योगी सरकार में बनारस की ताकत, हंसराज विश्वकर्मा की कैबिनेट एंट्री के पीछे की कहानी

The CSR Journal Magazine
उत्तर प्रदेश की योगी कैबिनेट में एक बार फिर बनारस का दबदबा देखने को मिला है। हाल ही में, बनारस के हंसराज विश्वकर्मा ने मंत्री पद की शपथ ली। इससे अब योगी सरकार में बनारस के चार मंत्री हो गए हैं। यह नया रिकॉर्ड बनारस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि योगी सरकार के पहले कार्यकाल में लखनऊ से केवल तीन मंत्री थे। हंसराज की एंट्री के साथ ही बनारस की राजनीति में एक नया मोड़ आया है।

कैबिनेट में चार मंत्री, नया रिकॉर्ड

इससे पहले योगी सरकार के पहले कार्यकाल में लखनऊ से बृजेश पाठक, आशुतोष टंडन और दिनेश शर्मा मंत्रिपरिषद के सदस्य थे। लेकिन अब दूसरे कार्यकाल के कैबिनेट विस्तार में बनारस से चार मंत्री हैं, जिनमें दयाशंकर मिश्र, अनिल राजभर, रविन्द्र जायसवाल और अब हंसराज विश्वकर्मा शामिल हैं। यह नई स्थिति लखनऊ को पीछे छोड़ते हुए बनारस को और अधिक पावरफुल बना रही है।

राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा

राजनीतिक विश्लेषक विजय नारायण का कहना है कि हंसराज की एंट्री एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पीएम मोदी के बनारस से सांसद रहने के कारण, आगामी 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी को मजबूत करना आवश्यक है। हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाए जाने का उद्देश्य ओबीसी वोटर्स को फिर से बीजेपी की ओर खींचना है। इसके अतिरिक्त, सपा के खिलाफ रणनीति तैयार करना भी इस कदम का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

बनारस की ताकत का बढ़ता आलम

विजय नारायण का मानना है कि 2014 में बीजेपी की सत्ता में आने के बाद से बनारस का दबदबा बढ़ा है। पंडित कमलापति त्रिपाठी के बाद यह दूसरा मौका है जब बनारस ने यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। हालाँकि, 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी की अलर्टनेस मौजूदा स्थिति को और गंभीर बनाती है।

हंसराज की छवि और ओबीसी वोटर्स

हंसराज विश्वकर्मा की छवि एक जमीनी नेता की है और उन्होंने हमेशा अपने वोटर्स को जोड़ा है। बीजेपी को लगता है कि उनकी नियुक्ति से ओबीसी मतदाताओं में अच्छा संदेश जाएगा। पिछले दिनों गाजीपुर में हुई एक घटना के बाद विपक्ष का बवाल भी एक कारण हो सकता है जिससे हंसराज को मंत्री बनाया गया है।

पूर्वांचल की जातीय चुनौतियाँ

वरिष्ठ पत्रकार अरुण मिश्रा का कहना है कि पूर्वांचल में जातीय गोलबंदी बीजेपी के लिए चुनौती बन सकती है। पश्चिम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा उठाने के बाद, पूरब में कास्ट पॉलिटिक्स को समझना और उसे निपटना बीजेपी के लिए आसान नहीं है। हंसराज विश्वकर्मा की एंट्री इसी चुनौती के मद्देनजर की गई है।

विश्वकर्मा समाज का वोट बैंक

अरुण मिश्रा ने यह भी बताया कि विश्वकर्मा समाज के लोग पूर्वांचल में एक बड़ा वोट बैंक हैं। बनारस से हंसराज की कैबिनेट में एंट्री से बीजेपी ने एक बड़ा दांव खेला है, जो उन्हें आगामी चुनावों में लाभ दिला सकता है।

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