मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा पर बवाल: USCIRF ने अमेरिका RSS नेताओं पर वीजा रोक की मांग की

The CSR Journal Magazine

मोहन भागवत की न्यूयॉर्क यात्रा पर बवाल! अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता संस्था ने मांगी RSS नेताओं पर रोक

अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत की आगामी न्यूयॉर्क यात्रा का कड़ा विरोध करते हुए अमेरिकी सरकार से संघ के नेताओं पर लक्षित प्रतिबंध (Targeted Sanctions) लगाने और उन्हें किसी भी प्रकार का राजनयिक सम्मान या उच्च स्तरीय बैठकें न देने की मांग की है। आयोग के चेयरमैन आसिफ महमूद और कमिश्नर जीन मिल्स ने आरोप लगाया है कि संघ के सहयोगी संगठनों ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं, इसलिए इनके नेताओं को अमेरिका में कोई आधिकारिक तवज्जो नहीं मिलनी चाहिए। दूसरी तरफ, भारत सरकार ने पहले ही अमेरिकी आयोग की ऐसी रिपोर्टों को पूरी तरह से ‘भ्रामक, पक्षपातपूर्ण और दुर्भावना से प्रेरित’ बताते हुए खारिज किया है। संघ के समर्थकों का कहना है कि यह पूरा विवाद भारत की छवि को वैश्विक स्तर पर धूमिल करने और भारतीय प्रवासियों (Diaspora) के साथ संघ के सांस्कृतिक संपर्क को बाधित करने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है।

विवाद की मुख्य वजह और मोहन भागवत का दौरा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने स्थापना के शताब्दी वर्ष (Centenary Year) में प्रवेश करने जा रहा है। इसी ऐतिहासिक अवसर पर संघ के प्रमुख मोहन भागवत 25 अगस्त से तीन देशों, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के आधिकारिक कूटनीतिक या सामाजिक प्रवास पर निकलने वाले हैं। इस दौरे के तहत 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में ‘अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ (AHEAD) नामक संस्था द्वारा एक भव्य कार्यक्रम ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन्स’ (वैश्विक एकात्मता उत्सव) आयोजित किया गया है, जिसमें भागवत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इस यात्रा के आधिकारिक ऐलान के तुरंत बाद अमेरिकी सरकार की संघीय सलाहकार संस्था USCIRF ने इस पर आपत्ति जताते हुए एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।

अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने अपने बयान में क्या कहा?

USCIRF के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा:”भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं आरएसएस के सदस्य हैं। यह भारत का एक विशाल छाता संगठन (Umbrella Organisation) है, जिसके कुछ उप-समूहों और अनुषांगिक संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर ईसाइयों और मुसलमानों पर हिंसक हमले करने के गंभीर आरोप हैं। अब इस संगठन के मुख्य नेता मोहन भागवत अमेरिका आने की योजना बना रहे हैं।”आयोग के एक अन्य प्रमुख सदस्य जीन मिल्स ने मांग की है कि अमेरिकी सरकार को आरएसएस  के नेताओं को किसी भी तरह का राजनयिक प्रोटोकॉल, आधिकारिक सम्मान या अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च-स्तरीय बैठकें उपलब्ध नहीं करानी चाहिए। इसके बजाय, वाशिंगटन को उन RSS सदस्यों की संपत्तियों को फ्रीज करने और उनके वीजा पर प्रतिबंध लगाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो कथित तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के जिम्मेदार हैं।

क्या है USCIRF और कितनी है इसकी कानूनी ताकत?

इस पूरे बवाल को समझने के लिए USCIRF (United States Commission on International Religious Freedom) की स्थिति को जानना आवश्यक है। यह अमेरिकी कांग्रेस (वहां की संसद) द्वारा 1998 में गठित एक स्वतंत्र, द्विदलीय संघीय निकाय है। इसका काम दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति की समीक्षा करना और अमेरिकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्रालय (State Department) तथा संसद को नीतिगत सुझाव देना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संस्था पूरी तरह से केवल एक सलाहकार निकाय (Advisory Body) है। इसकी सिफारिशें अमेरिकी प्रशासन या व्हाइट हाउस पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Non-binding) नहीं होती हैं। यानी, यह प्रतिबंध लगाने की मांग तो कर सकता है, लेकिन खुद प्रतिबंध लागू नहीं कर सकता। इसके लिए अंतिम निर्णय अमेरिकी विदेश मंत्रालय और राष्ट्रपति को ही लेना होता है।

