Tamilnadu सरकार ने गो-हत्या पर रोक के खिलाफ SC में लगाई याचिका

The CSR Journal Magazine
तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (स्पेशल लीव पिटिशन) दायर की है। यह याचिका मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ है, जिसमें राज्यभर में गोहत्या पर रोक लगाने के लिए 1976 के सरकारी आदेश को लागू करने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय के जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्य को गायों और बछड़ों की हत्या को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

गायों की सुरक्षा का संविधानिक प्रावधान

जस्टिस स्वामीनाथन ने जोर देकर कहा था कि संविधान गायों, बछड़ों और अन्य दूध देने वाले मवेशियों की हत्या को रोकने का आश्वासन देता है। उनके द्वारा दिए गए फैसले में यह भी कहा गया कि मुस्लिम त्योहार बकरीद के चलते किसी भी तरह से गाय या बछड़े की हत्या न की जाए। इस संदर्भ में, यह कदम साबित करता है कि राज्य सरकार जानवरों की सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है।

हिंदू मक्कल काची की भागीदारी

इस याचिका में हिंदू मक्कल काची के युवा विंग के सचिव के. सूर्या को प्रतिवादी बनाया गया है। उन्होंने पहले ही उच्च न्यायालय में अदालती याचिका दायर की थी। साथ ही, पुलिस महानिदेशक और अन्य अधिकारियों को भी याचिका में शामिल किया गया है। सूर्या की ओर से पेश वकील पी.वी. योगेश्वरन ने सुप्रीम कोर्ट में ‘कैविएट’ दाखिल की है, ताकि अदालत उनके मामले की सुनवाई से पहले सूचित की जा सके।

मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने 27 मई को स्पष्ट किया था कि कोई भी जानवर अपनी पसंद की जगह पर काटा नहीं जा सकता। उन्हें केवल बूचड़खाने में या विशेष तौर पर निर्धारित स्थानों पर ही काटा जाना चाहिए। इस आदेश का आधार 1976 का वही नियम है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और दूध उत्पादन में सुधार के लिए गो-हत्या पर रोक लगाता है।

संविधान सभा की चर्चाओं का संदर्भ

जस्टिस स्वामीनाथन ने इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए संविधान सभा की बैठकों में की गई चर्चाओं को भी संदर्भित किया। उन्होंने कहा कि गाय एक पूजनीय पशु है और हमारी संस्कृति से गहरा संबंध रखती है। अदालत ने यह भी कहा कि इसी कारण से राज्य को गायों के संरक्षण के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

तमिलनाडु सरकार की यह याचिका इस बात का संकेत है कि वे उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यह मामला कई सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या निर्णय लेता है और तमिलनाडु की कानून व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है।

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