मरुधरा से बंगाल तक बच्चों की गुमशुदगी का खौफनाक नेटवर्क, हर दिन 269 मासूम हो रहे लापता

The CSR Journal Magazine
देश में बच्चों की गुमशुदगी अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट बन चुकी है।
एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हजारों बच्चे हर साल गायब हो रहे हैं। कहीं मानव तस्करी का जाल है तो कहीं सोशल मीडिया पर फैलता धोखे का नेटवर्क। राजस्थान में हर दिन गायब होने वाले बच्चों में 84 प्रतिशत लड़कियां हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गरीबी, डिजिटल फ्रॉड, पारिवारिक तनाव और बाल विवाह जैसी समस्याएं इस संकट को और गहरा बना रही हैं।

बंगाल से बिहार तक मानव तस्करी का बड़ा जाल

एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल बच्चों की गुमशुदगी के मामलों में देश में सबसे ऊपर है। यहां 22 हजार से अधिक बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए गए हैं। नेपाल और बांग्लादेश सीमा से जुड़े होने के कारण यह इलाका मानव तस्करों के लिए आसान रास्ता बन गया है। गरीब परिवारों की बच्चियों को नौकरी, मॉडलिंग या शहरों में बेहतर जिंदगी का सपना दिखाकर ले जाया जाता है और बाद में उन्हें देह व्यापार या जबरन मजदूरी में धकेल दिया जाता है। बिहार में भी हर साल 12 से 14 हजार बच्चे गायब हो रहे हैं। यहां से बड़ी संख्या में लड़कों को महानगरों की फैक्ट्रियों, ढाबों और छोटे उद्योगों में बंधुआ मजदूरी के लिए भेजा जाता है। पुलिस एजेंसियों के अनुसार कई मामलों में बच्चों को संगठित गिरोह बहला-फुसलाकर या अगवा कर लेते हैं।

सोशल मीडिया और डिजिटल जाल बन रहा बड़ा खतरा

महाराष्ट्र में बच्चों की गुमशुदगी का पैटर्न दूसरे राज्यों से अलग है। यहां अधिकतर मामले 12 से 18 वर्ष के किशोरों से जुड़े हैं।
इंस्टाग्राम, फेसबुक, ऑनलाइन गेमिंग और चैटिंग ऐप्स के जरिए अनजान लोगों से संपर्क बढ़ना बच्चों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई किशोर ग्लैमर की दुनिया, रिलेशनशिप या सोशल मीडिया फेम के लालच में घर छोड़ देते हैं। कई बार स्क्रीन के पीछे बैठा व्यक्ति कोई दोस्त नहीं बल्कि अपराधी होता है। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि ऑनलाइन ग्रूमिंग और साइबर ट्रैप के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। माता-पिता और स्कूलों को बच्चों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखने और साइबर सुरक्षा की जानकारी देने की जरूरत है।

राजस्थान और मध्य प्रदेश में लड़कियां सबसे ज्यादा निशाने पर

राजस्थान में 7,198 बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए गए, जिनमें 84 प्रतिशत से अधिक लड़कियां हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बाल विवाह, पारिवारिक दबाव और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी इसकी बड़ी वजह है। कई किशोरियां जबरन शादी से बचने के लिए घर छोड़ देती हैं और बाद में अपराधियों के जाल में फंस जाती हैं। मध्य प्रदेश में भी 11 हजार से अधिक बच्चे गायब हुए। राज्य के आदिवासी और दूरदराज इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण कई मामलों की रिपोर्ट देर से दर्ज होती है। रोजगार के झांसे में बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाने के मामले भी लगातार सामने आ रहे हैं।

कानून सख्त, लेकिन चुनौतियां अब भी बड़ी

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब किसी भी नाबालिग के गायब होने पर सीधे अपहरण की धारा में FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
इसी वजह से अब आंकड़े पहले की तुलना में ज्यादा पारदर्शी दिखाई दे रहे हैं। हालांकि पुलिस और एजेंसियों ने बड़ी संख्या में बच्चों को बरामद भी किया है, लेकिन देश में अब भी 48 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती 24 घंटे यानी ‘गोल्डन ऑवर्स’ सबसे अहम होते हैं, लेकिन कई परिवार डर या सामाजिक दबाव में पुलिस तक देर से पहुंचते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल कानून से यह समस्या खत्म नहीं होगी। परिवारों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा, स्कूलों में डिजिटल सेफ्टी की शिक्षा देनी होगी और समाज को भी सतर्क नागरिक की भूमिका निभानी होगी। यदि किसी स्टेशन, बस स्टैंड या सार्वजनिक जगह पर कोई बच्चा संदिग्ध परिस्थिति में दिखे तो तुरंत चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 या पुलिस को सूचना देना जरूरी है।

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