नेपाल में बाढ़: इंसानी दखल के खतरनाक परिणाम

The CSR Journal Magazine
नई दिल्ली: नेपाल में आई बाढ़ ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। अचानक आई इस आपदा में बड़ी-बड़ी इमारतें जैसे ताश के पत्ते उड़ गईं। अब तक 600 लोगों की मौत और 2 हजार के करीब लोग लापता होने की खबरें हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है, मौत का आंकड़ा बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

प्राकृतिक खतरे का संकेत

जिओ पॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने बाढ़ को लेकर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि यह प्राकृतिक आपदा भू-आकृति विज्ञान (Geomorphological Research) से जुड़ी रिसर्च का एक प्रमाण है। पहाड़ी इलाकों और नदियों के रास्तों में इंसानी दखल के कारण प्राकृतिक खतरे और भी भयानक हो सकते हैं।

बर्फीला तूफान कैसे आया?

चेलानी के अनुसार, सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि एक ग्लेशियर से बर्फ और चट्टानों का एवलांच टूट गया। यह एवलांच तिब्बत सीमा पर गिरकर सीमा पार बहने वाली नदी प्रणाली में मिला। तिब्बत के बुनियादी ढांचे ने निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर को और बढ़ा दिया। उन्होंने बताया कि कृत्रिम संरचनाओं ने बाढ़ के पानी को फैलने से रोका, जिससे पानी की गति बहुत तेज हो गई।

बाढ़ का स्वरूप और प्रभाव

सीमित प्रवाह में गंदगी, मिट्टी और चट्टानों का मिश्रण बना, जिसने नेपाल के कोशी और त्रिशूली नदी बेसिन में जबर्दस्त तबाही मचाई। यह अत्यधिक घनी सामग्री ने पुलों और सड़कों को ध्वस्त कर दिया। कृत्रिम बाधाओं ने बाढ़ के पानी को प्राकृतिक रूप से फैलने से रोक दिया, जिससे इसका प्रभाव और भी भयानक हो गया।

चीन को हुआ भारी नुकसान

ब्रह्मा चेलानी ने बताया कि इस आपदा ने चीन के अपस्ट्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर को भी क्षति पहुँचाई है। इसमें ग्यिरोंग पोर्ट शामिल है, जो नेपाल के साथ व्यापार का मुख्य रास्ता है। चीन की कुछ जानकारियों पर रोक लगा दी गई है, जिसके चलते तिब्बत की ओर हुई हानि की संख्या का पता नहीं चल पाया है।

प्रकृति के साथ सही व्यवहार

चेलानी ने ब्रिटिश लेखक एल्डस हक्सले का उद्धरण साझा किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि आप चाहते हैं कि प्रकृति आपके साथ अच्छा व्यवहार करे, तो आपको भी उसे सही तरीके से सम्मान करना चाहिए। इस भयानक आपदा ने हम सभी को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम अपनी गतिविधियों से प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

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