अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों को 2.50 लाख तक की आर्थिक मदद, जातिगत भेदभाव मिटाने की सरकारी पहल

The CSR Journal Magazine

जातिगत भेदभाव और सामाजिक दूरी कम करने के उद्देश्य से केंद्र की योजना में SC और गैर-SC के बीच विवाह को प्रोत्साहन; राज्यों में भी अलग-अलग योजनाएं और अतिरिक्त सहायता का प्रावधान

भारत में जातिगत भेदभाव को खत्म करने और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए सरकार कई स्तरों पर प्रयास कर रही है। शिक्षा, रोजगार, कानूनी संरक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों के साथ-साथ अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करना भी इसी व्यापक सामाजिक नीति का एक हिस्सा है। केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से ऐसे विवाह करने वाले पात्र दंपतियों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की व्यवस्था की गई है। केंद्र की वर्तमान व्यवस्था के तहत ऐसे अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन दिया जाता है, जिनमें पति-पत्नी में से एक अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य हो। केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अनुसार यह प्रावधान Protection of Civil Rights Act, 1955 और Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ी केंद्रीय प्रायोजित योजना का हिस्सा है। इस योजना में अंतरजातीय विवाह के लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ अत्याचार पीड़ितों को राहत, विशेष पुलिस व्यवस्था, न्यायिक तंत्र को मजबूत करना और सामाजिक जागरूकता जैसे कई घटक शामिल हैं।

₹2.50 लाख का केंद्रीय प्रोत्साहन

केंद्र की अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन व्यवस्था में प्रति पात्र दंपति ₹2.50 लाख की प्रोत्साहन राशि निर्धारित की गई है। यह राशि वर्ष 2017-18 से समान रूप से लागू की गई थी और सरकारी दस्तावेजों में इसे उन अंतरजातीय विवाहों के लिए बताया गया है, जिनमें एक जीवनसाथी अनुसूचित जाति से संबंधित हो। इसका उद्देश्य केवल नवविवाहित दंपति को आर्थिक मदद देना नहीं, बल्कि जाति आधारित सामाजिक दूरी को कम करने वाले विवाहों को सार्वजनिक नीति के स्तर पर प्रोत्साहित करना है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार प्रोत्साहन राशि को दंपति के संयुक्त नाम पर सरकारी या राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा (Fixed Deposit) के रूप में रखने का प्रावधान रहा है। संबंधित दस्तावेज में तीन वर्ष की लॉक-इन अवधि का उल्लेख है। इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाली यह सामान्य धारणा कि अंतरजातीय विवाह करते ही दंपति को सीधे हाथ में ₹2.50 लाख या ₹5 लाख नकद मिल जाते हैं, पूरी तरह सही नहीं है। राशि प्राप्त करने के लिए निर्धारित पात्रता और विभागीय प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक है।

₹5 लाख की राशि पूरे देश में लागू नहीं

अंतरजातीय विवाह को लेकर इंटरनेट पर अक्सर ₹50 हजार से ₹5 लाख तक की आर्थिक सहायता मिलने की जानकारी दिखाई देती है। इसमें यह समझना जरूरी है कि यह पूरे देश के लिए एक समान केंद्रीय राशि नहीं है। केंद्र की निर्धारित प्रोत्साहन राशि ₹2.50 लाख है। इसके अलावा किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की ओर से अतिरिक्त सहायता दी जाती है तो वह संबंधित राज्य/UT की अपनी व्यवस्था हो सकती है। केंद्र की योजना से जुड़े सरकारी दस्तावेजों में भी स्पष्ट किया गया है कि ₹2.50 लाख से अधिक की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि, यदि कोई राज्य/UT देता है, तो उसका खर्च संबंधित राज्य/UT को स्वयं वहन करना होगा। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में अंतरजातीय विवाह के लिए मिलने वाली कुल सहायता अलग दिखाई दे सकती है।

कौन से जोड़े हो सकते हैं पात्र?

