देश और दुनिया में पर्यटन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐतिहासिक स्मारकों और प्राकृतिक स्थलों से आगे बढ़कर अब पर्यटक शहरों की झुग्गी-बस्तियों की ओर भी रुख कर रहे हैं। इसे ‘स्लम टूरिज्म’ कहा जाता है। हालांकि हाल के वर्षों में इसका एक नया रूप सामने आया है, जिसे ‘नया स्लम टूरिज्म’ कहा जा रहा है। भारत में धारावी इस तरह के पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है। एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में शामिल धारावी में हर वर्ष हजारों विदेशी और भारतीय पर्यटक आते हैं। यहां वे केवल गरीबी देखने नहीं, बल्कि छोटे-छोटे उद्योग, रिसाइक्लिंग यूनिट, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगर और घरेलू उद्यमों को देखने पहुंचते हैं। बताया जाता है कि धारावी में हजारों छोटे उद्योग संचालित होते हैं, जिनका सालाना कारोबार करोड़ों रुपये में है।
स्लम टूरिज्म को सामुदायिक विकास से जोड़ने की क़वायद
विशेषज्ञों का कहना है कि पहले स्लम टूरिज्म को ‘गरीबी का प्रदर्शन’ माना जाता था, लेकिन अब इसे सामुदायिक विकास से जोड़ने की कोशिश हो रही है। कई टूर स्थानीय युवाओं द्वारा संचालित किए जा रहे हैं, जिससे उन्हें रोजगार मिलता है। कुछ सामाजिक संस्थाएं भी इन टूर के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता कार्यक्रमों के लिए धन जुटाती हैं।
दुनिया के अन्य शहरों में भी बढ़ा स्लम टूरिज्म का चलन
दुनिया भर में स्लम टूरिज्म (Slum Tourism) कुछ खास शहरों में अधिक चर्चित रहा है। यहां पर्यटक झुग्गी-बस्तियों, फेवेला या टाउनशिप क्षेत्रों का दौरा करते हैं, ताकि वहां की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, संस्कृति और स्थानीय उद्यमों को समझ सकें। ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो और दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में फेवेला और टाउनशिप टूर पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हैं। वहां भी स्थानीय गाइड पर्यटकों को समुदाय की संस्कृति, संगीत, कला और जीवनशैली से परिचित कराते हैं।
1. धारावी (भारत)– मुंबई स्थित धारावी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में गिनी जाती है। यहां चमड़ा उद्योग, रिसाइक्लिंग यूनिट, मिट्टी के बर्तन और छोटे कारखाने देखने के लिए पर्यटक आते हैं। यह भारत में स्लम टूरिज्म का सबसे प्रसिद्ध केंद्र है।
2. रियो डी जेनेरो (ब्राज़ील)– यहां की फेवेला बस्तियां विश्वभर में जानी जाती हैं। रोसिन्हा जैसी फेवेला में स्थानीय गाइड पर्यटकों को संस्कृति, संगीत और सामुदायिक जीवन से परिचित कराते हैं।
3. केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका)- यहां की टाउनशिप टूर काफी लोकप्रिय हैं। पर्यटक लांगा और खायेलित्शा जैसी बस्तियों में जाकर वहां के इतिहास, रंगभेद काल की विरासत और वर्तमान जीवन को समझते हैं।
4. नैरोबी (केन्या)- नैरोबी की किबेरा बस्ती अफ्रीका की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में शामिल है। यहां सामाजिक संस्थाओं द्वारा गाइडेड टूर कराए जाते हैं।
5. मनीला (फिलीपींस)- मनीला की टोंडो बस्ती में भी स्लम टूरिज्म देखने को मिलता है, जहां पर्यटक स्थानीय जीवन और चुनौतियों को करीब से देखते हैं।
6. जकार्ता (इंडोनेशिया)- जकार्ता के घनी आबादी वाले कम आय वाले इलाकों में भी सामाजिक संगठनों द्वारा सीमित स्तर पर टूर आयोजित किए जाते हैं।
7. मेक्सिको सिटी (मेक्सिको)– यहां के कुछ घनी आबादी वाले क्षेत्रों में सामुदायिक कला और शहरी पुनर्विकास परियोजनाओं के कारण टूरिज्म बढ़ा है।
स्लम टूरिज्म पर सामाजिक कार्यकर्ताओं को ऐतराज़
इन स्थानों पर स्लम टूरिज्म केवल गरीबी देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जगह इसे सांस्कृतिक समझ, सामुदायिक सशक्तिकरण और स्थानीय रोजगार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि यह स्थानीय लोगों की सहमति और सम्मान के साथ संचालित हो। हालांकि इस ट्रेंड को लेकर विवाद भी कम नहीं हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि संवेदनशीलता न बरती जाए तो यह लोगों की निजी जिंदगी में दखल और ‘पॉवर्टी पोर्न’ का रूप ले सकता है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि सही प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी से यह आर्थिक अवसर और जागरूकता दोनों बढ़ा सकता है।
ज़िन्दगी की सच्चाई से रूबरू होने का मौक़ा
पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में स्लम टूरिज्म का मॉडल पूरी तरह सामुदायिक भागीदारी और पारदर्शिता पर आधारित होगा। स्थानीय निवासियों की सहमति, सम्मान और लाभ सुनिश्चित करना इसकी सफलता की कुंजी मानी जा रही है। स्पष्ट है कि ‘नया स्लम टूरिज्म’ केवल झुग्गी-बस्तियों की तस्वीर दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ को समझने और विकास की संभावनाओं को पहचानने का एक नया प्रयास बनता जा रहा है।
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