देवबंद से ढाका तक… बांग्लादेश कैसे बना देवबंदी मदरसों का सबसे बड़ा केंद्र?

The CSR Journal Magazine
भारत के दारुल उलूम देवबंद से शुरू हुआ देवबंदी मदरसा आज बांग्लादेश में मदरसों का सबसे बड़ा नेटवर्क बन गया है। हाल के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के देवबंदी या कौमी मदरसों में पढ़ने वाले लगभग 60 प्रतिशत छात्र अब बांग्लादेश में हैं। यह स्थिति भारत और पाकिस्तान की तुलना में काफी अलग है, जहां मदरसों की संख्या और छात्रों की तादाद अपेक्षाकृत कम है।

संस्थानों और छात्रों की संख्या में इजाफा

बांग्लादेश के बोनिक वार्ता में छपे क़ौमी शिक्षा बोर्ड बेफ़ाक़ुल मदरिसिल अरबिया के डेटा के अनुसार, देश में पंजीकृत देवबंदी मदरसों की संख्या लगभग 32,730 है। इन मदरसों में लगभग 70 लाख छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, अन्य कौमी बोर्डों के तहत 10,000 से अधिक मदरसे हैं। कुल मिलाकर, बांग्लादेश में क़ौमी संस्थानों की संख्या 40,000 से अधिक होने का अनुमान है।

भारत और पाकिस्तान की तुलना में स्थिति

भारत में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अधीन 2024 में 20,900 शिक्षण संस्थान थे, जिनमें छात्र संख्या 23,71,404 है। पाकिस्तान में बेफाकुल मदरिसिल अरबिया के आंकड़ों के अनुसार, उनके पास कुल 27,048 मदरसे हैं और छात्रों की संख्या 24,23,223 है। इन आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट है कि बांग्लादेश ने इस क्षेत्र में तेजी से विकास किया है।

बांग्लादेश में क्यों बढ़ रहे हैं देवबंदी मदरसे?

बांग्लादेश में अधिकतर कौमी मदरसों में पढ़ाई मुफ्त या अत्यंत कम खर्च पर होती है, जिससे गरीब परिवार अपने बच्चों को यहां भेजते हैं। बांग्लादेश की अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम है और वे अपने धर्म को बढ़ावा देने के लिए अपने बच्चों को इन मदरसों में दाखिल कराते हैं। इसके अलावा, अभिभावक मानते हैं कि सरकारी शिक्षा में धार्मिक शिक्षा की कमी है, इसलिए वे अपने बच्चों को इस्लामी शिक्षा के लिए मदरसों में भेजते हैं।

सरकारी पंजीकरण और अनियंत्रण

बांग्लादेश के मदरसों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी पंजीकरण प्रणाली से बाहर है, जिससे तेजी से विस्तार किया जा रहा है। 2018 में ‘दौरा-ए-हदीस’ को मास्टर डिग्री के समकक्ष मान्यता मिली, जिससे इसकी स्वीकार्यता बढ़ी है। इसके विपरीत, भारत और पाकिस्तान में मदरसों की शिक्षा प्रणाली कानूनन पंजीकृत है और विभिन्न स्तरों पर सरकारी मान्यता प्राप्त है।

बांग्लादेश में दो तरह की राय

कौमी मदरसों के बारे में बांग्लादेश में दो दृष्टिकोण सामने आते हैं। एक पक्ष यह मानता है कि ये संस्थान इस्लामी शिक्षा और धार्मिक परंपरा को संरक्षित कर रहे हैं। वहीं, दूसरे पक्ष का तर्क है कि सरकारी पंजीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता बढ़ेगी।

रोजगार की चुनौतियां

BRAC इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट के अध्ययन के अनुसार, कौमी मदरसों से पढ़ाई पूरी करने वाले केवल 2.17% छात्र ही नियमित नौकरी पाते हैं। इसके विपरीत, 46.55% छात्र धार्मिक संस्थानों में काम कर रहे हैं, जैसे इमाम, मुअज्जिन, खतीब। यह दर्श

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