पैठणी का बारो पंजा बना ग्लोबल फैशन का नया सितारा, भारतीय विरासत ने जीता दुनिया का दिल

The CSR Journal Magazine

जब विरासत बनी वैश्विक फैशन की पहचान: पैठणी का ‘बारो पंजा’ मोटिफ अब इंटरनेशनल कॉउचर का नया आकर्षण

भारत की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा एक बार फिर वैश्विक फैशन जगत के केंद्र में है। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध पैठणी बुनाई का प्रतिष्ठित ‘बारो पंजा’ (Baro Panja) मोटिफ आज अंतरराष्ट्रीय (Haute Couture) डिजाइनों को नई पहचान दे रहा है। हाल ही में उद्योगपति मुकेश अंबानी की पुत्री ईशा अंबानी के चर्चित कॉउचर लुक में इस पारंपरिक पैठणी प्रेरणा की झलक देखने को मिली, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय विरासत केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक फैशन की दिशा भी तय कर रही है।

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान

भारतीय वस्त्र कला सदियों से अपनी बारीक कारीगरी, रंगों और प्रतीकों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रही है। पैठणी साड़ी, जिसे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है, आज भी हाथकरघे पर महीनों की मेहनत से तैयार की जाती है। इसके जरीदार पल्लू, मोर, कमल, तोता, बेल-बूटों और विशेष रूप से बारो पंजा जैसे मोटिफ इसे अन्य सभी भारतीय वस्त्रों से अलग पहचान देते हैं।

क्या है ‘बारो पंजा’ मोटिफ?

‘बारो पंजा’ पैठणी के पल्लू और किनारों (बॉर्डर) में बुना जाने वाला एक पारंपरिक ज्यामितीय डिजाइन है। ‘बारो’ का अर्थ बारह तथा ‘पंजा’ का आशय हथेली या पंजे जैसी संरचना से जुड़ा माना जाता है। यह मोटिफ समृद्धि, संतुलन, सौंदर्य और शिल्प कौशल का प्रतीक माना जाता है। इसे तैयार करने के लिए बुनकरों को अत्यधिक धैर्य और सटीक तकनीक की आवश्यकता होती है। प्रत्येक धागे को हाथ से जोड़ते हुए यह आकृति बनाई जाती है, जिससे इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है।

2,000 वर्ष पुरानी परंपरा

पैठणी का इतिहास लगभग दो हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इसका उद्भव महाराष्ट्र के प्राचीन नगर पैठण(वर्तमान छत्रपति संभाजीनगर क्षेत्र) में हुआ था। सातवाहन काल में यह रेशमी वस्त्र भारत ही नहीं, बल्कि यूनान और रोम तक निर्यात किए जाते थे। बाद में पेशवा काल में यह कला नासिक जिले के येवला तक पहुँची, जो आज पैठणी बुनाई का सबसे बड़ा केंद्र है। विशेषज्ञों के अनुसार एक प्रामाणिक पैठणी साड़ी तैयार करने में कई सप्ताह से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है। इसमें शुद्ध रेशम, जरी और पारंपरिक ‘टेपेस्ट्री वीविंग’ तकनीक का उपयोग किया जाता है।

जब परंपरा पहुँची पेरिस के फैशन मंच तक

हाल के वर्षों में भारतीय डिजाइनर लगातार वैश्विक फैशन मंचों पर भारतीय शिल्प को प्रस्तुत कर रहे हैं। पेरिस हाउट कॉउचर वीक में भारतीय डिजाइनों और कारीगरी को विशेष पहचान मिली। ईशा अंबानी ने भी भारतीय शिल्प पर आधारित डिजाइनों को वैश्विक मंच पर बढ़ावा दिया, जिससे पारंपरिक वस्त्रों और मोटिफों की अंतरराष्ट्रीय चर्चा तेज हुई। फैशन विशेषज्ञों का मानना है कि आज का वैश्विक फैशन केवल आधुनिकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और हस्तनिर्मित कला की ओर भी लौट रहा है। इसी कारण पैठणी जैसे पारंपरिक वस्त्रों के मोटिफ अब आधुनिक गाउन, जैकेट, केप, स्कार्फ और लक्ज़री कॉउचर कलेक्शन का हिस्सा बन रहे हैं।

केवल फैशन नहीं, सांस्कृतिक पहचान

‘बारो पंजा’ जैसे मोटिफ केवल सजावटी डिज़ाइन नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और शिल्प परंपरा के जीवंत प्रतीक हैं। इन डिजाइनों के माध्यम से पीढ़ियों से चली आ रही बुनकर परंपरा आज भी जीवित है। प्रत्येक मोटिफ के पीछे प्रकृति, आध्यात्मिकता और भारतीय जीवन शैली की झलक दिखाई देती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब विश्व प्रसिद्ध हस्तियां और फैशन डिजाइनर इन पारंपरिक डिजाइनों को अपनाते हैं, तो इससे न केवल भारतीय संस्कृति को वैश्विक पहचान मिलती है, बल्कि हजारों पारंपरिक बुनकरों और कारीगरों को भी नए अवसर प्राप्त होते हैं।

GI टैग और संरक्षण की आवश्यकता

पैठणी को भौगोलिक संकेतक (GI) का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद बाजार में मशीन से बनी नकली पैठणी की बढ़ती बिक्री असली बुनकरों के लिए चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ताओं को असली हस्तनिर्मित पैठणी की पहचान और उसके महत्व के बारे में जागरूक करना आवश्यक है, ताकि इस ऐतिहासिक कला का संरक्षण हो सके।

भारतीय शिल्प का नया स्वर्णिम दौर

आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ (Sustainable) फैशन, हस्तनिर्मित वस्त्रों और सांस्कृतिक विरासत की ओर आकर्षित हो रही है, तब पैठणी का बारो पंजा मोटिफ भारत की रचनात्मक शक्ति का प्रतीक बनकर उभर रहा है। यह केवल एक डिज़ाइन नहीं, बल्कि उस परंपरा की कहानी है जिसने सदियों से भारतीय बुनकरों की कला, धैर्य और कौशल को जीवित रखा है।

अतीत की धरोहर भविष्य का फैशन

भारतीय विरासत की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि वह समय के साथ बदलती नहीं, बल्कि हर युग को प्रेरित करती है। आज वैश्विक फैशन जगत में बारो पंजा की बढ़ती लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारत की पारंपरिक बुनाई केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की फैशन भाषा भी बन रही है।
Long or Short, get news the way you like. No ads. No redirections.
Download Newspin and Stay Alert, The CSR Journal Mobile app, for fast,
crisp, clean updates!
Google Play Store –

Latest News

Popular Videos