पानी की बचत, बंपर पैदावार: अल नीनो के साए में किसानों की नई वॉटर-स्मार्ट खेती

The CSR Journal Magazine

अल नीनो का खौफ: किसानों ने अपनाया आधुनिक तरीका, धान की खेती में बचा रहे लाखों लीटर पानी

अल नीनो (El Niño) के कारण कम बारिश की आशंका और सूखे के डर से भारत के कई राज्यों, विशेषकर आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों के किसानों ने धान उगाने की अपनी पारंपरिक और अधिक पानी खपत वाली तकनीकों को बदल दिया है। मौसम वैज्ञानिकों और सरकारी विभागों द्वारा जारी कम बारिश की चेतावनियों के बीच किसान अब ऐसी आधुनिक और स्मार्ट कृषि तकनीकों को अपना रहे हैं, जो कम पानी में भी बंपर पैदावार देने में सक्षम हैं।

सुर्खियों में अल नीनो का डर

अल नीनो के प्रभाव से भारतीय किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। सूखे और पानी की कमी के चलते, देशभर के किसानों ने अपने पारंपरिक तरीके को छोड़कर नई तकनीकों का सहारा लेना शुरू किया है। यह कदम पानी की बचत करने के लिए उठाया गया है, जिससे न केवल फसल की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि जल संकट से भी निपटने में मदद मिलेगी।

नया खेती का ढंग

किसान अब धान के खेतों को गहराई से पानी से भरने के बजाय, आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। ये तकनीकें कम पानी में अधिक उत्पादन देने में सक्षम हैं। इससे लाखों लीटर पानी की बचत हो रही है और खेतों में जलवायु के प्रतिकूल प्रभावों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ रही है। इस बदलाव से किसान अपनी फसल के साथ-साथ अपने जल स्रोतों की सुरक्षा भी कर पा रहे हैं।

कम पानी में अधिक उपज

अन्य क्षेत्रों में जहां साधारण धान उगाने के पारंपरिक तरीके अपनाए जाते थे, वहां किसान अब ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये तकनीकें कम पानी में भी धान की उपज बढ़ाने में मददगार साबित हो रही हैं। इससे न केवल फसल की लागत कम होती है, बल्कि उत्पादन में भी वृद्धि होती है।

सूखी डीएसआर (Dry Direct Seeded Rice)

इस तकनीक में धान की पारंपरिक रोपाई (Transplantation) करने और खेतों को पानी से भरकर रखने के बजाय सीधे सूखे खेत में बीजों की बुवाई की जाती है। डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, सूखी डीएसआर से प्रति एकड़ लगभग 11 से 12 लाख लीटर पानी की बचत होती है।

गीली डीएसआर (Wet Direct Seeded Rice)

इसमें अंकुरित बीजों को तैयार गीली मिट्टी में सीधे बोया जाता है। यह नर्सरी तैयार करने और पौधों को उखाड़कर दोबारा लगाने के झंझट और मजदूरी लागत को खत्म करता है, जिससे प्रति एकड़ 4 से 5.5 लाख लीटर पानी बचता है।

ए.डब्ल्यू.डी. तकनीक (Alternate Wetting and Drying)

इस विधि में खेत को लगातार पानी से भरकर रखने की जगह, जरूरत के अनुसार खेत को बारी-बारी से गीला और सूखा रखा जाता है। इससे पौधों की जड़ों को हवा मिलती है और प्रति एकड़ 3 से 5 लाख लीटर पानी की बचत होती है।

श्री विधि (SRI Method)

‘सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन’ तकनीक के जरिए किसान बेहद कम पानी और कम बीजों के उपयोग से 25% से 30% तक सिंचाई जल बचा रहे हैं और पैदावार भी बेहतर हो रही है।

फसल विविधीकरण (Crop Diversification) पर जोर

राज्य कृषि विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे धान के रकबे को कम करें। इसके विकल्प के रूप में किसान कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्में, या फिर कम पानी चाहने वाले मोटे अनाज जैसे मक्का, रागी, ज्वार, बाजरा, और दलहन की खेती की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे सूखे के जोखिम को कम किया जा सके।

सास्कृतिक परिवर्तन की ओर कदम

इस परिवर्तन से किसान अपनी सोच में एक सास्कृतिक बदलाव ला रहे हैं। पहले जहां फसल उगाने के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी की आवश्यकता होती थी, वहीं अब वे समझ रहे हैं कि जल संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह नई सोच और तकनीक किसान को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है, बल्कि पर्यावरण के प्रति भी उनकी जिम्मेदारी को दर्शाती है।

पानी की महत्ता का एहसास

पानी की जरूरत को समझते हुए, किसान अब अपने रोजमर्रा के कार्यों में भी जल संरक्षण को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे न केवल फसल को फायदा होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक अच्छा उदाहरण भी बनेगा। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यह कदम जरूरी है। अगर किसान सही दिशा में आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में यह समस्याएं कम हो सकती हैं।

भविष्य की खेती

ध्यान देने वाली बात यह है कि किसानों के इस बदलाव के साथ-साथ सरकार और नॉन-गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन भी उन्हें समर्थन देने के लिए आगे आ रहे हैं। नई तकनीकों के लिए ट्रेनिंग और संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे उम्मीद की जा रही है कि किसानों की मेहनत को सही दिशा में मोड़ने का काम होगा, जिससे वे जल संकट के दौर में अपने धारणीय कृषि के लक्ष्यों को हासिल कर सकेंगे।

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