले नेताओं में विजय ओझा, भरत कुमार झंवर, अजय कुमार पोद्दार, राजेश कुमार और अशोक कीर्तनिया शामिल हैं। इन नेताओं ने अलग-अलग सीटों पर मजबूत प्रदर्शन कर भाजपा को बड़ी बढ़त दिलाई। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, बंगाल के व्यापारिक और शहरी इलाकों में राजस्थानी समाज की मजबूत आर्थिक और सामाजिक पकड़ रही है। भाजपा ने पहली बार इस वर्ग को संगठित राजनीतिक प्रतिनिधित्व देकर बड़ा दांव खेला और उसे सफलता भी मिली। अशोक कीर्तनिया का मंत्री बनना अब केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बंगाल की राजनीति में प्रवासी राजस्थानियों के बढ़ते प्रभाव और भाजपा की नई सामाजिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

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