समूह बनकर लड़ेंगे हक की लड़ाई; अभिजीत दिपके ने की क्या बोलती पब्लिक अभियान की घोषणा

The CSR Journal Magazine

अभिजीत दिपके के ‘क्या बोलती पब्लिक’ अभियान से बदलेंगी आम जनता की आवाज़ें; महंगी शिक्षा, बेरोजगारी और दलबदल की राजनीति के खिलाफ CJP का देशव्यापी शंखनाद

देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा धांधली को लेकर छात्रों की आवाज़ बुलंद करने वाले ऑनलाइन आंदोलन और व्यंग्यात्मक राजनीतिक संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने देश की राजनीति और व्यवस्था को बदलने के लिए एक बिल्कुल नया रास्ता चुना है। 5 और 6 अगस्त को सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके के संभाजीनगर स्थित निवास पर आयोजित हुई कोर कमेटी की दो दिवसीय मैराथन बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि पार्टी चुनावी मैदान में उतरकर पारंपरिक राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगी। इसके विपरीत, संगठन देश का सबसे बड़ा और प्रभावी जन-दबाव समूह (पब्लिक प्रेशर ग्रुप) बनकर उभरेगा, जो सड़कों पर उतरकर जनता के हक की लड़ाई लड़ेगा।

‘क्या बोलती पब्लिक’ की आधिकारिक घोषणा

इस बैठक के बाद आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दिपके ने देशव्यापी अभियान ‘क्या बोलती पब्लिक’ की आधिकारिक घोषणा की। दिपके ने कहा, “नीट आंदोलन के बाद देश के युवाओं और आम जनता की उम्मीदें हमसे बहुत बढ़ गई हैं। हम उन राजनीतिक दलों जैसी गलती नहीं दोहराना चाहते जो जनता को केवल वोट बैंक समझते हैं और चुनाव जीतने के बाद उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं।”

पहला और सबसे बड़ा प्रहार: शिक्षा का बाजारीकरण और लूट

अभिजीत दिपके ने देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि आज भारत में शिक्षा कोई सेवा नहीं बल्कि पूरी तरह मुनाफे का धंधा बन चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया, “आज कक्षा 1 (पहली क्लास) के बच्चे के दाखिले के लिए निजी स्कूलों में सालाना फीस 1 लाख रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक वसूली जा रही है, और इसके ऊपर से लाखों रुपये का डोनेशन अलग से देना पड़ता है। ऐसे में देश का मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दिला सकता है? वे इतने पैसे लाएंगे कहाँ से?” दिपके ने स्कूल और कॉलेज के साथ-साथ बड़े कोचिंग क्लासों की मनमानी और आर्थिक लूट को रोकने के लिए कड़े नियामक कानून बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा के लिए माता-पिता को बैंकों से महंगे ब्याज पर लोन लेने पड़ रहे हैं, जिससे कई परिवार कर्ज के दलदल में धंसते जा रहे हैं। ‘क्या बोलती पब्लिक’ अभियान के जरिए CJP पूरे देश के अभिभावकों और छात्रों को एकजुट करेगी ताकि शिक्षा को हर नागरिक के लिए वहन करने योग्य (Affordable) बनाया जा सके।

दलबदल की राजनीति और जनता के विश्वास का संकट

नीट पेपर लीक मामले में तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सीजेपी का हौसला बुलंद है। अब इस नए अभियान के तहत संगठन उन नेताओं और जनप्रतिनिधियों को अपने निशाने पर लेने जा रहा है जो पाला बदलने में माहिर हैं। दिपके ने कहा कि वर्तमान समय में देश के भीतर “संस्थागत जवाबदेही” (Institutional Accountability) पूरी तरह से खत्म हो चुकी है और यह लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक स्थिति है। उन्होंने मतदाताओं के दर्द को बयां करते हुए कहा, “जनता सुबह किसी और विचारधारा या पार्टी को देखकर वोट करती है, लेकिन शाम होते-होते राजनीतिक जोड़-तोड़ से सरकार किसी और की बन जाती है। चुने हुए विधायक और सांसद अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए दूसरी पार्टियों में चले जाते हैं। इस दलबदल से आम जनता का चुनावी प्रणाली, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा उठ रहा है। ‘क्या बोलती पब्लिक’ अभियान के माध्यम से हम जनता के बीच जाएंगे और दलबदल करने वाले नेताओं का सामाजिक और राजनीतिक बहिष्कार करने के लिए जनमत तैयार करेंगे।”‘

जेन-जी’ (Gen Z) को नजरअंदाज करना भारी पड़ेगा

दिपके ने रेखांकित किया कि भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। जंतर-मंतर पर एक महीने तक डटे रहने वाले प्रदर्शनकारी भी इसी आयु वर्ग के थे। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि आज की मुख्यधारा की राजनीति ‘जेन-जी’ और युवाओं की उम्मीदों, उनके सपनों और उनकी वास्तविक समस्याओं पर कभी चर्चा नहीं करती। युवाओं को अक्सर अनुभवहीन कहकर राजनीतिक संवादों से दूर रखा जाता है या उनकी आवाज़ को दबा दिया जाता है। ‘क्या बोलती पब्लिक’ कोई पारंपरिक रैलियों वाला अभियान नहीं होगा, बल्कि यह एक राष्ट्रव्यापी दौरा (Nationwide Tour) होगा जिसमें नुक्कड़ सभाओं, डिजिटल संवादों और सीधे संपर्क के जरिए युवाओं के मन की बात सुनी जाएगी। इस आंदोलन का मुख्य मंत्र ही यही है कि पहले जनता की समस्याओं को सुना जाए, फिर उन्हें एक बड़े जन-आंदोलन का रूप देकर सरकार को कदम उठाने पर मजबूर किया जाए।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

भले ही जंतर-मंतर के आंदोलन को देशव्यापी डिजिटल समर्थन मिला हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इस तरह के गैर-राजनीतिक दबाव समूह को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। कुछ विशेषज्ञों और अभिभावकों का मानना है कि जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा के खिलाफ मिली आंशिक सफलता के बाद अब युवा वापस अपने करियर और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, जिससे भविष्य में इस आंदोलन के जमीनी जुड़ाव में थोड़ी कमी आ सकती है।

राजनीतिक दबाव के खिलाफ अभियान

हाल के दिनों में अभिजीत दिपके और उनके परिवार द्वारा यह भी दावे किए गए कि उन पर राजनीतिक दबाव बनाने और आंदोलन को बदनाम करने के लिए बाहरी तत्वों या गुंडों का सहारा लिया गया, जिसने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद, CJP के वालंटियर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। संगठन का मानना है कि देश को इस समय किसी नई राजनीतिक पार्टी की नहीं, बल्कि एक ऐसे निडर और निष्पक्ष जन-आंदोलन की जरूरत है जो सीधे सत्ता की आंखों में आंखें डालकर आम आदमी के हक के सवाल पूछ सके। सितंबर से शुरू होने वाला ‘क्या बोलती पब्लिक’ अभियान देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में आम जनता की वास्तविक भागीदारी को तय करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। आम जनता की दबी हुई आवाज़ों को इस मंच के जरिए एक नया और मजबूत लाउडस्पीकर मिलने की उम्मीद है।

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