नेपाल महात्रासदी में 600 से अधिक मौतें, 2400 लापता; मलबे में तब्दील हुए पहाड़

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नेपाल बाढ़: 600 के करीब मौतें और हजारों लापता, खतरा अब भी बना हुआ

नेपाल में विनाशकारी फ्लैश फ्लड के कारण अब तक 626 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,400 से अधिक लोग लापता हैं और पहाड़ों पर नई अस्थिर झीलों के निर्माण से खतरा लगातार बना हुआ है। 26 अगस्त 2026 को हिमालयी क्षेत्र में लैंगटांग लिरुंग के पास एक विशाल ग्लेशियर ढहने से आई इस जलप्रलय ने भारत-नेपाल सीमा पर स्थित बस्तियों और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। काठमांडू से लेकर सीमावर्ती जिलों तक सेना और स्थानीय प्रशासन राहत अभियान में जुटे हैं।

नेपाल जलप्रलय, 626 की मौत, हजारों लापता

नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती पहाड़ी इलाकों में बुधवार, 26 अगस्त की सुबह प्रकृति ने ऐसा तांडव मचाया जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। हिमालय के अत्यंत ऊंचाई वाले क्षेत्र (लगभग 5,200 मीटर) से ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर सीधे नीचे घाटी में आ गिरा। इस ‘डेब्री एवलांच’ (मलबे के स्खलन) ने भोटेकोशी, ल्हेंदे खोला और त्रिशूली नदियों में सुनामी जैसी लहरें पैदा कर दीं, जिन्होंने रास्ते में आने वाले गांवों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को तिनके की तरह बहा दिया। नेपाल पुलिस और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, शनिवार दोपहर तक मलबे और नदियों से 626 शव बरामद किए जा चुके हैं। वहीं 2,426 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं, जिनके जीवित बचने की उम्मीद समय बीतने के साथ कम होती जा रही है।

30 मिनट में 9 मीटर बढ़ा पानी, ताश के पत्तों की तरह ढहे बाजार

चश्मदीदों और स्थानीय प्रशासन के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 8:40 बजे अचानक पहाड़ों से गड़गड़ाहट की आवाज आई, जो किसी बड़े भूकंप जैसी महसूस हो रही थी। अमेरिकी और जर्मन सिस्मोमीटरों ने इस भूस्खलन के कारण 5.2 तीव्रता का कंपन दर्ज किया था। इसके मात्र 30 मिनट के भीतर त्रिशूली और भोटेकोशी नदी का जलस्तर अप्रत्याशित रूप से 9 मीटर (लगभग 30 फीट) तक ऊपर उठ गया। नदी किनारे बसे रसुवा और नुवाकोट जिलों के व्यापारिक केंद्रों और बाजारों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। चीन-नेपाल व्यापार का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार माना जाने वाला ‘रसुवागढ़ी ग्यारोंग पोर्ट’ पूरी तरह मलबे के नीचे दफन हो चुका है। सेटेलाइट तस्वीरों से साफ दिख रहा है कि बाढ़ का पानी कई मंजिला इमारतों के ऊपर से गुजर रहा था, जिससे पूरी बस्तियां पलक झपकते ही गायब हो गईं।

जलविद्युत परियोजनाओं में भारी तबाही, सुरंगों में फंसे मजदूर

इस आपदा का सबसे बड़ा खामियाजा नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र को भुगतना पड़ा है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी कॉरिडोर में स्थित कम से कम 14 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिससे देश की करीब 748 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता ठप पड़ गई है। लापता लोगों की संख्या अचानक बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि आपदा प्रबंधन विभाग ने बाद में इन प्रोजेक्ट्स में काम करने वाले 933 जलविद्युत श्रमिकों को लापता सूची में जोड़ा है। हालांकि, नेपाली सेना ने एक बेहद साहसिक अभियान चलाकर ‘अपर त्रिशूली जलविद्युत परियोजना’ की एक टनल (सुरंग) में फंसे 350 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है, लेकिन आशंका है कि कई अन्य सुरंगों में अभी भी सैकड़ों कर्मचारी मलबे के साथ दफन हैं।

