लालू-राबड़ी शासन पर ‘जंगलराज’ के ठप्पे और उसके राजनीतिक असर पर एक विशेष रिपोर्ट।
20 साल बाद भी क्यों भारी पड़ रहा RJD पर ‘जंगल राज’ का दाग?
बिहार की राजनीति का एक ऐसा दाग जो दो दशक बाद भी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के युवा नेता तेजस्वी यादव का पीछा नहीं छोड़ रहा है, वह है उनके माता-पिता लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के पंद्रह वर्षीय शासन (1990-2005) पर लगा ‘जंगल राज’ का ठप्पा। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक, एनडीए के तमाम नेता राजद पर हमले के लिए इसी शब्द का बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह विडंबना है कि आज मतदान करने वाले कई युवा उस दौर में पैदा भी नहीं हुए थे, जब राजद सत्ता में थी। इसके बावजूद, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस कुशासन, अराजकता और बदहाली की कहानियाँ नई पीढ़ी तक लोककथाओं की तरह पहुँच रही हैं, जिससे तेजस्वी यादव के लिए अपनी पार्टी की छवि सुधारना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
‘जंगल राज’ का जन्म: जब कोर्ट की एक टिप्पणी बनी राजनीतिक ब्रह्मास्त्र
इस शब्द का जन्म 1997 में हुआ था। चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव के इस्तीफे के बाद जब राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद संभाला, तब पटना उच्च न्यायालय ने जलभराव और खराब जल निकासी से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की थी कि “पटना की स्थिति जंगल राज से भी बदतर थी।” विपक्ष ने इस न्यायिक टिप्पणी को तत्काल राजनीतिक हथियार बना लिया और यह शब्द राजद के पंद्रह साल के शासन से स्थायी रूप से जुड़ गया।
अपहरण बना उद्योग: 4 साल में 1500 से अधिक मामले दर्ज, किसलय कांड ने देश को हिलाया
लालू-राबड़ी शासन के दौरान सबसे भयावह बात राजनीति का अपराधीकरण रही। उस समय फिरौती के लिए अपहरण एक उद्योग बन चुका था। आंकड़ों के अनुसार, 2001 से 2004 के बीच फिरौती के लिए अपहरण के 1,527 मामले दर्ज हुए। 2005 में पटना के स्कूली छात्र किसलय के अपहरण का मामला देशभर में सुर्खियों में रहा, जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सार्वजनिक मंच से “मेरा किसलय लौटा दो” कहना पड़ा था।
इसके साथ ही, जातीय नरसंहारों की क्रूर शृंखला चली। 1994 से 2000 के बीच अधिकतम 337 हत्याएँ हुईं। लक्ष्मणपुर बाथे (1997) और सेनारी (1999) जैसे नरसंहारों में सैकड़ों अनुसूचित जाति और उच्च जाति के लोगों को मौत के घाट उतारा गया। ‘ब्रोकन प्रॉमिसेस’ के लेखक मृत्युंजय शर्मा ने लिखा है कि सामाजिक न्याय की आड़ में राज्य की संस्थाओं को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया, जिससे 1991 और 2001 के बीच राज्य से पलायन में 200% की वृद्धि देखी गई।
ओबीसी एकता की नींव दरकी: ‘यादवीकरण’ ने नीतीश कुमार को सौंपा सत्ता का मार्ग
विश्लेषकों के अनुसार, लालू के शासनकाल को ‘राजनीति के मंडलीकरण’ और ‘धर्मनिरपेक्षीकरण’ के शुरुआती दौर के बाद ‘यादवीकरण’ में बँटा हुआ देखा जाता है। यादव समुदाय के सशक्तिकरण पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने के परिणामस्वरूप गैर-यादव ओबीसी और ईबीसी तबके अलग-थलग पड़ गए, जिसने 2005 में नीतीश कुमार के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त किया। राजद आज भी यह तर्क देता है कि ‘जंगल राज’ शब्द उनकी सामाजिक न्याय की उपलब्धियों से ध्यान हटाने की एक राजनीतिक साजिश है, लेकिन अपराध के ये भयावह आंकड़े और प्रशासनिक पतन की कहानियाँ आज भी तेजस्वी यादव के राजनीतिक सफर पर एक काली छाया बनकर मंडरा रही हैं।
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