कौन हैं अंबाला में पीटे खालिस्तान विरोधी नेता मंड: पंजाब कांग्रेस से निकाले गए

The CSR Journal Magazine
अंबाला के पंजोखरा साहिब में 7 अगस्त को खालिस्तान विरोधी नेता गुरसिमरन सिंह मंड पर हमला हुआ। मंड उस दिन गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकने पहुंचे थे, जहां कुछ श्रद्धालुओं ने उन्हें देखकर विरोध शुरू कर दिया। इस विरोध के बाद, भीड़ ने मंड पर हमला कर दिया। इस हमले में चार लोग घायल हुए, और उनकी कार भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई। मंड, जो पंजाब की राजनीति में एक प्रमुख चेहरा हैं, खालिस्तान के खिलाफ अपने विचारों के लिए जाने जाते हैं।

मंड की बढ़ती चिंताएँ

गुरसिमरन सिंह मंड लंबे समय तक कांग्रेस में सक्रिय रहे हैं, लेकिन उनकी पहचान खालिस्तान विरोधी नेता के तौर पर बन गई है। उन्हें अक्सर धमकियाँ मिलती रही हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता होती रहती है। पिछले कुछ समय से उन्होंने भाजपा का समर्थन करना शुरू कर दिया है, जिससे उनके राजनीतिक सफर में नया मोड़ आया है।

राजीव गांधी की प्रतिमा का विवाद

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रतिमा को पगड़ी से साफ करने की घटना के बाद मंड अचानक सुर्खियों में आए थे। इस घटना ने उन्हें एक नयी पहचान दी, जिससे उनकी स्पीच और सोच पर ध्यान दिया जाने लगा। यह घटना उन्हें और विवादों में फंसा सकती है, क्योंकि ये उनके विचारों पर सवाल उठाती है।

हमले के कारणों की जांच

7 अगस्त को अंबाला में हुए हमले के कारणों की जांच चल रही है। मंड ने अस्पताल से मीडिया को बताया कि कट्टरपंथियों ने उनसे खालिस्तानी नारे लगाने का दबाव डाला था। जब उन्होंने मना किया तो उन पर हमला किया गया। इस मामले में पुलिस की कार्रवाई जारी है। मंड ने कहा कि वे 12 से अधिक FIR दर्ज करा चुके हैं, जिसमें उन्हें मिली धमकियों का जिक्र है।

भाजपा का समर्थन और कांग्रेस से दूरी

मंड का राजनीतिक सफर कांग्रेस के साथ शुरू हुआ था, लेकिन समय के साथ उनका उनके पार्टी में सामंजस्य कम होता गया। अब वे भाजपा का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने एक बार इंदिरा गांधी की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनकर भावनात्मक संदेश दिया। मंड की मुख्य पहचान खालिस्तान विरोधी नेता की बन गई है, जो अभी तक विवादों में रहे हैं।

लीडर और विवादों का चक्रव्यूह

गुरसिमरन सिंह मंड का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। उनका नाम विभिन्न विवादों में आता रहा है, जिसमें सुरक्षा की चिंता और राजनीतिक समर्थन का बदलाव शामिल है। अंबाला में हुए हालिया हमले ने एक बार फिर उन्हें चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया है। उन्हें लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वे उनके भविष्य की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

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