320 से अधिक भारतीय तीर्थयात्री और पर्यटक लापता

चूंकि यह समय तिब्बत में स्थित पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा का है, इसलिए इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और भारतीय तीर्थयात्री मौजूद थे। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, बाढ़ के बाद से 320 भारतीय नागरिक और भारतीय मूल के 100 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। इनमें सद्गुरु की ईशा फाउंडेशन का 77 सदस्यीय एक दल भी शामिल है, जो पिछले दो दिनों से पूरी तरह संचार विहीन क्षेत्र में फंसा हुआ है। भारत सरकार ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है। ताईवान और तमिलनाडु के कुल 21 यात्रियों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि तिव्वत सीमा के पास फंसे करीब 96 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।

नई झीलों से दोबारा तबाही का मंडरा रहा खतरा

नेपाल आपदा प्राधिकरण के अधिकारियों ने चेतावनी जारी की है कि खतरा अभी टला नहीं है। पहाड़ों से गिरे विशाल मलबे के कारण रसुवागढ़ी सीमा से करीब 18 किलोमीटर ऊपर ल्हेंदे नदी का प्राकृतिक बहाव पूरी तरह रुक गया है। इसके चलते पहाड़ों के बीच एक विशाल और अस्थिर ‘कृत्रिम झील’ का निर्माण हो गया है, जिसमें करीब 50,000 क्यूबिक मीटर बर्फ का मलबा और पानी जमा है।मौसम विभाग ने इस सप्ताहांत प्रभावित इलाकों में और अधिक भारी बारिश की आशंका जताई है। यदि बारिश के दबाव से यह मलबे की दीवार टूटती है, तो निचले इलाकों में दोबारा भयंकर फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) आएगी। इसी खतरे को देखते हुए धादिंग, गोरखा, चितवन और नुवाकोट जिलों के तटीय इलाकों में ‘हाई अलर्ट’ जारी कर बस्तियों को खाली कराया जा रहा है।

शवों की पहचान और अंतरराष्ट्रीय मदद पर कूटनीतिक पेच

नेपाल के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती बरामद हो रहे शवों के प्रबंधन और उनकी पहचान की है। देश के अस्पतालों के मुर्दाघरों में केवल 300 से 350 शवों को रखने की ही क्षमता है, जबकि मौतों का आंकड़ा इससे दोगुना हो चुका है। चितवन इलाके से अब तक 178 शव निकाले जा चुके हैं, जिनमें से केवल 3 की पहचान हो पाई है। कई शव बहकर 240 किलोमीटर दूर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश की नदियों तक पहुंच गए हैं। इस भीषण मानवीय संकट के बीच नेपाल सरकार ने अमेरिका, चीन और अन्य पश्चिमी देशों द्वारा भेजी जा रही विदेशी रेस्क्यू टीमों को देश में प्रवेश देने से इनकार कर दिया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उनकी अपनी सुरक्षा एजेंसियां (सेना और सशस्त्र बल) इस संकट से निपटने में सक्षम हैं और वे 2015 के भूकंप जैसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक पेच में दोबारा नहीं फंसना चाहते।

भारत ने बढ़ाया सहयोग का हाथ

हालांकि, नेपाल ने पड़ोसी देश भारत से सड़कों और संपर्क को बहाल करने के लिए ‘बेली ब्रिज’ (अस्थायी पुल) और तकनीकी सहायता की मांग को स्वीकार किया है। रेड क्रॉस की रिपोर्ट के अनुसार, इस आपदा से सीधे तौर पर 90,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं, जिन्हें तत्काल भोजन, रहने की जगह और चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है। हिमालयी पर्यावरणविदों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियरों का इस तरह असमय टूटना आने वाले समय में पूरी मानव जाति के लिए एक बड़ी चेतावनी है।

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