बेकार बोरवेल बने जीवनदाता: तमिलनाडु की अनोखी पहल, आर. माधवन ने की सराहना

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अभिनेता आर. माधवन ने IAS अधिकारी प्रताप मुरुगन की पहल की सराहना, 1,200 से अधिक बोरवेल बने रेनवॉटर हार्वेस्टिंग यूनिट

देश में बढ़ते जल संकट और लगातार गिरते भूजल स्तर के बीच तमिलनाडु से जल संरक्षण का एक प्रेरणादायक मॉडल सामने आया है। अभिनेता आर. माधवन ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी प्रताप मुरुगन की उस अभिनव पहल की खुलकर सराहना की है, जिसके तहत राज्य में 1,200 से अधिक परित्यक्त (Abandoned) बोरवेलों को वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) इकाइयों में परिवर्तित किया गया। इस पहल से कई गांवों में भूजल स्तर में लगभग 5 से 10 फीट तक सुधार होने का दावा किया गया है। इसका लाभ किसानों, ग्रामीण परिवारों और स्थानीय जल स्रोतों को मिल रहा है।

सूखे के बीच राहत की बूंद

यह पहल ऐसे समय में चर्चा का विषय बनी है जब देश के अनेक हिस्से हर वर्ष जल संकट, सूखे और भूजल के अत्यधिक दोहन जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के स्थानीय और कम लागत वाले मॉडल को अन्य राज्यों में भी अपनाया जाए तो भारत में जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव लाया जा सकता है।

आर. माधवन ने की पहल की सराहना

अभिनेता आर. माधवन ने सोशल मीडिया पर इस पहल की प्रशंसा करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि अक्सर विकास की बड़ी योजनाओं के बीच ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी प्रयोग नजरअंदाज हो जाते हैं, जबकि यही प्रयास समाज में स्थायी परिवर्तन ला सकते हैं। माधवन ने लोगों से जल संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानकर जनभागीदारी का अभियान बनाने की भी अपील की। उनके संदेश के बाद यह पहल सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गई और अनेक लोगों ने इसे पूरे देश में लागू करने की मांग की।

क्या है प्रताप मुरुगन की पहल?

IAS अधिकारी प्रताप मुरुगन ने देखा कि तमिलनाडु के कई गांवों में हजारों पुराने बोरवेल वर्षों से अनुपयोगी पड़े हैं। इनमें से अधिकांश बोरवेल सूख चुके थे या उनका उपयोग बंद हो गया था। सामान्यतः ऐसे बोरवेल बंद कर दिए जाते हैं या उन्हें यूं ही छोड़ दिया जाता है। प्रताप मुरुगन की टीम ने इन परित्यक्त बोरवेलों को बंद करने के बजाय उन्हें वर्षा जल संचयन प्रणाली से जोड़ने की योजना बनाई। वर्षा के दौरान एकत्रित होने वाले पानी को पाइप और फिल्टर प्रणाली के माध्यम से सीधे इन बोरवेलों में पहुंचाया जाने लगा, जिससे वर्षा जल जमीन के भीतर जाकर प्राकृतिक जलभंडार (Aquifer) को पुनर्भरित करने लगा। इस प्रकार जो बोरवेल पहले बेकार माने जा रहे थे, वे भूजल पुनर्भरण के प्रभावी साधन बन गए।

कैसे काम करती है यह प्रणाली?

इस मॉडल में वर्षा का पानी पहले छतों, नालियों या खुले जल निकासी मार्गों से एकत्र किया जाता है। इसके बाद फिल्टर के माध्यम से मिट्टी, पत्तियां और अन्य अशुद्धियां अलग की जाती हैं। साफ किया गया पानी परित्यक्त बोरवेल में भेजा जाता है, जहां से वह धीरे-धीरे जमीन के भीतर रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नई संरचना बनाने की आवश्यकता नहीं होती। पहले से मौजूद बोरवेल का ही उपयोग किया जाता है, जिससे लागत भी कम रहती है।

1,200 से अधिक बोरवेलों का पुनः उपयोग

रिपोर्टों के अनुसार, इस अभियान के तहत तमिलनाडु के विभिन्न क्षेत्रों में 1,200 से अधिक परित्यक्त बोरवेलों को वर्षा जल संचयन प्रणाली से जोड़ा गया। स्थानीय प्रशासन, ग्रामीण समुदायों और स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से यह अभियान आगे बढ़ा। इन क्षेत्रों में मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में वर्षा जल को सीधे जमीन में पहुंचाने का कार्य किया गया, जिससे कई स्थानों पर भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला।