केंद्रीय योजना का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि पति या पत्नी में से एक व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य होना चाहिए। दूसरे जीवनसाथी का गैर-SC वर्ग से होना इस प्रोत्साहन व्यवस्था के उद्देश्य से जुड़ा है। इसका अर्थ यह है कि केवल दो अलग-अलग जातियों में विवाह होने से केंद्रीय योजना के तहत आर्थिक सहायता स्वतः नहीं मिलती। पात्रता संबंधित योजना में निर्धारित SC और गैर-SC संयोजन के आधार पर तय होती है। उदाहरण के तौर पर यदि दंपति में एक व्यक्ति SC समुदाय से है और दूसरा गैर-SC समुदाय से, तो वे निर्धारित अन्य शर्तें पूरी करने पर योजना के लिए पात्र हो सकते हैं।

विवाह का पंजीकरण जरूरी

अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन का लाभ लेने के लिए विवाह का कानूनी रूप से पंजीकृत होना महत्वपूर्ण है। सरकारी दस्तावेजों में प्रोत्साहन राशि का दावा करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से जारी विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने की बात कही गई है। इसलिए केवल धार्मिक या सामाजिक रीति-रिवाज से विवाह संपन्न होना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। पात्र दंपति को विवाह का वैध पंजीकरण कराना और उसका प्रमाणपत्र सुरक्षित रखना चाहिए। विवाह पंजीकरण से जुड़े विस्तृत नियम संबंधित राज्य के कानून और लागू योजना के अनुसार अलग हो सकते हैं।

2023 से आवेदन की व्यवस्था में बड़ा बदलाव

इस योजना को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Dr. Ambedkar Scheme for Social Integration through Inter-Caste Marriages के नाम से चलने वाली पुरानी केंद्रीय व्यवस्था में 2023 में बदलाव किया गया। डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन के 13 जनवरी 2023 के आदेश के अनुसार अंतरजातीय विवाह योजना को 1 अप्रैल 2023 से Centrally Sponsored Scheme for implementation of the Protection of Civil Rights Act, 1955 में मिला दिया गया। आदेश में यह भी कहा गया था कि 1 अप्रैल 2023 के बाद अंतरजातीय विवाह से जुड़े मामलों के लिए संबंधित राज्य सरकार/केंद्रशासित प्रदेश के समाज कल्याण विभाग की प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन किया जाए। इसलिए पुराने लेखों में दी गई डॉ. अंबेडकर फाउंडेशन की सीधे आवेदन करने वाली प्रक्रिया को वर्तमान व्यवस्था समझना उचित नहीं है। केंद्र के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की वेबसाइट पर भी इस विलय को योजना के वर्तमान दस्तावेजों में दर्ज किया गया है।

राज्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

यह योजना केंद्र और राज्यों की साझेदारी से जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को संबंधित कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराती है। योजना के तहत अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन भी इसी सहायता के प्रमुख घटकों में शामिल है। वर्तमान वित्तीय व्यवस्था में राज्यों और विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के साथ अतिरिक्त व्यय को सामान्य तौर पर 50:50 आधार पर साझा करने का प्रावधान है, जबकि बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता का प्रावधान है। इसके अलावा राज्य अपनी तरफ से अलग आर्थिक सहायता भी दे सकते हैं। ऐसे मामलों में राशि और पात्रता राज्य के नियमों के अनुसार निर्धारित होती है।

देश के कई राज्यों में मिल रहा लाभ

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की 2025-26 वार्षिक रिपोर्ट में अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन के तहत कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लाभार्थियों को दी गई सहायता का विवरण दर्ज है। रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 में आंध्र प्रदेश में 22, छत्तीसगढ़ में 1, दिल्ली में 12, गुजरात में 1, जम्मू में 1, मध्य प्रदेश में 2, महाराष्ट्र में 10, राजस्थान में 3 और तमिलनाडु में 8 लाभार्थियों को इस मद में सहायता दर्ज की गई। महाराष्ट्र के मामले में रिपोर्ट में 10 लाभार्थियों के लिए ₹25 लाख की सहायता दर्ज है, जबकि राजस्थान में तीन लाभार्थियों के लिए ₹4.50 लाख का आंकड़ा दिया गया है। ये आंकड़े यह बताते हैं कि अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन की व्यवस्था विभिन्न राज्यों में लागू है और पात्र दंपतियों को इसके तहत सहायता दी जा रही है।

किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है?

