Dilapidated Building Mumbai: महानगर की तेज रफ्तार जिंदगी और आसमान छूती महंगाई के बीच कई मुंबईकर आज भी जर्जर इमारतों में जान जोखिम में डालकर जी रहे हैं। मानसून के आते ही ये खतरा और भी बढ़ जाता है। महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) ने 96 इमारतों को और मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने 134 इमारतों को खतरनाक घोषित किया है, लेकिन कई निवासी आज भी इन्हें छोड़ने को तैयार नहीं हैं। Dangerous buildings in Mumbai
Dangerous Building in Mumbai: सिर्फ छत नहीं, ज़िंदगी का सवाल BMC Evacuation Notice
मुंबई के घाटकोपर की करीब 70 साल पुरानी नारायण नगर बिल्डिंग के दूसरे हिस्से को गिराने की तैयारी हो रही है। बीएमसी ने नोटिस थमा दिया है, लेकिन यहां रहने वाले 30 से ज़्यादा लोग अब भी यहीं डटे हुए हैं। एक निवासी ने बताया, “बिल्डिंग का रिडेवलपमेंट नहीं हो सकता क्योंकि सामने नेवी डिपो है। हमें ट्रांजिट कैंप में जगह नहीं मिली, तो कहां जाएं? किराया भी अफोर्ड नहीं कर सकते।” यही हाल माटुंगा के बलडोटा हाउस का है। 90 साल पुरानी इस इमारत को MHADA ने खतरनाक घोषित कर घर खाली करने का नोटिस चिपका दिया है। लेकिन यहां रहने वाले परिवार अपनी मजबूरी और बेबसी में घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। Jarjar Imarat
Dangerous Building in Mumbai: जर्जर इमारतें और मुंबई की बारिश, हर साल मौत का मंजर
हर साल मानसून के दौरान मुंबई में जर्जर इमारतें ढहने से दर्जनों मौतें होती हैं। MHADA की रिपोर्ट के अनुसार -इस साल 96 इमारतें खतरनाक घोषित की गईं है। इनमें करीब 3000 लोग रह रहे हैं। सबसे ज्यादा जोखिम वाले इलाके हैं मझगांव, गिरगांव, मोहम्मद अली रोड, खेतवाड़ी, दादर-माटुंगा। BMC ने भी अपने अधिकार क्षेत्र में 134 इमारतों को खतरे की सूची में डाला है। Monsoon Building Collapse Mumbai
‘पगड़ी सिस्टम’ बन रहा बड़ी समस्या
मुंबई की पगड़ी व्यवस्था भी इस खतरे की बड़ी वजह बनती जा रही है। दक्षिण और मध्य मुंबई में कई किराएदार 500 से 1000 रुपए जैसे बेहद कम किराए पर रहते हैं। ऐसे मकान मालिकों और किराएदारों के बीच की कानूनी लड़ाई, पुनर्निर्माण की दुविधा और डेवलपर्स के साथ विवादों के कारण ये इमारतें सालों तक बिना मरम्मत के खड़ी रहती हैं एक Ticking Time Bomb की तरह। नतीजा ये कि इन ढांचों में रहने वाले परिवार ना तो कहीं और जा सकते हैं, ना इन्हें कोई विकल्प मिलता है। और सिस्टम भी महज़ नोटिस चिपका कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। Mumbai Monsoon Date
“कहते हैं घर खाली करो, लेकिन कहां जाएं?”
घाटकोपर की निर्मला, जिनका घर गिर चुका है, आज अपनी पान की दुकान के सामने फुटपाथ पर दिन काट रही हैं। कहती हैं, “जिनके पास पैसे थे वो किराए पर चले गए, मैं कहां जाऊं? ट्रांजिट कैंप में जगह नहीं, कोई सरकारी मदद नहीं।”
सवाल उठता है, समाधान क्या है?
मुंबई जैसे शहर में, जहां किराए आसमान छू रहे हैं और जमीन का हर टुकड़ा करोड़ों का है, वहां ट्रांजिट कैंप या पुनर्विकास योजनाएं कछुए की चाल से भी धीमी चल रही हैं। सरकार और प्राधिकरणों की ओर से पुनर्विकास की प्रक्रिया तेज़ करने की बात हर साल होती है, लेकिन जमीनी हकीकत बदली नहीं। क्या सरकार इन परिवारों के लिए ठोस पुनर्वास योजना बनाएगी? क्या जर्जर इमारतें ढहने से पहले इनका विकल्प मिल पाएगा? या हर साल की तरह इस बार भी मानसून का पहला झटका कई ज़िंदगियों को लील जाएगा? मुंबई की जर्जर इमारतें सिर्फ एक ढांचा नहीं हैं, बल्कि उन हज़ारों ज़िंदगियों का बोझ हैं जो हर दिन टूटते भरोसे के बीच जी रही हैं। MHADA और BMC को अब कड़े कदम उठाने होंगे, वरना अगली इमारत के मलबे से फिर वही आवाज़ गूंजेगी – “कहते हैं घर खाली करो, लेकिन कहां जाएं?”