खामोश होती FM रेडियो की आवाज: नीतिगत और आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी आवाज की दुनिया

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रेडियो इंडस्ट्री की सरकार से 5 प्रमुख अपेक्षाएं: FM इंडस्ट्री पर बढ़ता संकट, राहत नहीं मिली तो थम जाएगी रफ्तार

देश का प्राइवेट FM रेडियो सेक्टर इस समय कई चुनौतियों से जूझ रहा है। विज्ञापन घटने, खर्च बढ़ने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रभाव से रेडियो की कमाई पर नकारात्मक असर पड़ा है। इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द राहत नहीं मिली, तो आने वाले समय में और FM स्टेशन बंद होने की संभावना है। सही फैसले होने से सेक्टर में निवेश बढ़ सकता है और नए रोजगार के अवसर भी बन सकते हैं। FM कंपनियों की एक प्रमुख मांग है कि उन्हें न्यूज प्रसारण की अनुमति दी जाए। भारत में प्राइवेट FM रेडियो चैनलों को अपने लिए स्वतंत्र न्यूज कंटेंट प्रसारित करने की इजाजत नहीं है। कंपनियों का मानना है कि केवल संगीत पर निर्भर रहना अब संभव नहीं है। न्यूज का प्रसारण रेडियो को एक नई दिशा देने में सहायक हो सकता है।

भारत में निजी एफएम (FM) रेडियो उद्योग का गहराता संकट

भारत में निजी एफएम (FM) रेडियो उद्योग इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है। देश की प्रमुख मीडिया कंपनियों में से एक, एचटी मीडिया (HT Media) और उसकी सहायक कंपनियों द्वारा दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े महानगरों में ‘रेडियो नशा’, ‘रेडियो वन’ और ‘फीवर एफएम’ जैसे लोकप्रिय स्टेशनों को बंद करने और उनके लाइसेंस सरेंडर करने के फैसले ने इस संकट को पूरी तरह उजागर कर दिया है। यदि सरकार और नियामक संस्थाओं द्वारा तुरंत राहत नहीं दी गई, तो आने वाले समय में देश के दर्जनों अन्य एफएम स्टेशन भी हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं।

संकट की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

भारत में निजी एफएम रेडियो के विकास को गति देने के लिए सरकार ने विभिन्न चरणों (Phases) में नीलामियां आयोजित की थीं। फेज-3 (Phase-3) की नीलामी के तहत कंपनियों ने भारी निवेश किया। उद्योग जगत ने सरकार को वन-टाइम एंट्री फीस (OTEF) के रूप में लगभग ₹4,155 करोड़ का भुगतान किया। इसके अलावा, कंपनियां हर साल करोड़ों रुपये की माइग्रेशन और लाइसेंस फीस देती आ रही हैं। इसके बावजूद, आज स्थिति यह है कि इन बंद हो रहे स्टेशनों का कुल नेटवर्थ माइनस ₹172.08 करोड़ तक पहुंच चुका है। लगातार होते वित्तीय नुकसान के कारण अब इन स्टेशनों को चलाना कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से असंभव (unviable) हो गया है।

संकट के मुख्य कारण

एफएम रेडियो उद्योग के इस हाल के पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह गलत सरकारी नीतियों, तकनीकी बदलावों और बाजार की बदलती परिस्थितियों का एक जटिल मिश्रण है।

डिजिटल मीडिया और स्ट्रीमिंग ऐप्स का उदय

पिछले एक दशक में भारत में डेटा क्रांति (Data Revolution) हुई है। इसके कारण श्रोताओं का व्यवहार पूरी तरह बदल गया है। आज Spotify, YouTube Music, JioSaavn, और Wynk जैसे म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स ने रेडियो की जगह ले ली है। इन ऐप्स पर उपभोक्ता अपनी पसंद के गाने बिना किसी विज्ञापन के या बहुत कम विज्ञापनों के साथ सुन सकते हैं। इसके अलावा, पॉडकास्ट (Podcasts) के बढ़ते चलन ने भी रेडियो के टॉक-शो वाले श्रोताओं को अपनी ओर खींच लिया है।