भूजल स्तर में 5–10 फीट तक सुधार

इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम भूजल स्तर में वृद्धि के रूप में सामने आया। स्थानीय स्तर पर किए गए आकलनों के अनुसार कई गांवों में जलस्तर लगभग 5 से 10 फीट तक बढ़ा। इससे उन क्षेत्रों में हैंडपंप, कुएं और कृषि बोरवेल दोबारा उपयोगी होने लगे, जहां पहले पानी की भारी कमी थी। हालांकि भूजल में वृद्धि क्षेत्र, वर्षा की मात्रा, मिट्टी की संरचना और स्थानीय जलभंडार की स्थिति पर भी निर्भर करती है।

किसानों को मिला सीधा लाभ

भूजल स्तर बढ़ने से किसानों को सिंचाई के लिए अधिक पानी उपलब्ध होने लगा। इससे खेती की लागत कम हुई और फसलों की उत्पादकता में सुधार की संभावना बढ़ी। जिन क्षेत्रों में पहले गर्मियों के दौरान पानी की गंभीर समस्या रहती थी, वहां अब अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति देखने को मिल रही है। कई ग्रामीणों का कहना है कि पहले जिन बोरवेलों में पानी नहीं आता था, उनमें अब फिर से जल उपलब्ध होने लगा है।

भारत में क्यों बढ़ रहा है जल संकट?

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां भूजल का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण, उद्योगों का विस्तार और वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण न होने के कारण कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। उत्तर भारत, पश्चिमी भारत और दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों में हर वर्ष गर्मियों के दौरान पेयजल संकट पैदा हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए बांध या जलाशय बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वर्षा जल को जमीन में वापस पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

वर्षा जल संचयन क्यों है जरूरी?

भारत में अधिकांश वर्षा सीमित अवधि के मानसून के दौरान होती है। यदि इस पानी को संरक्षित नहीं किया जाए तो इसका बड़ा हिस्सा बहकर नदियों और समुद्र में चला जाता है। वर्षा जल संचयन के प्रमुख लाभ हैं—
  • भूजल स्तर में सुधार।
  • पेयजल संकट में कमी।
  • कृषि के लिए जल उपलब्धता बढ़ना।
  • बाढ़ और जलभराव की समस्या में कमी।
  • जल स्रोतों का दीर्घकालिक संरक्षण।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से मुकाबले में सहायता।

क्या पूरे देश में अपनाया जा सकता है यह मॉडल?

जल विशेषज्ञों का मानना है कि जहां बड़ी संख्या में परित्यक्त बोरवेल मौजूद हैं, वहां इस मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जा सकता है। हालांकि प्रत्येक क्षेत्र में इसे लागू करने से पहले भूवैज्ञानिक अध्ययन, जलभंडार की स्थिति, वर्षा के पैटर्न और सुरक्षा मानकों का मूल्यांकन आवश्यक होगा। यदि राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और ग्रामीण समुदाय मिलकर इस दिशा में काम करें तो यह पहल देश के अनेक जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।

जनभागीदारी की भूमिका

विशेषज्ञों का कहना है कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। प्रत्येक नागरिक को वर्षा जल संचयन, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण तथा भूजल के जिम्मेदार उपयोग की दिशा में योगदान देना होगा। स्कूलों, पंचायतों, नगर निकायों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी से ऐसे अभियानों को व्यापक जनआंदोलन का रूप दिया जा सकता है।

एक अनोखी पहल, बड़ा बदलाव: सूखे बोरवेलों से भूजल बचाने की सफल कहानी

तमिलनाडु में IAS अधिकारी प्रताप मुरुगन द्वारा परित्यक्त बोरवेलों को वर्षा जल संचयन इकाइयों में बदलने की पहल यह दर्शाती है कि सीमित संसाधनों के साथ भी बड़े परिवर्तन संभव हैं। आर. माधवन द्वारा इस प्रयास की सराहना ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। यदि इस मॉडल का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर उपयुक्त क्षेत्रों में विस्तार किया जाए, तो यह भारत में भूजल संरक्षण और जल संकट से निपटने की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है। जल संरक्षण केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का भी आधार है।
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