MMRDA की बड़ी प्लानिंग चूक! 260 करोड़ की बनी मेट्रो अब तोड़ने की नौबत

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MMRDA की प्लानिंग में बड़ी चूक! 260 करोड़ रुपये का बना मुंबई मेट्रो लाइन-7A वायाडक्ट, अब तोड़ने की नौबत

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में तेजी से फैल रहे मेट्रो नेटवर्क के बीच मुंबई मेट्रो लाइन-7A परियोजना से जुड़ी एक गंभीर योजना और डिजाइन संबंधी चूक सामने आई है। स्थिति ऐसी बन गई है कि जिस एलिवेटेड मेट्रो वायाडक्ट और उससे जुड़े ढांचे पर करीब 250 से 260 करोड़ रुपये का काम हो चुका है, उसके एक हिस्से को अब संशोधित करने, तोड़ने या फिर से बनाने की नौबत आ सकती है। मामला केवल निर्माण की गलती का नहीं, बल्कि परियोजना की शुरुआती प्लानिंग, डिजाइन और वैधानिक मंजूरियों के समन्वय पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आरोप है कि मेट्रो लाइन के डिजाइन के दौरान मुंबई एयरपोर्ट के आसपास लागू ऊंचाई प्रतिबंधों और मेट्रो संचालन के लिए आवश्यक ओवरहेड इलेक्ट्रिकल सिस्टम की अतिरिक्त ऊंचाई का पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं रखा गया। इस वजह से अब मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण यानी MMRDA के सामने एक बड़ी तकनीकी और वित्तीय चुनौती खड़ी हो गई है। यदि एयरपोर्ट से संबंधित ऊंचाई मंजूरी नहीं मिलती और कोई वैकल्पिक इंजीनियरिंग समाधान नहीं निकलता, तो पहले से बने एलिवेटेड हिस्से का बड़ा भाग दोबारा बनाना पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला?

मुंबई मेट्रो लाइन-7A को शहर की महत्वपूर्ण मेट्रो परियोजनाओं में माना जाता है। यह करीब 3.4 किलोमीटर लंबी लाइन है, जिसका उद्देश्य मेट्रो नेटवर्क को अंधेरी पूर्व क्षेत्र से छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-2 तक जोड़ना है। यह लाइन मौजूदा मेट्रो नेटवर्क के विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा है और एयरपोर्ट तक सार्वजनिक परिवहन की पहुंच आसान बनाने के लिए बनाई जा रही है। परियोजना में भूमिगत और एलिवेटेड, दोनों प्रकार के निर्माण शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना का एक महत्वपूर्ण एलिवेटेड हिस्सा विले पार्ले पूर्व और एयरपोर्ट कॉलोनी क्षेत्र के आसपास स्थित है। इसी हिस्से में अब ऊंचाई को लेकर गंभीर समस्या सामने आई है।समस्या मेट्रो स्टेशन की ऊंचाई मात्र तक सीमित नहीं है। असली चुनौती मेट्रो ट्रेन को बिजली पहुंचाने वाले ओवरहेड इलेक्ट्रिकल उपकरण (OHE) से जुड़ी है। इन उपकरणों, तारों और संबंधित संरचना के लिए अतिरिक्त ऊंचाई की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन एयरपोर्ट के आसपास विमानन सुरक्षा नियमों के कारण किसी भी ऊंचे ढांचे की अधिकतम सीमा तय होती है। अब यही सीमा मेट्रो के संचालन के लिए आवश्यक ऊंचाई से टकरा गई है।

