गांधी की अनसुनी कहानी और नेहरू का भावुक पल: आजादी की पहली रात की सच्चाई

The CSR Journal Magazine
14 अगस्त 1947 की शाम, जब नई दिल्ली में लुटियंस की गलियों में भीड़ एकत्रित हो रही थी, उस समय नेहरू को एक ऐसी खबर मिली जिसने उन्हें भावुक कर दिया। भारतीय स्वतंत्रता के पहले प्रधानमंत्री बनने की तैयारी में लगे नेहरू का चेहरा फोन पर बात करते समय अचानक परिवर्तन हो गया। लाहौर की स्थिति देखकर उनके आंखों में आंसू आ गए। इस मुश्किल समय में उनकी बेटी इंदिरा गांधी पास ही थीं। नेहरू ने कहा था, ‘लाहौर जल रहा है, और मैं कैसे भाषण दूंगा?’ फ्रीडम एट मिडनाइट के अनुसार, यह पल उस समय के राजनीतिक संघर्ष को दर्शाता है।

गांधी का साहस और कलकत्ता की उमंग

13 अगस्त 1947 की दोपहर, जब गांधी कलकत्ता की गंदगी से भरी बस्तियों में जा रहे थे, तब उनकी स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वहां की भीड़ ने उन पर पत्थर और बोतलें फेंकीं। लेकिन गांधी ने दिलेरी से कहा, ‘मारना चाहते हो? मैं सामने हूं।’ उनकी यह चेष्ठता भीड़ को शांत करने में सफल रही। गांधी ने वहां रहकर हिंदू-मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करने की कोशिश की। इससे एक नया संदेश उभरा कि जब आजादी का सपना साकार हो रहा था, तब हमें भाईचारा बनाए रखना जरूरी है।

जिन्ना का जश्न और पाकिस्तान का अविस्मरणीय क्षण

वहीं करांची में मोहम्मद अली जिन्ना स्वतंत्रता का जश्न मना रहे थे। खुली गाड़ी में निकलते हुए जिन्ना ने अपनी जान की परवाह किए बिना लोगों का अभिवादन किया। इस जश्न के बीच अमेरिका से मिली एक चेतावनी ने उनके कार्यक्रम को और भी खास बना दिया। आर.एस.एस. द्वारा बम फेंकने की साजिश की खबर सुनकर माउंटबेटन ने जिन्ना को बंद गाड़ी में यात्रा करने की सलाह दी, लेकिन जिन्ना ने इसे ठुकरा दिया।

गांधी की प्रार्थना सभा और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश

15 अगस्त की सुबह गांधी की प्रार्थना सभा में हजारों लोग शामिल हुए। गांधी ने वहां कुछ ऐसा कहा जो स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण था, ‘इस आजादी को हमें एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप रही है।’ उनके शब्दों ने उस समय साम्प्रदायिक तनाव को कम करने में मदद की। उस दिन गांधी ने उपवास रखा, जबकि उनका ध्यान दूसरों को बचाने पर था। यह भारत की आजादी का एक अनूठा पहलू था, जहां जश्न पर जिम्मेदारी का विजयी होना आवश्यक था।

नेहरू का झंडा फहराना और दिल्ली की भीड़

15 अगस्त को जब नेहरू ने इंडिया गेट पर झंडा फहराया, उस समय करीब पांच लाख लोगों की भीड़ एकत्रित हुई थी। न केवल उत्साह था, बल्कि कई लोगों ने खाना तक नहीं खाया क्योंकि उन्हें जगह नहीं मिली। नेहरू इस अद्भुत दृश्य को देखकर अभिभूत थे। फ्रीडम एट मिडनाइट के अनुसार, जब झंडा लहराया, तो भीड़ में लोगों की आवाज गूंज उठी, ‘जयहिंद!’ यह पल भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण बना।

धार्मिक जश्न और पहचान का संघर्ष

पाकिस्तान में जिन्ना ने अपने जीते जागते जश्न को मनाते हुए स्वतंत्रता के गरिमामय पल को समझा। उनके लिए यह एक निजी उत्सव था, जबकि उनकी पुत्री दी

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