मुंबई ट्रैफिक पर लग सकता है कंजेशन चार्ज, BMC आयुक्त ने दिए संकेत

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मुंबई में ट्रैफिक पर लग सकता है ‘कंजेशन चार्ज’, सार्वजनिक परिवहन मजबूत होने के बाद ही लागू करने पर विचार

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में बढ़ते ट्रैफिक जाम को नियंत्रित करने के लिए आने वाले समय में कंजेशन चार्ज यानी भीड़भाड़ शुल्क लागू करने की संभावना फिर चर्चा में है। हालांकि, यह व्यवस्था तुरंत लागू होने वाली नहीं है। BMC आयुक्त अश्विनी भिड़े का रुख साफ है कि निजी वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से पहले मुंबई में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इतनी मजबूत होनी चाहिए कि लोगों के पास कार छोड़कर बस, मेट्रो और अन्य सार्वजनिक परिवहन अपनाने का भरोसेमंद विकल्प मौजूद हो। मुंबई में कंजेशन चार्ज का विचार नया नहीं है। वर्ष 2026 में दक्षिण मुंबई के कुछ सबसे व्यस्त इलाकों में अकेले चालक के साथ चलने वाली निजी कारों पर पीक आवर के दौरान शुल्क लगाने का प्रस्ताव सामने आया था। इसमें फोर्ट, नरीमन प्वाइंट और कोलाबा जैसे व्यावसायिक इलाकों को संभावित क्षेत्र के रूप में देखा गया था।

क्या है कंजेशन चार्ज?

कंजेशन चार्ज सामान्य टोल टैक्स से अलग होता है। इसका उद्देश्य किसी सड़क या पुल के निर्माण की लागत वसूलना नहीं, बल्कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में पीक आवर के दौरान निजी वाहनों की संख्या कम करनाहोता है। इस व्यवस्था के तहत किसी निर्धारित क्षेत्र में तय समय के दौरान प्रवेश करने वाले वाहनों से शुल्क लिया जाता है। इसका उद्देश्य वाहन चालकों को यात्रा के वैकल्पिक साधन चुनने, यात्रा का समय बदलने, कार-पूलिंग करने या सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना है।

दक्षिण मुंबई में पहले से आया था ₹50 से ₹100 का प्रस्ताव

मुंबई में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने वाले प्रस्तावों में दक्षिण मुंबई के लिए ₹50 से ₹100 प्रति प्रवेश का शुल्क शामिल था। प्रस्ताव में खास तौर पर उन निजी वाहनों को निशाना बनाने की बात कही गई थी जिनमें केवल चालक सवार हो। पीक आवर के तौर पर सुबह 8 बजे से 11 बजे और शाम 5 बजे से 8 बजे के बीच का समय सुझाया गया था। इसका मकसद कार्यालय समय के दौरान दक्षिण मुंबई की सड़कों पर बढ़ने वाले निजी वाहनों के दबाव को कम करना था। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह प्रस्तावित मॉडल है, लागू किया गया शुल्क नहीं। फिलहाल मुंबईकरों पर ऐसा कोई नया कंजेशन टैक्स लागू नहीं हुआ है।

BMC आयुक्त ने क्या संकेत दिया?

अश्विनी भिड़े ने इस विचार को पूरी तरह खारिज नहीं किया है, लेकिन उनका जोर इस बात पर है कि पहले विकल्प उपलब्ध कराया जाए और उसके बाद निजी वाहन इस्तेमाल को हतोत्साहित किया जाए। उनका व्यापक तर्क यह है कि मुंबई की ट्रैफिक समस्या का समाधान केवल सड़कें चौड़ी करने या नई सड़कें बनाने से नहीं होगा। मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में सड़क क्षमता सीमित है। इसलिए मेट्रो, बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना ज्यादा टिकाऊ समाधान है। यानी भविष्य में यदि कंजेशन चार्ज की व्यवस्था आती है तो उसका आधार केवल ‘कार चलाने पर पैसा देना’ नहीं, बल्कि ‘कार के बजाय बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना’ होना चाहिए।

मुंबई को पहले क्या करना होगा?

कंजेशन चार्ज लागू करने से पहले कई स्तरों पर तैयारी जरूरी होगी।
पहला- सार्वजनिक परिवहन की क्षमता बढ़ानी होगी। मेट्रो नेटवर्क का विस्तार, BEST बस सेवा की क्षमता, फीडर सेवाएं और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी बेहतर करनी होगी।
दूसरा- मेट्रो और बसों के बीच बेहतर इंटीग्रेशन जरूरी होगा। अगर किसी व्यक्ति को कार छोड़ने के बाद मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने में ही काफी समय लगे या गंतव्य तक पहुंचने के लिए कई बार वाहन बदलना पड़े, तो वह कंजेशन चार्ज से बचने के लिए सार्वजनिक परिवहन चुनने में हिचक सकता है।
तीसरा- पार्किंग नीति में बदलाव जरूरी हो सकता है। कंजेशन चार्ज के साथ महंगी पार्किंग, सीमित पार्किंग और बेहतर पार्किंग प्रबंधन जैसी नीतियां निजी वाहनों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं।
चौथा- डिजिटल निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। प्रस्ताव में CCTV और Automatic Number Plate Recognition यानी ANPR कैमरों की मदद से निर्धारित क्षेत्रों में प्रवेश करने वाले वाहनों की पहचान करने का विचार भी सामने आया था।