260 करोड़ रुपये का काम संकट में

इस तकनीकी समस्या की सबसे गंभीर बात यह है कि मामला तब सामने आया जब परियोजना का बड़ा हिस्सा पहले ही बन चुका था। रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित एलिवेटेड ढांचे, वायाडक्ट, रैंप और एयरपोर्ट कॉलोनी स्टेशन से जुड़े निर्माण पर भारी निवेश हो चुका है। अनुमान है कि करीब 250 से 260 करोड़ रुपये मूल्य का काम इस समस्या से प्रभावित हो सकता है। यदि मौजूदा संरचना को पूरी तरह या आंशिक रूप से तोड़कर फिर से बनाना पड़ा, तो नुकसान केवल पहले खर्च किए गए धन तक सीमित नहीं रहेगा। नई लागत में शामिल हो सकते हैं—
  • पहले से बने ढांचे को हटाने का खर्च,
  • नए डिजाइन और इंजीनियरिंग का खर्च,
  • दोबारा निर्माण,
  • ठेके की अवधि बढ़ने से अतिरिक्त लागत,
  • परियोजना प्रबंधन और निगरानी खर्च,
  • मेट्रो सिस्टम लगाने में देरी,
  • महंगाई के कारण निर्माण लागत में वृद्धि,
  • और सबसे महत्वपूर्ण, यात्रियों को मिलने वाली सुविधा में लंबी देरी।
यानी 260 करोड़ रुपये का जोखिम अंतिम वित्तीय नुकसान नहीं भी हो सकता। यदि पुनर्निर्माण की नौबत आई, तो कुल आर्थिक प्रभाव इससे कहीं अधिक हो सकता है।

आखिर गलती कहां हुई?

रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना की योजना और डिजाइन से जुड़े जनरल कंसल्टेंट कंसोर्टियम पर यह सवाल उठाया गया है कि एयरपोर्ट की ऊंचाई सीमाओं और मेट्रो के ओवरहेड इलेक्ट्रिकल सिस्टम की आवश्यकताओं के बीच समुचित तालमेल शुरुआती चरण में क्यों नहीं किया गया। परियोजना से जुड़े डिजाइन और समन्वय की जिम्मेदारी SYSTRA, CEG और SMCIPL के कंसोर्टियम से संबंधित बताई गई है। MMRDA की ओर से यह मुद्दा उठाया गया है कि योजना बनाते समय विमानन संबंधी प्रतिबंधों और आवश्यक अतिरिक्त ऊंचाई को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया। दूसरी ओर, रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि संबंधित कंसल्टेंट की ओर से जिम्मेदारी को लेकर अलग रुख अपनाया गया है। यानी अब सवाल केवल तकनीकी समाधान का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का भी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि, क्या परियोजना शुरू होने से पहले सभी वैधानिक और तकनीकी मंजूरियों की पूरी जांच हुई थी? और यदि ऊंचाई प्रतिबंध इतने महत्वपूर्ण थे, तो निर्माण काफी आगे बढ़ने तक यह समस्या क्यों सामने नहीं आई?

एयरपोर्ट की ‘फनल जोन’ में क्यों महत्वपूर्ण है ऊंचाई?

हवाई अड्डे के आसपास के क्षेत्रों में किसी भी निर्माण की ऊंचाई पर सख्त नियंत्रण होता है। विमान के उड़ान भरने और उतरने के दौरान उनके सुरक्षित मार्ग को ध्यान में रखते हुए ऊंची इमारतों, टावरों, क्रेनों और अन्य संरचनाओं पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं।इन्हें सामान्य रूप से एयरपोर्ट के आसपास लागू ऊंचाई प्रतिबंध और विमानन सुरक्षा मानकों के तहत देखा जाता है। मेट्रो परियोजना के मामले में जमीन से ऊपर बने वायाडक्ट की ऊंचाई एक स्तर तक हो सकती है, लेकिन जब उसके ऊपर बिजली के तार, ओवरहेड उपकरण, सपोर्ट पोल और अन्य इलेक्ट्रिकल संरचनाएं लगती हैं, तो कुल ऊंचाई और बढ़ जाती है। यही अतिरिक्त ऊंचाई अब विवाद का कारण बनी है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रभावित हिस्से में मेट्रो संचालन के लिए आवश्यक OHE सिस्टम को लगाने हेतु अतिरिक्त ऊंचाई चाहिए, लेकिन एयरपोर्ट सुरक्षा नियमों के तहत इस अतिरिक्त ऊंचाई की मंजूरी अभी तक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

क्या वायाडक्ट को सिर्फ नीचे नहीं किया जा सकता?