योजना के तहत आवेदन करते समय संबंधित राज्य या विभाग द्वारा निर्धारित दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। इनमें सामान्य तौर पर—
  • विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र
  • दोनों पति-पत्नी के पहचान संबंधी दस्तावेज
  • SC जीवनसाथी का जाति प्रमाणपत्र
  • निवास प्रमाणपत्र
  • संयुक्त बैंक खाते की जानकारी
  • विवाह की तारीख से संबंधित दस्तावेज
  • पासपोर्ट आकार के फोटो
  • निर्धारित आवेदन पत्र और घोषणा/शपथपत्र
शामिल हो सकते हैं। हालांकि दस्तावेजों की अंतिम सूची राज्य और लागू योजना के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए आवेदन करने से पहले संबंधित विभाग की वर्तमान अधिसूचना देखना जरूरी है।

आवेदन कहां और कैसे करें?

2023 के बाद केंद्रीय व्यवस्था में अंतरजातीय विवाह से जुड़े मामलों के लिए संबंधित राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश के समाज कल्याण विभाग की प्रक्रिया अपनाने को कहा गया है। इसलिए पात्र दंपतियों को अपने राज्य के समाज कल्याण विभाग, अनुसूचित जाति कल्याण विभाग या संबंधित जिला प्रशासन से आवेदन की वर्तमान प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए। कुछ राज्यों में ऑनलाइन आवेदन की सुविधा हो सकती है, जबकि कहीं जिला या विभागीय कार्यालय के माध्यम से आवेदन की प्रक्रिया हो सकती है।

सामाजिक भेदभाव खत्म करने की दिशा में पहल

अंतरजातीय विवाह को आर्थिक प्रोत्साहन देने की नीति को सरकार जातिगत भेदभाव के खिलाफ व्यापक प्रयासों के एक हिस्से के रूप में देखती है। संविधान के अनुच्छेद 17 ने अस्पृश्यता को समाप्त किया है और उसके किसी भी रूप में व्यवहार को प्रतिबंधित किया है। इसके साथ Protection of Civil Rights Act, 1955 और SC/ST Prevention of Atrocities Act, 1989 जैसे कानून जातिगत भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसी व्यापक व्यवस्था में अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहन देने का उद्देश्य सामाजिक संपर्क और समानता को बढ़ाना है। आर्थिक सहायता नवविवाहित दंपतियों के लिए शुरुआती वैवाहिक जीवन में मदद का माध्यम भी बनती है और साथ ही सामाजिक स्तर पर एक संदेश देती है कि जाति के आधार पर विवाह और सामाजिक संबंधों में भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए।

राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं में अंतर

अंतरजातीय विवाह के लिए सरकारी आर्थिक प्रोत्साहन की योजना वास्तविक है, लेकिन इसकी जानकारी लेते समय केंद्र और राज्य की योजनाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। केंद्रीय व्यवस्था में ऐसे अंतरजातीय विवाहों के लिए ₹2.50 लाख प्रति पात्र दंपति का प्रोत्साहन निर्धारित है, जिसमें एक जीवनसाथी अनुसूचित जाति से संबंधित होना चाहिए। विवाह का पंजीकरण और संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पात्रता की पुष्टि आवश्यक है। वहीं ₹5 लाख की राशि को पूरे देश में लागू केंद्रीय सहायता मानना सही नहीं है। यदि किसी राज्य की अपनी योजना के तहत अतिरिक्त राशि उपलब्ध है, तो उसकी पात्रता और राशि राज्य के नियमों के अनुसार तय होगी।

Dr. अंबेडकर स्कीम का केंद्रीय योजना में विलय

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1 अप्रैल 2023 से पुरानी Dr. Ambedkar Scheme को संबंधित केंद्रीय प्रायोजित योजना में मिला दिया गया है और नए मामलों के लिए राज्य/UT की समाज कल्याण विभागीय प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस प्रकार अंतरजातीय विवाह के लिए आर्थिक सहायता केवल एक वित्तीय योजना नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव कम करने, सामाजिक एकीकरण बढ़ाने और समानता की संवैधानिक भावना को मजबूत करने के लिए सरकार की व्यापक सामाजिक नीति का एक हिस्सा है।

 

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