बम धमाके जैसा था मंजर- मौत के मुंह से लौटी भारतीय महिला ने बयां किया खौफनाक मंजर

The CSR Journal Magazine

Nepal Floods: ‘बम धमाके जैसी थी आवाज’ नेपाल से भारत लौटी महिला ने बताया कैसा था तबाही का भयानक मंजर

नेपाल में ग्लेशियर फटने से आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) और भूस्खलन ने भारत-नेपाल और तिब्बत सीमा पर भारी तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 579 लोगों की मौत हो चुकी है और 2,400 से अधिक लोग लापता हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए और वहां से सुरक्षित भारत लौटे तमिलनाडु के 21 श्रद्धालुओं के जत्थे में शामिल महिला तीर्थयात्री विजयाभुवनेश्वरी ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि ‘वहां का मंजर ऐसा था मानो अचानक कोई बम ब्लास्ट हो गया हो या कंक्रीट का ज्वालामुखी फट पड़ा हो’।

बम धमाके जैसी गूंज और आंखों के सामने बहती गाड़ियां’: भारत लौटीं महिला ने बयां किया खौफनाक मंजर

हम अपनी आंखों के सामने साक्षात मौत को देख रहे थे। वह कोई सामान्य बाढ़ नहीं थी, बल्कि ऐसा लगा जैसे पहाड़ों के बीच किसी ने बहुत बड़ा बम फोड़ दिया हो।” यह कहना है नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर की तीर्थयात्रा से किसी तरह जिंदा बचकर भारत लौटीं महिला श्रद्धालु विजयाभुवनेश्वरी का। विजयाभुवनेश्वरी उन 21 भारतीय श्रद्धालुओं के दल का हिस्सा थीं, जो नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई इस सदी की सबसे भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) की चपेट में आने से बाल-बाल बचे हैं। दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरते ही उनकी आंखों में खौफ और आंसू साफ देखे जा सकते थे। उन्होंने बताया, “हमारा तीन बसों का काफिला आगे बढ़ रहा था। अचानक एक बहरे कर देने वाली आवाज हुई। जमीन हिलने लगी और पहाड़ों से पानी, कीचड़ तथा भारी-भरकम चट्टानों का ऐसा रेला आया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। हमारे ठीक पीछे चल रहीं लगभग 50 गाड़ियां पलक झपकते ही मलबे के नीचे समा गईं या सैलाब में बह गईं।” श्रद्धालुओं ने बताया कि जान बचाने के लिए वे बस से कूदकर ऊंचे पत्थरों की तरफ भागे। चारों तरफ चीख-पुकार मची थी और वे सिर्फ ‘ओम नमः शिवाय’ का जाप कर रहे थे। उन्होंने इस सुरक्षित वापसी को अपना ‘दूसरा जन्म’ बताया है।

तबाही का मुख्य कारण: ग्लेशियर का फटना और मलबे का ‘कंक्रीट’ बनना

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRMA) के अनुसार, इस प्रलयकारी बाढ़ की शुरुआत नेपाल-चीन (तिब्बत) सीमा के पास भोटेकोशी नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में एक विशाल ग्लेशियर (हिमनद) के अचानक ढहने के कारण हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि जब यह पानी पहाड़ों की संकरी घाटियों से नीचे उतरा, तो इसने रास्ते की पूरी मिट्टी, पेड़ों और विशाल चट्टानों को अपने भीतर समेट लिया। मैदानी और रिहाइशी इलाकों तक पहुंचते-पहुंचते पानी का यह बहाव एक अत्यंत गाढ़े लिक्विड या लिक्विड कंक्रीट (Hyper-concentrated flow) में बदल गया। इसके प्रचंड दबाव के सामने कंक्रीट के बड़े-बड़े मकान, होटल, पनबिजली परियोजनाएं और मजबूत पुल ताश के पत्तों की तरह ढह गए।

आंकड़े बयां कर रहे तबाही का भयावह पैमाना

इस प्राकृतिक आपदा ने भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में जनजीवन को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। वर्तमान आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है-
कुल मौतें: नेपाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में अब तक 579 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं।
लापता लोग: दोनों देशों की सीमाओं को मिलाकर 2,400 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। इनमें अकेले नेपाल से 1,924 और तिब्बत क्षेत्र से 558 लोग शामिल हैं।
फंसे हुए विदेशी नागरिक: लापता लोगों में 540 से अधिक विदेशी नागरिक हैं, जिनमें अधिकांश भारत के हिंदू तीर्थयात्री और पर्यटक हैं।
बुनियादी ढांचे को नुकसान: पहाड़ों को जोड़ने वाली मुख्य सड़कों का लगभग 40 किलोमीटर का हिस्सा पूरी तरह गायब हो चुका है और दर्जनों रणनीतिक पुल बह गए हैं।

