‘आत्मनिर्भरता का प्रतीक गणेशोत्सव’ थीम पर आधारित झांकी ने संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण का दिया सशक्त संदेश! महाराष्ट्र की झांकी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में अष्टविनायक की झलक यह संदेश देती है कि राज्य की जड़ें गहरी आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक एकता में बसी हुई हैं।
कर्तव्य पथ पर गणेशोत्सव की धूम, महाराष्ट्र की झांकी बनी नंबर वन
गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर कर्तव्य पथ पर आयोजित भव्य परेड में महाराष्ट्र ने अपनी शानदार प्रस्तुति से देशभर का ध्यान अपनी ओर खींचा। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियों की श्रेणी में महाराष्ट्र की झांकी को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह झांकी ‘गणेशोत्सव: आत्मनिर्भरता का प्रतीक’ थीम पर आधारित थी, जिसमें गणेशोत्सव की सांस्कृतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय महत्ता को बेहद आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
गणेशोत्सव ने बढ़ाया महाराष्ट्र का गौरव
झांकी में महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति और परंपराओं की जीवंत झलक देखने को मिली। पारंपरिक ढोल-ताशा वादकों की ऊर्जावान प्रस्तुति ने माहौल को उत्सवमय बना दिया, वहीं गणपति बप्पा के भक्तों की झांकी ने जन-आस्था और श्रद्धा को दर्शाया। झांकी का मुख्य आकर्षण महाराष्ट्र के प्रसिद्ध अष्टविनायक मंदिरों की झलक थी, जो राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है। महाराष्ट्र में अष्टविनायक भगवान गणेश के आठ अत्यंत पवित्र और प्राचीन मंदिरों का समूह है, जिन्हें राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान माना जाता है। मोरगांव के मयूरेश्वर से शुरू होकर थेऊर के चिंतामणि, सिद्धटेक के सिद्धिविनायक, रांजणगांव के महागणपति, ओझर के विघ्नहर, लेण्याद्री के गिरिजात्मज, महाड के वरदविनायक और पाली के बल्लालेश्वर तक फैली यह यात्रा श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। मान्यता है कि अष्टविनायक के दर्शन से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, इसलिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पावन यात्रा पर निकलते हैं। अष्टविनायक न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि महाराष्ट्र की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाते हैं।
इसके साथ ही झांकी में लेझिम लोकनृत्य करते कलाकारों ने मराठी लोककला की सुंदरता और जीवंतता को दर्शाया। लेझिम महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य है, जो खासकर गणेशोत्सव, शिवजयंती और सामाजिक आयोजनों में किया जाता है। इसमें कलाकार एक हाथ में लेझिम लेकर तालबद्ध गति से नृत्य करते हैं। यह नृत्य वीरता, अनुशासन और सामूहिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। लेझिम नृत्य न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ने और शारीरिक-मानसिक अनुशासन सिखाने का भी माध्यम है। गणेशोत्सव की शोभायात्राओं में लेझिम दलों की प्रस्तुति उत्सव को और अधिक भव्य बना देती है। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे कलाकारों ने यह संदेश दिया कि गणेशोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला, रोजगार सृजन करने वाला और स्थानीय कारीगरों, मूर्तिकारों व कलाकारों को आत्मनिर्भर बनाने वाला उत्सव है।
झांकी के माध्यम से यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार आधुनिक समय में गणेशोत्सव को पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा रहा है। मिट्टी की मूर्तियों, प्राकृतिक रंगों और स्वच्छता संदेशों के जरिए यह बताया गया कि परंपरा और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ी है। अब मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाएं, प्राकृतिक रंगों का उपयोग और कम ऊंचाई की मूर्तियां अपनाई जा रही हैं। कई स्थानों पर कृत्रिम विसर्जन कुंड, सामूहिक विसर्जन और घर पर ही विसर्जन की परंपरा को बढ़ावा दिया जा रहा है।सार्वजनिक गणेश मंडल प्लास्टिक-मुक्त सजावट, पुनः उपयोग योग्य सामग्री और सामाजिक संदेशों वाली झांकियों के जरिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं। यह बदलाव दिखाता है कि आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा भी संभव है।
महाराष्ट्र में इको-फ्रेंडली गणेशोत्सव, अष्टविनायक मंदिर और पारंपरिक लेझिम
महाराष्ट्र में गणेशोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और बदलते समय के साथ जागरूकता का प्रतीक भी है। समय के साथ यह उत्सव और अधिक इको-फ्रेंडली बनता जा रहा है, वहीं सिद्धिविनायक मंदिर जैसी आस्था की धुरी और लेझिम जैसे पारंपरिक लोकनृत्य इसकी पहचान को और सशक्त बनाते हैं। कर्तव्य पथ पर जैसे ही महाराष्ट्र की झांकी आगे बढ़ी, दर्शकों की तालियों और जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा। निर्णायक मंडल ने झांकी की कल्पना, प्रस्तुति, सांस्कृतिक गहराई और सामाजिक संदेश की विशेष सराहना की। महाराष्ट्र की इस उपलब्धि पर राज्यभर में खुशी की लहर है। यह पुरस्कार न केवल राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि का सम्मान है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारतीय त्योहार किस तरह आत्मनिर्भर भारत के विचार को मजबूत कर सकते हैं।
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