लंदन और सिंगापुर से मिल सकती है सीख

मुंबई में प्रस्तावित व्यवस्था के पीछे दुनिया के उन शहरों का उदाहरण है जिन्होंने ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए कंजेशन प्राइसिंग का इस्तेमाल किया है। लंदन और सिंगापुर में भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में वाहन इस्तेमाल को महंगा बनाकर निजी वाहनों की मांग को नियंत्रित करने की कोशिश की गई है। लेकिन मुंबई में उसी मॉडल को हूबहू लागू करना आसान नहीं होगा। मुंबई की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वाले यात्रियों की संख्या, सड़क नेटवर्क और शहर की भौगोलिक संरचना अलग है। इसलिए मुंबई के लिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार अलग मॉडल तैयार करना होगा।

केवल कार मालिकों पर बोझ न बन जाए योजना

कंजेशन चार्ज को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि इसका आर्थिक भार किस पर पड़ेगा। यदि कोई कर्मचारी रोजाना दक्षिण मुंबई में कार से जाता है और उसे हर दिन प्रवेश शुल्क देना पड़े, तो उसके मासिक यात्रा खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।इसलिए किसी भी योजना में छूट और अपवादों पर भी विचार करना होगा। आपातकालीन सेवाओं, दिव्यांग यात्रियों, आवश्यक सेवा वाहनों या अन्य विशेष श्रेणियों के लिए अलग नियम बनाए जा सकते हैं। साथ ही, शुल्क से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल कहां होगा, यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा। यदि लोगों से भीड़ कम करने के नाम पर शुल्क लिया जाता है, तो उस राशि का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक परिवहन, बस सेवा, फुटपाथ, साइकिल नेटवर्क और अंतिम-मील कनेक्टिविटीसुधारने में लगाया जाना शहर के लिए अधिक स्वीकार्य मॉडल हो सकता है।

BKC में भी ऐसा प्रस्ताव आया था

मुंबई में कंजेशन फीस का विचार केवल दक्षिण मुंबई तक सीमित नहीं रहा है। इससे पहले बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में भी वाहनों पर कंजेशन शुल्क लगाने का विचार सामने आया था। MMRDA स्तर पर BKC में वाहनों द्वारा क्षेत्र में बिताए जाने वाले समय के आधार पर शुल्क लगाने की चर्चा हुई थी, लेकिन वह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। इससे स्पष्ट है कि मुंबई प्रशासन के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ‘टैक्स लगाया जाए या नहीं’, बल्कि यह भी है कि किस क्षेत्र में, किस वाहन पर, किस समय और किस तकनीक से शुल्क लगाया जाए।

मुंबईकरों के लिए इसका मतलब क्या होगा?

फिलहाल आम वाहन चालक को किसी नए कंजेशन चार्ज की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अभी यह नीतिगत चर्चा और संभावित भविष्य की व्यवस्था है। अगर कभी इसे लागू किया जाता है, तो संभव है कि पूरे मुंबई शहर पर एक साथ शुल्क लगाने के बजाय पहले कुछ अत्यधिक भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाए। उसके बाद ट्रैफिक, प्रदूषण, सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल और लोगों की प्रतिक्रिया के आधार पर व्यवस्था में बदलाव किया जा सकता है।

असली चुनौती शुल्क नहीं, विकल्प है

मुंबई में कंजेशन चार्ज की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन लोगों को केवल निजी वाहन छोड़ने के लिए मजबूर करता है या उन्हें बेहतर विकल्प भी देता है। यदि मेट्रो स्टेशन तक आसानी से पहुंचने के लिए फीडर बस उपलब्ध हो, बसों की फ्रीक्वेंसी अच्छी हो, फुटपाथ सुरक्षित हों, अंतिम-मील कनेक्टिविटी मजबूत हो और सार्वजनिक परिवहन समय पर उपलब्ध हो, तो कई लोग स्वेच्छा से निजी वाहन छोड़ सकते हैं। लेकिन यदि सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त नहीं हुआ और उसके बावजूद कार चालकों पर अतिरिक्त शुल्क लगा दिया गया, तो यह नीति ट्रैफिक प्रबंधन के बजाय अतिरिक्त आर्थिक बोझ के रूप में देखी जा सकती है। इसलिए मुंबई में कंजेशन चार्ज की संभावित कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘चार्ज’ नहीं, बल्कि ‘चॉइस’ है। यानी मुंबईकरों को निजी कार के मुकाबले तेज, भरोसेमंद और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन का विकल्प देना।

फिलहाल भविष्य की नीति

मुंबई में कंजेशन चार्ज की चर्चा फिलहाल भविष्य की नीति के रूप में है। BMC प्रशासन का संकेत है कि पहले सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया जाए और उसके बाद ही निजी वाहनों को हतोत्साहित करने वाले आर्थिक उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाए। अगर ऐसा संतुलित मॉडल तैयार होता है, तो दक्षिण मुंबई जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले इलाकों में ट्रैफिक कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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