नुवाकोट और देवघाट में ‘सब कुछ खत्म’, मलबे से सुरक्षित निकाली गईं 97 वर्षीय बुजुर्ग

नेपाल का नुवाकोट और देवघाट क्षेत्र इस आपदा का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। नुवाकोट में त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों के उफान ने तटीय बस्तियों का नामोनिशान मिटा दिया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फोर-लेन हाईवे अब एक गहरी और उफनती नदी में तब्दील हो चुका है। कई गांवों का संपर्क पूरी तरह कट गया है। यहां बिजली के खंभे, मोबाइल टावर और इंटरनेट लाइनें पूरी तरह ध्वस्त हैं, जिससे प्रभावित इलाकों में ब्लैकआउट जैसी स्थिति है। इस घने अंधेरे और तबाही के बीच देवघाट से एक चमत्कारिक रेस्क्यू की खबर भी सामने आई। मिट्टी और मलबे में पूरी तरह दबीं 97 वर्षीय बुजुर्ग महिला गुना माया बोहारा को नेपाल पुलिस और सेना ने एक्सकेवेटर (बुलडोजर) की मदद से कड़ी मशक्कत के बाद सुरक्षित बाहर निकाला। उनके परिजनों ने बताया कि वह मलबे के नीचे करीब चार घंटे तक दबी रहीं, लेकिन उनकी जीने की इच्छाशक्ति ने उन्हें बचा लिया। सोशल मीडिया पर इस रेस्क्यू का वीडियो वायरल हो रहा है।

भारत सरकार मुस्तैद: वायुसेना, मेडिकल टीमें और ‘टनल रेस्क्यू एक्सपर्ट्स’ तैनात

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) और विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस पूरे संकट पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। भारत ने अपने नागरिकों को बचाने और नेपाल की मदद के लिए युद्धस्तर पर कदम उठाए हैं।
राहत सामग्री की खेप: भारत अब तक मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) के तहत तीन विशेष उड़ानों के जरिए 10 टन से अधिक राहत सामग्री और बेली ब्रिज (अस्थायी पुल) नेपाल भेज चुका है।
विशेषज्ञ टीमों की रवानगी: भारत से 11 सदस्यीय विशेषज्ञ चिकित्सा टीम और उत्तराखंड के सिल्कयारा जैसी आपदाओं से निपटने वाली एक विशेष टनल रेस्क्यू (सुरंग बचाव) टीम को जमीनी स्तर पर ऑपरेशन के लिए भेजा गया है।

दूतावास का हेल्पलाइन नेटवर्क

काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास लगातार नेपाल सेना के साथ मिलकर काम कर रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, चीन (तिब्बत) की तरफ फंसे 400 से अधिक भारतीय पूरी तरह सुरक्षित हैं, जबकि नेपाल में फंसे करीब 85 भारतीयों को अब तक एयरलिफ्ट या सुरक्षित रास्तों से निकाला जा चुका है। हालांकि, अभी भी 315 से अधिक भारतीयों से संपर्क स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

बचाव कार्य में सबसे बड़ी बाधा: प्रतिकूल मौसम और दलदल

नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और भारतीय बचाव दल के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती खराब मौसम और पहाड़ों का भारी दलदल है। आपदा क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश के कारण हेलीकॉप्टर ऑपरेशन्स को कई बार रोकना पड़ रहा है। जो मलबा पहले सूख रहा था, वह बारिश के कारण दोबारा गीला होकर धंस रहा है, जिससे लाइफ-डिटेक्टर मशीनों और खोजी कुत्तों को ले जाने में भारी परेशानी आ रही है। प्रशासन ने नदियों के किनारे रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने और अगले कुछ दिनों तक पहाड़ों की तरफ यात्रा न करने की सख्त हिदायत दी है। यह आपदा ग्लोबल वार्मिंग और हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ का एक और गंभीर चेतावनी संकेत है।

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