अल नीनो का कृषि पर प्रहार: दाल, चीनी, धान और तिलहन की पैदावार पर संकट, बढ़ सकता है खाद्य पदार्थों का आयात

The CSR Journal Magazine

अल नीनो की मार और सूखे से आपूर्ति पर दबाव, विदेशों पर बढ़ सकती है निर्भरता; उत्पादन में कमी और बढ़ती लागत से बाजार में महंगाई का खतरा

भारत की कृषि व्यवस्था के सामने अल नीनो के प्रभाव को लेकर नई चिंता खड़ी हो रही है। मौसम में बदलाव, बारिश की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों के कारण दालों, चीनी, तिलहन और धान जैसी महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन पर दबाव पड़ने की आशंका है। यदि घरेलू उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं रहता, तो देश को खाद्य पदार्थों के साथ-साथ पशु आहार और कृषि उद्योग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का आयात भी बढ़ाना पड़ सकता है। इसका असर केवल किसानों की आमदनी और कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, तेल मिलों, चीनी कारखानों, पशुपालन और आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
उद्योग जगत की चिंता यह है कि यदि फसलों की उपलब्धता घटती है और उत्पादन लागत बढ़ती है, तो कंपनियों के लिए घरेलू बाजार से पर्याप्त कच्चा माल जुटाना कठिन हो सकता है। ऐसे में आयात के विकल्प को आसान बनाने की मांग तेज हो सकती है। चीनी उद्योग को कच्ची चीनी के आयात की समय-सीमा बढ़ाने की अनुमति मिलने की सूचना भी इसी दबाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। खाद्य तेल, सोयाबीन खली और मक्के की विदेशी खरीद बढ़ाने की जरूरत भी सामने आ सकती है। हालांकि, आयात की वास्तविक मात्रा और उसके अंतिम प्रभाव का आकलन फसल उत्पादन, घरेलू मांग, अंतरराष्ट्रीय कीमतों तथा सरकार के नीतिगत फैसलों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

अल नीनो क्या है और भारत की खेती पर इसका असर क्यों पड़ रहा है?

अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ने से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके कारण दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश, तापमान और मौसमी परिस्थितियों के सामान्य क्रम में बदलाव हो सकता है। भारत में इसके प्रभाव से मानसूनी वर्षा कमजोर पड़ने या उसका वितरण असमान होने का जोखिम बढ़ जाता है। हालांकि, देश में बारिश की कमी के लिए केवल अल नीनो को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां, समुद्र की अन्य परिस्थितियां और जलवायु परिवर्तन सहित कई कारक भी प्रभाव डालते हैं। वर्ष 2026 में मानसूनी बारिश की कमी और कई कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की नमी घटने से फसलों को नुकसान पहुंचने की चिंता बढ़ी है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ, तेलंगाना तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियों से खरीफ फसलों पर दबाव पड़ा।
खेती के लिए बारिश केवल बुवाई के समय ही जरूरी नहीं होती। पौधों की बढ़वार, फूल आने, फलियां बनने और दाने भरने के दौरान भी पर्याप्त नमी की जरूरत होती है। लंबे समय तक बारिश न होने और तापमान बढ़ने से मिट्टी में मौजूद नमी तेजी से घटती है। इससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और उपज कम हो सकती है। सिंचाई की सुविधा वाले किसानों को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन भूजल और जलाशयों पर दबाव बढ़ने की स्थिति में उनकी लागत भी बढ़ जाती है।

दालों के उत्पादन में कमी से बढ़ सकती है चिंता

भारत में दालें आम लोगों के भोजन और प्रोटीन की जरूरत पूरी करने का प्रमुख साधन हैं। अरहर, उड़द, चना और मसूर जैसी फसलें देश के कई हिस्सों में उगाई जाती हैं। इनमें से बड़ी मात्रा में दालों की खेती वर्षा पर निर्भर रहती है। ऐसे में कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति का असर सीधे उत्पादन पर पड़ सकता है। अरहर और उड़द जैसी फसलों को बढ़वार के महत्वपूर्ण चरणों में पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर फलियों और दानों की संख्या घट सकती है। उत्पादन कम रहने पर मंडियों में उपलब्धता प्रभावित होती है और दाल मिलों को पर्याप्त कच्चा माल जुटाने में कठिनाई हो सकती है। भारत पहले भी घरेलू मांग पूरी करने के लिए दालों का आयात करता रहा है। यदि इस वर्ष घरेलू पैदावार में अधिक गिरावट आती है, तो सरकार और व्यापारियों को विदेशों से अतिरिक्त दालें मंगाने के विकल्प पर विचार करना पड़ सकता है। हालांकि, आयात का फैसला घरेलू भंडार, बाजार भाव, उपलब्ध विदेशी आपूर्ति और आयात शुल्क जैसे कारकों पर निर्भर करेगा। दालों की कीमतों में लगातार वृद्धि होने पर इसका असर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है। दाल भारतीय रसोई की नियमित जरूरत है, इसलिए इसकी महंगाई का प्रभाव अन्य खाद्य पदार्थों की तुलना में अधिक व्यापक हो सकता है।

