विश्व रेबीज दिवस 2026: एक पल की लापरवाही पड़ सकती है भारी, समय पर इलाज से रोका जा सकता है रेबीज

The CSR Journal Magazine

World Rabies Day 2026: काटने या खरोंचने के बाद तुरंत घाव धोएं, चिकित्सकीय सलाह लें और समय पर टीका लगवाएं

रेबीज को दुनिया की सबसे गंभीर लेकिन रोकथाम योग्य संक्रामक बीमारियों में गिना जाता है। इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि बीमारी के लक्षण दिखाई देने के बाद बचाव की संभावना बेहद कम हो जाती है। इसके विपरीत, किसी संक्रमित या संभावित संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या उसकी लार के खुले घाव अथवा आंख-मुंह जैसी श्लेष्मा झिल्ली के संपर्क में आने के बाद यदि समय रहते सही उपचार शुरू कर दिया जाए, तो रेबीज से होने वाली मौत को रोका जा सकता है। इसी संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “Stronger Together” यानी “मिलकर मजबूत” रखी गई है। इसका उद्देश्य मनुष्य, पशु, स्वास्थ्य व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय बढ़ाकर रेबीज की रोकथाम को मजबूत करना है।

WHO की रिपोर्ट

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक रेबीज एक विषाणुजनित बीमारी है, जो संक्रमित जानवर की लार के माध्यम से मनुष्य तक पहुंच सकती है। कुत्ते इंसानों में होने वाले रेबीज संक्रमण के सबसे बड़े स्रोत हैं और विश्व स्तर पर मानव रेबीज के लगभग 99 प्रतिशत मामलों का संबंध कुत्तों से बताया गया है। बच्चों को विशेष रूप से जोखिम रहता है। दुनिया में संदिग्ध रेबीज वाले जानवरों के काटने का शिकार होने वालों में करीब 40 प्रतिशत बच्चे 15 वर्ष से कम उम्र के होते हैं।

काटने के बाद सबसे पहला काम क्या करें?

रेबीज से बचाव में समय सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी कुत्ते, बिल्ली, बंदर या अन्य संभावित संक्रमित जानवर ने काट लिया है तो सबसे पहले घाव को तुरंत साफ करना चाहिए। घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना जरूरी है। ऐसा करने से घाव में मौजूद वायरस की मात्रा को कम करने में मदद मिलती है। इसके बाद चिकित्सकीय सलाह के अनुसार घाव पर उपयुक्त एंटीसेप्टिक लगाया जा सकता है। भारत के राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम की दिशा-निर्देशों में भी घाव की तत्काल और अच्छी तरह सफाई को रेबीज से बचाव की पहली महत्वपूर्ण कड़ी माना गया है। घाव धोने के बाद उपचार में देरी नहीं करनी चाहिए। यह मान लेना गलत है कि मामूली खरोंच या त्वचा पर हल्का निशान होने से रेबीज का खतरा नहीं होता। यदि जानवर की लार खरोंच वाली त्वचा, खुले घाव या आंख-मुंह के संपर्क में आई है तो भी चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक हो सकता है। इसी तरह केवल इसलिए इलाज टालना उचित नहीं है कि जानवर देखने में स्वस्थ लग रहा था।

घाव पर मिर्च, तेल या घरेलू नुस्खे न लगाएं

जानवर के काटने के बाद कई जगहों पर घाव पर मिर्च, तेल, मिट्टी, चूना या दूसरे घरेलू पदार्थ लगाने की परंपरा देखी जाती है। ऐसे उपायों से रेबीज का संक्रमण नहीं रुकता और घाव को नुकसान पहुंच सकता है। सबसे जरूरी कदम साफ बहते पानी और साबुन से घाव की सफाई तथा उसके बाद चिकित्सकीय सलाह लेना है। घाव को कसकर बांधने या स्वयं से टांके लगाने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। आगे की चिकित्सा आवश्यकता डॉक्टर तय करते हैं। राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुसार, देर से अस्पताल पहुंचने की स्थिति में भी घाव की सफाई महत्वपूर्ण रहती है।

टीका कब जरूरी होता है?

जानवर के काटने के बाद चिकित्सक संपर्क की प्रकृति और घाव की गंभीरता के आधार पर रेबीज से बचाव के लिए पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफाइलेक्सिस यानी संक्रमण के बाद बचाव उपचार की जरूरत तय करते हैं। इसमें घाव की सफाई, रेबीज रोधी टीका और कुछ परिस्थितियों में रेबीज इम्यूनोग्लोब्युलिन या उपयुक्त मोनोक्लोनल एंटीबॉडी शामिल हो सकती हैं। किसी व्यक्ति को कितनी खुराक और किस तरीके से टीका दिया जाएगा, यह चिकित्सकीय आकलन पर निर्भर करता है। इसलिए इंटरनेट, पड़ोसी या किसी परिचित के अनुभव के आधार पर टीका शुरू या बंद करना उचित नहीं है। चिकित्सक द्वारा तय किया गया पूरा उपचार समय पर लेना जरूरी है। एक और आम गलतफहमी यह है कि यदि काटने वाला कुत्ता बाद में दिखाई नहीं दिया तो इलाज की जरूरत नहीं होगी। ऐसी स्थिति में भी व्यक्ति को अपने स्तर पर जोखिम का आकलन नहीं करना चाहिए। तुरंत स्वास्थ्य केंद्र या एंटी-रेबीज क्लिनिक में जाकर चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक सुरक्षित है।

