महिला का जबरन स्तन दबाना और सलवार उतारना, छेड़छाड़ के मामले में पटना हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी

The CSR Journal Magazine
9 जुलाई को पटना हाईकोर्ट ने एक विवादास्पद मामले में निर्णय सुनाते हुए स्टूडियो मालिक को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जबरदस्ती महिला की छाती दबाना और सलवार उतारने की कोशिश को रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। यह मामला 2008 का है जब बांका जिले के ‘छाया स्टूडियो’ के मालिक के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि उसके साथ बलात्कारी प्रयास हुआ। 5 साल तक चले ट्रायल के बाद, 2013 में लोअर कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया और उसे 3 साल की सजा सुनाई।

क्या थी आरोपी की दलीलें?

अभियुक्त हिमांशु उर्फ ‘मिथिया’ के वकील ने पटना हाईकोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला अवैध था। उन्होंने कहा कि मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है और यह पूरी तरह से भ्रामक है। उल्लेखनीय है कि लाइब्रेरी में बैठकर मामले का आधार बनाने की कोशिश की गई थी, जबकि असली गवाहों की गवाही में भारी खामियां थीं।

पटना हाईकोर्ट का मुख्य निर्णय

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने कहा कि मेडिकल एविडेंस की कमी और स्पष्ट शारीरिक प्रयासों के प्रमाण न मिलने के कारण आरोपी को बरी किया गया। जस्टिस ने कहा कि आरोपी ने यद्यपि बल का प्रयोग किया, लेकिन यह रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इसके बजाय यह केवल मर्यादा को ठेस पहुँचाने का मामला है।

दाखिल की गई गवाहियों की कमजोरी

कोर्ट ने देखा कि इस मामले में स्वतंत्र गवाहों की संख्या बहुत कम थी। केवल एक स्वतंत्र गवाह था, जिसने बाद में अपनी गवाही वापस ले ली। इसके अलावा, पीड़िता की मेडिकल जांच नहीं कराई गई, जिससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।

कानूनी दृष्टिकोण और भविष्य

इस मामले में प्रमुख गवाह केवल पीड़िता के माता-पिता थे, जिनकी गवाही पर नतीजे का आधार था। सुप्रीम कोर्ट में यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की गवाही को प्रमुखता दी जाती है लेकिन इस मामले में गवाही में बहुत विरोधाभास थे। कोर्ट ने इस स्थिति को देखते हुए बरी करने का निर्णय लिया।

रेप की कोशिश की परिभाषा

भारतीय कानून के अनुसार रेप की कोशिश का मामला तब माना जाता है जब कोई व्यक्ति बलात्कारी मंशा के साथ किसी महिला के साथ शारीरिक संपर्क करने का प्रयास करता है। हाल के एक फैसले में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई थी।

फैसले का सामाजिक प्रभाव

पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वदेव सिंह का मानना है कि फैसले का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हालांकि, कुछ लोगों में इस निर्णय के प्रति आक्रोश उत्पन्न हो सकता है। मगध महिला कॉलेज की प्रोफेसर और मनोवैज्ञानिक निधि सिंह ने इस निर्णय के दूरगामी परिणामों की चर्चा की है।

पीड़ित महिला के पास क्या विकल्प हैं?

अगर पीड़िता को पटना हाईकोर्ट के फैसले से आपत्ति है, तो वह इसे डबल बेंच में चुनौती दे सकती है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का भी विकल्प है। यदि कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी की दोषिता साबित होती है, तो उसे गंभीर धाराओं के तहत सजा दी जा सकती

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