बेटे की मौत, 20 घंटे बाद मां भी चल बसी: शाजापुर में एक ही चिता पर अंतिम संस्कार

The CSR Journal Magazine
शाजापुर जिले के मक्सी नगर में एक ऐसा दुखद घटना हुई, जिसने सभी को रोने पर मजबूर कर दिया। नरेंद्र जैन, जो एक पूर्व नगर परिषद उपाध्यक्ष थे, का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। उनका निधन रविवार सुबह हुआ और इसके बाद परिवार ने निर्णय लिया कि अंतिम संस्कार सोमवार सुबह किया जाएगा। बेटे के अंतिम संस्कार का समय निर्धारित करने में परिवार को इसलिए देरी हुई क्योंकि वे दूर थे।

एक ही चिता पर दो अर्थियां

लेकिन परिवार को यह नहीं पता था कि इस सदमे को उनकी 100 वर्षीय मां राजूबाई वेदमूथा सहन नहीं कर पाएंगी। बेटे की मौत का खबर सुनते ही मां की हालत खराब हो गई। जब परिवार अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहा था, तभी सोमवार सुबह मां भी चल बसीं। घर से एक साथ मां और बेटे की अर्थियां निकलीं, जिसे देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।

भावनाओं का सैलाब

अंतिम यात्रा में शामिल सभी नगरवासी इस दिल-breaking पल को देखकर भावुक हो गए। मक्सी के जैन परिवार की यह हृदय विदारक कहानी हर किसी को छू गई। अंतिम संस्कार एक साथ किया गया और दोनों का अंतिम संस्कार एक ही चिता पर हुआ। यह घटना लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि जिंदगी कितनी अनिश्चित होती है।

पहले मां के बाद फिर बेटे की कहानी

इससे पहले भी मध्यप्रदेश के छतरपुर में एक दुखद मामला सामने आया था, जहां एक मां अपने 6 साल के बेटे की मौत का दुख सहन नहीं कर पाई। बेटे की मौत के बाद, केवल 10 मिनट में ही मां भी न उठने वाली स्थिति में पहुंच गई। यह सभी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि मां-बेटा के रिश्ते में कितना गहरा भावनात्मक बंधन होता है।

सामाजिक मानवीय संवेदनाएं

मक्सी के इस दुखद घटना ने समस्त समुदाय को एकजुट कर दिया। स्थानीय लोग इस दुःख में परिवार के साथ खड़े रहे। समाज में ऐसे पल लोगों को एक-दूसरे के साथ जोड़ते हैं, और इसी तरह के मानवीय रिश्तों की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। झील के किनारे आयोजित अंतिम संस्कार में हर कोई शांति और सहानुभूति के साथ उपस्थित था।

दुख और प्रेम का मिलाजुला रिश्ता

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जिंदगी के कुछ क्षणों में भावनाएं कितनी तीव्र होती हैं। एक ओर जहां मृत्यु एक अंतिम सच है, वहीं इससे जुड़े रिश्तों की मिठास और कटुता भी हमें आगे बढ़ने का बल देती है। इस मुद्दे पर चर्चा करने से समाज में संवेदनशीलता की आवश्यकता और बढ़ती है, जिससे हम ऐसे दुखद पलों में भी एक-दूसरे का सहारा बन सकें।

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