विज्ञापन राजस्व (Ad Revenue) में भारी गिरावट

रेडियो एक फ्री-टू-एयर (Free-to-Air) माध्यम है, यानी यह श्रोताओं से कोई पैसा नहीं लेता। इसकी पूरी कमाई विज्ञापनों पर निर्भर करती है। डिजिटल मीडिया (Google, Facebook, Instagram) के आने से विज्ञापनदाताओं (Advertisers) का रुख बदल गया है। डिजिटल विज्ञापन अधिक लक्षित (Targeted) होते हैं और उनके परिणाम को मापना आसान होता है। इसके परिणामस्वरूप, कंपनियों ने अपना विज्ञापन बजट रेडियो से हटाकर डिजिटल की तरफ मोड़ दिया है। रही-सही कसर कोविड-19 महामारी ने पूरी कर दी, जिससे उबरने में रेडियो उद्योग आज भी संघर्ष कर रहा है।

अत्यधिक लाइसेंस फीस और सरकारी कर (Tax) का बोझ

रेडियो स्टेशनों को हर साल सरकार को भारी लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम शुल्क देना पड़ता है। यह फीस उनके राजस्व (Revenue) से जुड़ी होती है, लेकिन न्यूनतम निश्चित राशि (Minimum Assured Fee) इतनी अधिक है कि कमाई कम होने पर भी कंपनियों को भारी भुगतान करना पड़ता है। इसके अलावा, रेडियो विज्ञापनों पर 18% की उच्च जीएसटी (GST) दर लागू है, जो इस उद्योग की कमर तोड़ रही है।

स्मार्टफोन्स में एफएम रिसीवर का न होना या बंद होना

आज 90% से अधिक लोग रेडियो सुनने के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, अधिकांश आधुनिक स्मार्टफोन्स (विशेषकर प्रीमियम और 5G फोन) में इन-बिल्ट एफएम रेडियो चिप या तो होती नहीं है, या मोबाइल कंपनियां उसे सॉफ्टवेयर के जरिए ब्लॉक कर देती हैं। इसके कारण उपभोक्ता बिना इंटरनेट के मुफ्त में रेडियो नहीं सुन पाते। इंटरनेट पर रेडियो सुनने के लिए उन्हें डेटा खर्च करना पड़ता है, जिससे वे स्ट्रीमिंग ऐप्स को प्राथमिकता देने लगते हैं।

समाचार (News) प्रसारण पर प्रतिबंध

भारत में निजी एफएम चैनलों को स्वतंत्र रूप से समाचार और करंट अफेयर्स प्रसारित करने की अनुमति नहीं है। वे केवल ऑल इंडिया रेडियो (AIR) के समाचारों को ही जस का तस प्रसारित कर सकते हैं। यह प्रतिबंध उनकी सामग्री (Content) की विविधता को सीमित करता है। जब तक कोई माध्यम समाचार या स्थानीय मुद्दों पर स्वतंत्र चर्चा नहीं कर सकता, तब तक वह केवल संगीत के भरोसे लंबे समय तक दर्शकों को बांधकर नहीं रख सकता।

उद्योग को बचाने के लिए “4-सूत्रीय फॉर्मूला” (4-Point Formula)

एसोसिएशन ऑफ रेडियो ऑपरेटर्स फॉर इंडिया (AROI) और उद्योग के विशेषज्ञों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के सामने एक ‘4-सूत्रीय सुधार’ का प्रस्ताव रखा है। यदि सरकार इन मांगों को मान लेती है, तो इस डूबते हुए सेक्टर को संजीवनी मिल सकती है-
4% एजीआर (AGR) मॉडल लागू करना: वर्ष 2030 के बाद फेज-3 के लाइसेंस समाप्त हो रहे हैं। उद्योग की मांग है कि सरकार इन लाइसेंसों के विस्तार के लिए दोबारा महंगी नीलामी न कराए। इसके बजाय, टेलीकॉम सेक्टर की तर्ज पर 4% एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) मॉडल लागू किया जाए, जहां कंपनियां अपनी वास्तविक कमाई का एक निश्चित छोटा हिस्सा सरकार को फीस के रूप में दें।
जीएसटी (GST) दरों में कटौती: रेडियो विज्ञापनों पर लगने वाले GST को 18% से घटाकर 5% किया जाए। इससे विज्ञापनदाताओं के लिए रेडियो पर विज्ञापन देना सस्ता और आकर्षक हो जाएगा, जिससे इस माध्यम की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
स्मार्टफोन्स में FM अनिवार्य करना: सरकार सभी मोबाइल निर्माताओं के लिए यह अनिवार्य करे कि वे फोन में एफएम रिसीवर (FM Chip) को एक्टिवेट रखें। इससे देश के करोड़ों मोबाइल यूजर्स बिना किसी डेटा चार्ज के मुफ्त में एफएम रेडियो सुन सकेंगे, जिससे श्रोताओं की संख्या (Listenership) में तुरंत भारी उछाल आएगा।
स्वतंत्र समाचार प्रसारण की अनुमति: निजी एफएम चैनलों को भी समाचार और करंट अफेयर्स प्रसारित करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। इससे न केवल रेडियो की सामग्री समृद्ध होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