चीनी उत्पादन पर भी मंडरा रहा है खतरा

चीनी उद्योग के लिए गन्ने की उपलब्धता, उसकी गुणवत्ता और पर्याप्त पानी बेहद महत्वपूर्ण हैं। कम बारिश और जल संकट की स्थिति में गन्ने की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। साथ ही गन्ने में चीनी की मात्रा और खेतों से मिलने वाली कुल उपज पर भी असर पड़ सकता है। अमेरिकी कृषि विभाग की विदेशी कृषि सेवा के आकलन के अनुसार, भारत में वर्ष 2026-27 के चीनी उत्पादन का अनुमान पहले के 3.36 करोड़ टन से घटाकर 2.95 करोड़ टन किया गया है। यह अनुमान लगभग 41 लाख टन की कमी दर्शाता है। चीनी उद्योग को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने एक लाख टन नहीं, बल्कि 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की समय-सीमा 31 अक्टूबर से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2026 कर दी है। इससे आयातकों को विदेशों से चीनी मंगाने के लिए अतिरिक्त समय मिला है। इस फैसले से घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, आयात से घरेलू चीनी उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बढ़ सकता है। चीनी की कीमतों पर वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि घरेलू उत्पादन कितना रहता है, मांग कितनी होती है और विदेश से कितनी चीनी आती है। गन्ने की उपलब्धता का संबंध केवल चीनी तक सीमित नहीं है। गन्ने से बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में भी किया जाता है। यदि गन्ने की आपूर्ति कम होती है, तो चीनी उत्पादन और जैव ईंधन उद्योग के बीच कच्चे माल के इस्तेमाल को लेकर संतुलन बनाना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

खाद्य तेल का आयात बढ़ने की आशंका

खाद्य तेल के मामले में भारत पहले से ही विदेशों पर काफी निर्भर है। देश में सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी और अन्य तिलहनों का उत्पादन होता है, लेकिन घरेलू उत्पादन कुल मांग को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाता। इसलिए पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल का आयात महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस बार खरीफ सोयाबीन और मूंगफली की फसलों पर सूखे का दबाव पड़ने से खाद्य तेल की घरेलू उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। यदि तिलहन उत्पादन घटता है, तो तेल मिलों को घरेलू बाजार से पर्याप्त बीज नहीं मिल पाएंगे। इससे उत्पादन लागत और तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। अनुमान के मुताबिक, इस वर्ष खरीफ मूंगफली का उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत से अधिक घट सकता है। वहीं, उद्योग से जुड़े एक अनुमान में खाद्य तेल का आयात वर्ष 2025-26 के 1.65 करोड़ टन से बढ़कर 2026-27 में 1.75 करोड़ टन तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। यह अनुमान है, अंतिम आंकड़ा नहीं। आयात बढ़ने से घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने, समुद्री परिवहन महंगा होने या रुपये की विनिमय दर कमजोर पड़ने पर आयात का खर्च बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में विदेशों से अधिक तेल मंगाने के बावजूद उपभोक्ताओं को सस्ता खाद्य तेल मिलना सुनिश्चित नहीं होता।

सोयाबीन खली और मक्के के आयात की मांग क्यों?

सूखे का असर केवल इंसानों के भोजन पर ही नहीं, बल्कि पशुओं और मुर्गियों के आहार पर भी पड़ता है। मुर्गीपालन उद्योग में मक्का और सोयाबीन खली का इस्तेमाल पशु आहार के महत्वपूर्ण घटकों के रूप में किया जाता है। सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचने वाला प्रोटीनयुक्त पदार्थ सोयाबीन खली कहलाता है। इसका उपयोग पशुओं और मुर्गियों के लिए तैयार आहार में किया जाता है। सोयाबीन की फसल कम होने पर तेल निकालने के लिए उपलब्ध बीज की मात्रा घट सकती है। इससे सोयाबीन खली की आपूर्ति पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर, मक्के की मांग खाद्य उद्योग, पशु आहार और इथेनॉल उत्पादन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में रहती है। यदि इनमें से किसी क्षेत्र में मांग तेजी से बढ़ती है, तो अन्य उद्योगों के लिए उपलब्ध मक्के की मात्रा प्रभावित हो सकती है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, सोयाबीन खली और मक्के की बढ़ती कीमतों से मुर्गीपालन क्षेत्र की लागत बढ़ रही है। इसी वजह से पोल्ट्री उद्योग ने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन खली के आयात की अनुमति देने की मांग की है। उद्योग का तर्क है कि आयात का रास्ता आसान होने से आहार की उपलब्धता बढ़ सकती है और लागत पर दबाव कम हो सकता है। यदि पशु आहार महंगा बना रहता है, तो मुर्गीपालन करने वाले किसानों का मुनाफा घट सकता है। उत्पादन लागत बढ़ने पर अंडों और चिकन की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