सामान्य तौर पर किसी आम व्यक्ति को यह लग सकता है कि यदि ऊंचाई ज्यादा है तो वायाडक्ट को कुछ मीटर नीचे कर दिया जाए। लेकिन मेट्रो इंजीनियरिंग इतनी सरल नहीं होती। मेट्रो लाइन का पूरा मार्ग एक निश्चित ग्रेडिएंट, ढलान और ट्रैक ज्योमेट्री के आधार पर डिजाइन किया जाता है। मेट्रो ट्रेन की गति, सुरक्षा और संचालन को देखते हुए ट्रैक को अचानक ऊपर या नीचे नहीं किया जा सकता। लाइन-7A मौजूदा मेट्रो नेटवर्क से जुड़ती है और आगे एयरपोर्ट क्षेत्र के भूमिगत हिस्से की ओर जाती है। इसलिए एलिवेटेड हिस्से की ऊंचाई में बड़ा बदलाव करने से पूरी लाइन की इंजीनियरिंग प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि अब केवल एक छोटी तकनीकी मरम्मत से समस्या हल करना आसान नहीं माना जा रहा। यदि मौजूदा डिजाइन में पर्याप्त बदलाव संभव नहीं हुआ, तो संरचना के कुछ हिस्सों को बदलने या फिर से बनाने का विकल्प सामने आ सकता है।

2025 में सामने आई समस्या, तब तक काफी काम हो चुका था

रिपोर्टों के अनुसार, ऊंचाई से जुड़ी समस्या वर्ष 2025 में स्पष्ट रूप से सामने आई। इसके बाद प्रभावित हिस्से के निर्माण और मंजूरी से जुड़े मामलों पर दोबारा विचार शुरू हुआ। लेकिन तब तक परियोजना का काफी सिविल वर्क आगे बढ़ चुका था। MMRDA के उपलब्ध परियोजना आंकड़ों के आधार पर प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया कि फरवरी 2026 तक एलिवेटेड वायाडक्ट का निर्माण पूरा हो चुका था, जबकि एलिवेटेड रैंप का लगभग 95 प्रतिशत काम भी हो चुका था। एयरपोर्ट कॉलोनी स्टेशन का निर्माण भी काफी आगे बढ़ चुका था। यही वजह है कि अब यह मामला और गंभीर बन गया है। यदि शुरुआती चरण में समस्या पकड़ी जाती, तो डिजाइन में बदलाव कागज पर ही किया जा सकता था। लेकिन अब जब कंक्रीट और स्टील की भारी संरचनाएं खड़ी हो चुकी हैं, तो किसी भी सुधार की कीमत कई गुना बढ़ सकती है।

MMRDA ने मंजूरी के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए

रिपोर्टों के अनुसार, MMRDA ने आवश्यक अतिरिक्त ऊंचाई के लिए संबंधित विमानन प्राधिकरणों के सामने मामला रखा है और समाधान निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं। परियोजना के लिए सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि किसी तकनीकी और सुरक्षा मानकों के अनुरूप समाधान पर सहमति बन जाए, जिससे पहले से बने ढांचे को तोड़ने की आवश्यकता न पड़े। लेकिन विमानन सुरक्षा के मामले में किसी प्रकार का समझौता संभव नहीं माना जाता। यदि अतिरिक्त ऊंचाई विमान के सुरक्षित संचालन के लिए जोखिम पैदा करती है, तो मंजूरी मिलना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में MMRDA और संबंधित इंजीनियरों को वैकल्पिक डिजाइन तलाशना होगा। एक अधिकारी के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि तकनीकी समस्याओं का समाधान केवल समझौते से नहीं हो सकता और यदि कोई व्यवहार्य समाधान नहीं निकला तो वायाडक्ट के पुनर्निर्माण की स्थिति बन सकती है।