राहत न मिलने पर होने वाले गंभीर परिणाम

यदि सरकार इन सुधारों को लागू करने में देरी करती है, तो इसके परिणाम केवल मीडिया कंपनियों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा-
हजारों नौकरियों का नुकसान: रेडियो केवल आरजे (RJ) का काम नहीं है। एक स्टेशन के पीछे साउंड इंजीनियर, कॉपीराइटर, सेल्स टीम, क्रिएटिव हेड और प्रशासनिक स्टाफ की एक पूरी फौज होती है। स्टेशनों के बंद होने से हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार खत्म हो जाएंगे।
सरकारी राजस्व की हानि: वर्तमान में एफएम रेडियो एकमात्र ऐसा मीडिया वर्टिकल है जो सरकार को भारी लाइसेंस फीस और टैक्स देता है। यदि कंपनियां अपने लाइसेंस सरेंडर कर देंगी, तो सरकार को मिलने वाला यह राजस्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
आपदा प्रबंधन (Disaster Management) को झटका: रेडियो को ‘जनता का माध्यम’ माना जाता है। चक्रवात, बाढ़, भूकंप या युद्ध जैसी आपातकालीन स्थितियों में जब मोबाइल नेटवर्क और बिजली ग्रिड फेल हो जाते हैं, तब केवल ट्रांजिस्टर और रेडियो ही नागरिकों तक राहत और बचाव की जानकारी पहुंचाने का एकमात्र साधन बचते हैं। रेडियो उद्योग का खत्म होना राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से एक बड़ा नुकसान होगा।

लाइसेंस रिन्यूअल में बदलाव की अपेक्षा

रेडियो कंपनियों का तर्क है कि पुराना ऑक्शन मॉडल अब मौजूदा विज्ञापन बाजार के अनुसार नहीं है। वे 2030 के बाद FM फेज-3 लाइसेंस का रिन्यूअल बाजार के अनुरूप तय करने की मांग कर रहे हैं, ताकि वे अपने खर्च और निवेश को संतुलित कर सकें।

एनुअल लाइसेंस फीस हटाने की आवश्यकता

रेडियो सेक्टर का कहना है कि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न फीस और टैक्स में चला जाता है। इस स्थिति में कंटेंट, तकनीकी सुधार और नए शहरों में विस्तार के लिए निवेश करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कंपनियां एनुअल लाइसेंस फीस खत्म करने की मांग कर रही हैं।

बड़े शहरों में FM स्टेशनों की स्थिति चिंताजनक

हाल ही में कई बड़े शहरों में FM रेडियो स्टेशनों पर संकट का स्पष्ट असर नजर आने लगा है। कई कंपनियों ने अपने FM लाइसेंस सरेंडर करने का निर्णय लिया है। इससे न केवल रोजगार पर असर पड़ा है, बल्कि सरकार की कमाई भी प्रभावित हुई है। रेडियो इंडस्ट्री की लगातार बढ़ती चुनौतियां अब विज्ञापन बाजार पर भी प्रभाव डाल रही हैं। कंपनियों का कहना है कि अगर आवश्यक बदलाव जल्द नहीं हुए, तो आने वाले समय में रेडियो सेक्टर की समस्याएं और बढ़ सकती हैं।

रेडियो सेक्टर पर बढ़ती चुनौतियों का असर

FM रेडियो केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, स्थानीय बोलियों और सूचना के प्रसार का एक बेहद सशक्त और मुफ्त माध्यम है। इस उद्योग को इस समय किसी खैरात (Bailout) की नहीं, बल्कि तार्किक और व्यावहारिक नीतिगत सुधारों की जरूरत है।एचटी मीडिया जैसी दिग्गज कंपनी का पीछे हटना एक चेतावनी है कि समय तेजी से निकल रहा है। यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और ट्राई (TRAI) ने मिलकर तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो भारतीय हवाओं से एफएम रेडियो की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो सकती है। सरकार को इस उद्योग को एक ‘राजस्व कमाने वाली मशीन’ के रूप में देखना बंद करके, इसे एक ‘सार्वजनिक सेवा माध्यम’ के रूप में बचाने का प्रयास करना चाहिए।

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