कपास और कृषि आधारित उद्योग भी दबाव में

सूखे का प्रभाव खाद्य फसलों से आगे बढ़कर कपास जैसे औद्योगिक कच्चे माल पर भी पड़ सकता है। कपास की उपलब्धता घटने पर कपड़ा उद्योग की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे में कपड़ा निर्माताओं की ओर से आयात शुल्क हटाने या आयात आसान बनाने की मांग उठ सकती है। इसी तरह, मक्के का अधिक इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होने पर स्टार्च उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल जुटाने में कठिनाई हो सकती है। ऐसी स्थिति में उद्योग को विदेश से स्टार्च मंगाने की जरूरत पड़ सकती है। इससे स्पष्ट है कि मौसम का असर केवल खेतों में पैदा होने वाली फसलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, कपड़ा, पशुपालन और जैव ईंधन जैसे कई क्षेत्रों तक पहुंचता है।

क्या आम लोगों के लिए महंगाई बढ़ेगी?

खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि उत्पादन में कितनी कमी आती है और सरकार समय रहते आपूर्ति की व्यवस्था कैसे करती है। यदि दालों, खाद्य तेल और चीनी की घरेलू उपलब्धता कम होती है, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ सकता है। पशु आहार महंगा होने पर अंडे और चिकन जैसे उत्पादों की लागत भी बढ़ सकती है। लेकिन आयात बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर खाद्य पदार्थ की कीमत तत्काल बढ़ जाएगी। पर्याप्त वैश्विक आपूर्ति, अनुकूल अंतरराष्ट्रीय भाव और समय पर आयात से घरेलू बाजार में कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है। इसके उलट, यदि कई देशों में एक साथ मौसम संबंधी संकट पैदा होता है, तो विदेशी खरीद भी महंगी पड़ सकती है। सरकार के सामने इसलिए दोहरी चुनौती होगी। एक ओर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना जरूरी होगा, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को अत्यधिक महंगाई से बचाना होगा। आयात शुल्क में बदलाव, सरकारी भंडार से आपूर्ति, जमाखोरी पर निगरानी और फसलों के उत्पादन का नियमित आकलन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

आगे की चुनौती रबी फसलों और वर्ष 2027 की तैयारी

खरीफ फसलों के बाद अब रबी मौसम की बुवाई और पैदावार भी महत्वपूर्ण होगी। यदि खेतों में नमी कम रहती है और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो चना, सरसों और अन्य सर्दियों की फसलों पर भी दबाव पड़ सकता है। इसीलिए चिंता केवल मौजूदा फसल की नहीं, बल्कि अगले कृषि चक्र की भी है। कृषि विशेषज्ञों और उद्योग जगत की चिंता है कि अल नीनो का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा, तो वर्ष 2027 में खाद्य आपूर्ति और महंगाई से जुड़ी चुनौतियां अधिक गंभीर हो सकती हैं। हालांकि, भविष्य की स्थिति का आकलन बारिश, तापमान, जलाशयों के स्तर और अगली फसल की बुवाई के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
इस संकट से निपटने के लिए केवल आयात पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण, सूखा सहन करने वाली किस्मों को बढ़ावा, सिंचाई व्यवस्था में सुधार और किसानों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है। निष्कर्षतः, अल नीनो और सूखे का बढ़ता दबाव भारत के कृषि तथा खाद्य बाजार के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। दालों, चीनी और तिलहनों की उपलब्धता से लेकर पशु आहार और औद्योगिक कच्चे माल की लागत तक, इसके प्रभाव कई क्षेत्रों में दिखाई दे सकते हैं। आयात घरेलू आपूर्ति को संभालने का एक जरूरी विकल्प बन सकता है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए बेहतर जल प्रबंधन, मजबूत कृषि तैयारी और किसानों को समय पर सहायता देना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

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