भारत सरकार और समर्थकों का तीखा पलटवार

भारत सरकार और विदेश मंत्रालय ने हमेशा से USCIRF के इन रवैयों की घोर निंदा की है। इससे पहले जब आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को “विशेष चिंता वाले देश” (CPC) की श्रेणी में डालने और संघ व भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की थी, तब नई दिल्ली ने इसे कड़े शब्दों में खारिज कर दिया था। भारतीय कूटनीतिज्ञों का रुख स्पष्ट है कि अमेरिकी आयोग का यह एजेंडा पूरी तरह से चुनिंदा और पक्षपाती स्रोतों (Questionable Sources) पर आधारित है, जिसका उद्देश्य भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और संप्रभुता पर कीचड़ उछालना है। संघ के विचारकों का तर्क है कि RSS एक विशुद्ध सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है जो राष्ट्र निर्माण, समाज सेवा और मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ है। न्यूयॉर्क का कार्यक्रम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (यूनिवर्सल वननेस) की भावना पर आधारित है, जिसे बदनाम करने के लिए कुछ भारत-विरोधी लॉबी सक्रिय हो गई हैं।

पर्दे के पीछे सक्रिय संगठन और वैचारिक राजनीति

मोहन भागवत के इस दौरे के विरोध में केवल USCIRF ही नहीं, बल्कि अमेरिका में सक्रिय कुछ अन्य मानवाधिकार संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (Hindus for Human Rights) नामक एक वकालत समूह ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाते हुए कहा कि “एकता का जश्न मनाने के नाम पर धार्मिक वर्चस्व की राजनीति को छिपाया नहीं जा सकता”। वहीं, ‘सवेरा’ (Savera) नामक एक मंच ने भी एक रिपोर्ट जारी कर इस यात्रा के समन्वयकों और आयोजकों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। इसके विपरीत, अमेरिका में रहने वाले लाखों प्रवासी हिंदुओं और भारतीय-अमेरिकियों में मोहन भागवत के इस ऐतिहासिक दौरे को लेकर भारी उत्साह है। प्रवासियों का मानना है कि संघ प्रमुख का यह दौरा भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर और मजबूती प्रदान करेगा।

कूटनीतिक प्रभाव: क्या पड़ेगा भारत-अमेरिका संबंधों पर असर?

राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस विवाद से भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर कोई सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना बेहद कम है। इसकी मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं-
सांस्कृतिक दौरा: मोहन भागवत की यह यात्रा पूरी तरह से गैर-सरकारी, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों के आमंत्रण पर हो रही है। इसमें अमेरिकी सरकार के साथ उनकी किसी आधिकारिक कूटनीतिक बैठक का कोई कार्यक्रम तय नहीं है।
रणनीतिक साझेदारी: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक, रक्षा और रणनीतिक संबंध (जैसे क्वाड गठबंधन) बेहद मजबूत दौर में हैं। अमेरिकी प्रशासन किसी गैर-बाध्यकारी सलाहकार संस्था के बयानों के चक्कर में भारत जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदार को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाएगा।

वैश्विक मंच पर भारत का कडा रुख

मोहन भागवत के न्यूयॉर्क आगमन से पहले खड़ा हुआ यह बवंडर असल में पश्चिमी देशों के मानवाधिकार नैरेटिव और भारत के बढ़ते सांस्कृतिक आत्मविश्वास के बीच का एक पुराना वैचारिक द्वंद्व है। जहां अमेरिकी आयोग USCIRF पश्चिमी चश्मे से भारतीय संगठनों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है, वहीं वैश्विक मंचों पर भारत अब ऐसी किसी भी दबाव की राजनीति के आगे झुकने को तैयार नहीं है। तमाम विरोधों और तीखी बयानबाजी के बावजूद, संघ प्रमुख का 25 अगस्त से शुरू होने वाला यह तीन देशों का दौरा तय कार्यक्रम के अनुसार ही आगे बढ़ने की उम्मीद है।

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