लक्षण आने का इंतजार करना खतरनाक

रेबीज का शुरुआती संक्रमण कई बार तुरंत स्पष्ट नहीं होता। इसी कारण कुछ लोग यह सोचकर उपचार टाल देते हैं कि अभी कोई लक्षण नहीं है। यह बेहद जोखिम भरा हो सकता है। जब रेबीज केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंचकर बीमारी के लक्षण पैदा करता है, तब यह अत्यंत घातक हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, चिकित्सकीय लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज लगभग 100 प्रतिशत घातक है। शुरुआती दौर में बुखार, कमजोरी, बेचैनी या काटे गए स्थान पर असामान्य दर्द, झुनझुनी या जलन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। बीमारी बढ़ने पर पानी निगलने में परेशानी, अत्यधिक उत्तेजना, भ्रम, तंत्रिका तंत्र से जुड़े गंभीर लक्षण और बाद में पक्षाघात जैसी स्थिति हो सकती है। हालांकि लक्षणों की प्रतीक्षा करना बचाव का तरीका नहीं है। बचाव का सबसे प्रभावी अवसर जानवर के संपर्क के तुरंत बाद शुरू होने वाला उपचार है।

बच्चों पर विशेष ध्यान जरूरी

बच्चे अक्सर खेलते समय आवारा या पालतू जानवरों के करीब चले जाते हैं। वे कई बार कुत्ते या बिल्ली के व्यवहार को समझ नहीं पाते और जानवर को छेड़ने, उसकी पूंछ पकड़ने या उसके खाने के दौरान उसके पास जाने जैसी गलती कर सकते हैं। इसलिए अभिभावकों को बच्चों को जानवरों के साथ सुरक्षित व्यवहार की जानकारी देनी चाहिए। बच्चे के शरीर पर खरोंच या काटने का निशान दिखाई देने पर यह मान लेना उचित नहीं है कि चोट छोटी है इसलिए खतरा भी छोटा होगा। घाव को तुरंत धोने के बाद चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

केवल इलाज नहीं, जानवरों का टीकाकरण भी जरूरी

रेबीज की रोकथाम केवल काटे गए व्यक्ति के उपचार तक सीमित नहीं है। इसके लिए जानवरों में बीमारी को नियंत्रित करना भी जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कुत्तों का बड़े स्तर पर टीकाकरण रेबीज को उसके स्रोत पर रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है। इसी कारण विश्व रेबीज दिवस 2026 की थीम में मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े विभागों के बीच समन्वय पर जोर दिया गया है। भारत में राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मानव स्वास्थ्य से जुड़े रेबीज नियंत्रण उपायों को मजबूत करने, पशु काटने की घटनाओं की निगरानी, स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण और एंटी-रेबीज टीके तथा रेबीज इम्यूनोग्लोब्युलिन की उपलब्धता बढ़ाने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। कार्यक्रम का लक्ष्य कुत्तों से होने वाले मानव रेबीज को वर्ष 2030 तक समाप्त करने की दिशा में काम करना है।

पालतू कुत्ते का भी नियमित टीकाकरण जरूरी

रेबीज की रोकथाम में पालतू जानवरों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। पालतू कुत्ते का समय पर रेबीज रोधी टीकाकरण कराया जाना चाहिए। इसके अलावा उसे खुले में बिना निगरानी छोड़ने से बचना चाहिए। पशु के व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई देने पर उसे स्वयं पकड़ने या उसके मुंह के पास जाने के बजाय पशु चिकित्सक या संबंधित स्थानीय व्यवस्था से संपर्क करना चाहिए। आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करने और उनका टीकाकरण बढ़ाने के प्रयास भी लंबे समय में रेबीज की रोकथाम के लिए जरूरी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का जोर भी समुदाय, पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्यकर्मियों और सरकारों के साझा प्रयास पर है।

याद रखें ये चार कदम

जानवर के काटने या खरोंचने की स्थिति में पहला कदम है घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह धोना। दूसरा, घाव पर घरेलू नुस्खे अपनाने के बजाय उचित एंटीसेप्टिक और चिकित्सकीय सलाह लेना है। तीसरा, चिकित्सक की सलाह के अनुसार एंटी-रेबीज टीका और जरूरत होने पर अन्य बचाव उपचार लेना है। चौथा, उपचार का पूरा क्रम चिकित्सकीय सलाह के अनुसार पूरा करना है। रेबीज के मामले में सबसे बड़ी गलती है “देखते हैं आगे क्या होता है” वाली सोच। लक्षण आने तक इंतजार करने के बजाय जानवर के संपर्क के तुरंत बाद कदम उठाना चाहिए।
विश्व रेबीज दिवस का संदेश भी यही है कि इस बीमारी से बचाव केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकों की जागरूकता, बच्चों की सुरक्षा, पालतू जानवरों का टीकाकरण, आवारा कुत्तों का टीकाकरण, बेहतर निगरानी और स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुंच—इन सभी को साथ लेकर ही रेबीज के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सकती है। सही समय पर सही कदम उठाया जाए तो रेबीज से होने वाली मौत को रोका जा सकता है।

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