पहले से देरी झेल रही है मेट्रो लाइन-7A

मुंबई मेट्रो लाइन-7A पहले ही अपने निर्धारित समय से पीछे चल रही है। यह परियोजना मुंबई के मेट्रो नेटवर्क में बेहद महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है क्योंकि इससे एयरपोर्ट तक सीधी और तेज सार्वजनिक परिवहन कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है। लेकिन नई तकनीकी समस्या के कारण परियोजना की समयसीमा पर एक बार फिर सवाल उठ गए हैं। यदि प्रभावित हिस्से को दोबारा डिजाइन और निर्माण करना पड़ा, तो मेट्रो का उद्घाटन और आगे खिसक सकता है। इसका सीधा असर उन लाखों यात्रियों पर पड़ेगा जो मुंबई के उत्तरी और पश्चिमी उपनगरों से एयरपोर्ट और शहर के अन्य हिस्सों तक बेहतर कनेक्टिविटी की उम्मीद कर रहे हैं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि नई समस्या के कारण परियोजना का पूरा होना पहले की अनुमानित समयसीमा से और पीछे जा सकता है।

टैक्सपेयर्स के पैसे का सवाल सबसे बड़ा

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सार्वजनिक सवाल खड़ा किया है अगर गलती डिजाइन और प्लानिंग की है तो नुकसान कौन भरेगा? मेट्रो जैसी बड़ी सरकारी परियोजनाओं में पैसा आखिरकार सार्वजनिक संसाधनों से आता है। इसलिए यदि किसी कंसल्टेंट, डिजाइन एजेंसी या परियोजना प्रबंधन स्तर पर गंभीर चूक साबित होती है, तो जनता के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या 250-260 करोड़ रुपये का नुकसान टैक्सपेयर्स को उठाना पड़ेगा? या फिर जिम्मेदार एजेंसियों और अधिकारियों से जवाबदेही तय की जाएगी? विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में डिजाइन कंसल्टेंट, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट और निर्माण एजेंसियों के बीच जिम्मेदारियां स्पष्ट होती हैं। यदि किसी पक्ष की लापरवाही या अनुबंध के उल्लंघन से वित्तीय नुकसान होता है, तो अनुबंध की शर्तों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है। हालांकि इस मामले में अंतिम जिम्मेदारी और वित्तीय दायित्व का फैसला जांच, तकनीकी रिपोर्ट और अनुबंध की शर्तों के बाद ही स्पष्ट होगा।

MMRDA के लिए बड़ी प्रतिष्ठा की चुनौती

MMRDA इस समय मुंबई और मुंबई महानगर क्षेत्र में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। मेट्रो नेटवर्क का विस्तार, सड़कें, सुरंगें, नए शहरी विकास क्षेत्र और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट सिस्टम—इन सभी परियोजनाओं के बीच मुंबई को विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर देने का लक्ष्य रखा गया है।लेकिन लाइन-7A की यह समस्या प्रोजेक्ट प्लानिंग और इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन की कमजोरियों को उजागर करती है। विशेष रूप से एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण शुरू करने से पहले निम्नलिखित चीजों का स्पष्ट होना बेहद जरूरी होता है—
  • विमानन ऊंचाई प्रतिबंध,
  • एयरपोर्ट अथॉरिटी की मंजूरी,
  • इलेक्ट्रिकल सिस्टम की तकनीकी जरूरतें,
  • ट्रैक और स्टेशन की अंतिम डिजाइन,
  • भविष्य में लगने वाले उपकरणों की ऊंचाई,
  • और सभी वैधानिक मंजूरियों का समन्वय।
  • यदि इनमें से किसी एक महत्वपूर्ण तत्व को डिजाइन के दौरान नजरअंदाज किया जाए, तो बाद में उसका असर पूरे प्रोजेक्ट पर पड़ सकता है।

क्या 1 किलोमीटर का हिस्सा दोबारा बन सकता है?

प्रभावित एलिवेटेड हिस्सा लगभग एक किलोमीटर के आसपास बताया जा रहा है। इसमें वायाडक्ट, रैंप और एयरपोर्ट कॉलोनी स्टेशन से जुड़ा क्षेत्र शामिल है। यदि अंतिम रूप से कोई वैकल्पिक तकनीकी समाधान नहीं निकलता, तो प्रभावित हिस्से में आंशिक तोड़फोड़, डिजाइन संशोधन या पूर्ण पुनर्निर्माण की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा 260 करोड़ रुपये का ढांचा निश्चित रूप से तोड़ा ही जाएगा। वर्तमान स्थिति को संभावित पुनर्निर्माण के जोखिम के रूप में देखा जा रहा है। अंतिम फैसला विमानन मंजूरी, तकनीकी समाधान और MMRDA की आगे की परियोजना समीक्षा पर निर्भर करेगा। इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वायाडक्ट को तोड़ने का अंतिम निर्णय अभी सार्वजनिक रूप से अंतिम रूप में घोषित नहीं हुआ है, लेकिन यदि मंजूरी और इंजीनियरिंग समाधान नहीं मिला तो यह विकल्प सामने आ सकता है।

मुंबई के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए सबक

मेट्रो-7A का यह मामला केवल एक परियोजना की तकनीकी परेशानी नहीं है, बल्कि भविष्य की सभी बड़ी शहरी परियोजनाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है। मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहर में रेलवे, मेट्रो, एयरपोर्ट, सड़कें, फ्लाईओवर, भूमिगत सुरंगें, बिजली नेटवर्क और बड़े निर्माण एक-दूसरे के बेहद करीब मौजूद हैं। ऐसे में किसी भी नई परियोजना की योजना बनाते समय अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय सबसे महत्वपूर्ण होता है।विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े प्रोजेक्ट्स में निर्माण शुरू होने से पहले डिजिटल मॉडलिंग, 3D डिजाइन समीक्षा, क्लियरेंस मैट्रिक्स और स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट जैसे उपायों को और मजबूत करने की जरूरत है। क्योंकि कागज पर हुई एक छोटी सी डिजाइन चूक जमीन पर जाकर करोड़ों रुपये की समस्या बन सकती है।

अब आगे क्या होगा?

मेट्रो लाइन-7A के भविष्य पर अब तीन प्रमुख बातें निर्भर करेंगी—
1. क्या अतिरिक्त ऊंचाई की मंजूरी मिलेगी?
यदि विमानन प्राधिकरण सुरक्षा मानकों के तहत किसी समाधान को मंजूरी देता है, तो मौजूदा ढांचे को बचाया जा सकता है।
2. क्या बिना ऊंचाई बढ़ाए कोई तकनीकी विकल्प संभव है?
इंजीनियरिंग विशेषज्ञों को ऐसा समाधान तलाशना होगा जिससे मेट्रो का सुरक्षित संचालन भी हो और एयरपोर्ट के ऊंचाई नियमों का उल्लंघन भी न हो।
3. जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
यदि जांच में यह साबित होता है कि डिजाइन और योजना में गंभीर चूक हुई है, तो यह तय करना होगा कि उससे होने वाले वित्तीय नुकसान की जिम्मेदारी कौन उठाएगा।

मुंबई की मेट्रो दौड़ में 260 करोड़ का बड़ा सवाल

मुंबई मेट्रो लाइन-7A की यह घटना आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक को सामने लाती है- गलत योजना का महंगा परिणाम। करीब 260 करोड़ रुपये के काम पर संकट खड़ा होना केवल एक इंजीनियरिंग समस्या नहीं है। यह परियोजना प्रबंधन, डिजाइन की जिम्मेदारी, सरकारी निगरानी और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा गंभीर मामला है। मुंबई को विश्वस्तरीय मेट्रो नेटवर्क की जरूरत है और मेट्रो परियोजनाएं शहर की ट्रैफिक समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन इतनी बड़ी परियोजनाओं में हर तकनीकी मंजूरी और डिजाइन पैरामीटर को निर्माण से पहले पूरी तरह जांचना जरूरी है। अब सभी की नजर MMRDA, विमानन प्राधिकरणों और तकनीकी विशेषज्ञों पर है।

क्या 260 करोड़ रुपये का बना ढांचा बच जाएगा?

क्या कोई इंजीनियरिंग समाधान निकल आएगा?
या फिर मुंबई को अपनी ही बनाई मेट्रो संरचना का एक हिस्सा तोड़कर दोबारा बनाना पड़ेगा?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मेट्रो लाइन-7A के भविष्य और मुंबई के इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग सिस्टम—दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।

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