दिल्ली में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, ग्रीन पटाखे भी छोड़ते हैं 70% धुआं
दिल्ली-NCR में लगातार गंभीर होते वायु प्रदूषण और त्योहारों के दौरान पटाखों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए जारी किए गए निर्देशों का ज़मीन पर ठीक से पालन न होना पूरी व्यवस्था का ‘मजाक’ उड़ाने जैसा है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में यह चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया कि तथाकथित ‘ग्रीन पटाखे’ (Green Firecrackers) भी पारंपरिक पटाखों की तुलना में केवल 30 प्रतिशत कम उत्सर्जन करते हैं, जिसका सीधा अर्थ है कि इनसे भी 70 प्रतिशत तक हानिकारक धुआं और विषैले प्रदूषक पर्यावरण में घुलते हैं। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने मामले पर गहन सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वायु प्रदूषण किसी एक पक्ष का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हर एक जीवित प्राणी के स्वास्थ्य से सीधा जुड़ा हुआ है।
ग्रीन पटाखों का कड़वा सच और बाज़ार का फर्जीवाड़ा
न्यायालय में सुनवाई के दौरान कोर्ट द्वारा नियुक्त न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) और याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने ग्रीन पटाखों की ज़मीनी हकीकत का खुलासा किया:
1. 70% विषैला धुआं: विशेषज्ञों ने आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया कि ग्रीन पटाखे पूरी तरह से प्रदूषण-मुक्त या पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते। वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास संगठन (CSIR) और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के मानकों के तहत बने ग्रीन पटाखे केवल 30% तक कम उत्सर्जन करते हैं, जबकि बाकी का 70% धुआं सामान्य पटाखों की तरह ही जहरीला होता है।
2. फर्जी QR कोड और नकली पटाखे: कोर्ट को बताया गया कि बाज़ार में ग्रीन पटाखों के नाम पर खुलेआम प्रतिबंधित और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले नकली पटाखे बेचे जा रहे हैं। इन पटाखों के पैकेट पर छपे QR कोड भी फर्जी हैं। जब कोई ग्राहक या जांच टीम उन्हें स्कैन करती है, तो वे काम ही नहीं करते।
3. मानकों की जांच का अभाव: एमिकस क्यूरी ने अदालत के समक्ष चिंता व्यक्त की कि बाज़ार में बिकने वाले पटाखों की वास्तविकता की जांच करने के लिए प्रशासन के पास कोई पुख्ता और सक्रिय निगरानी तंत्र (Enforcement Mechanism) मौजूद ही नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां: “आदेशों का मज़ाक न बनाएं”
अदालत ने सरकारी एजेंसियों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों की ढिलाई पर सख्त रुख अपनाते हुए कई तीखी टिप्पणियां कीं:
ज़मीनी स्तर पर काम शून्य: पीठ ने दिल्ली सरकार और CAQM से सवाल किया कि नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए उन्होंने वास्तव में क्या किया है? अदालत ने कहा, “जब तक आप हमें यह नहीं बताते कि आपने ज़मीन पर क्या कदम उठाए हैं, तब तक केवल कागज़ी आदेश पारित करने का क्या मतलब है? हर साल अदालत निर्देश देती है और हर साल नियमों का उल्लंघन होता है। यह व्यवस्था का मज़ाक उड़ाना है।”
सिर्फ दिल्ली के लिए ही क्यों विशेष नीति? पीठ (जिसमें अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई भी शामिल थे) ने इस बात पर ज़ोर दिया कि साफ हवा पाने का अधिकार केवल दिल्ली के नागरिकों को ही नहीं है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ दिल्ली के ‘एलीट’ लोगों को ही प्रदूषण मुक्त हवा मिलनी चाहिए? प्रदूषण एक राष्ट्रीय समस्या है और अमृतसर, कानपुर या देश के अन्य प्रदूषित शहरों के नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नीतियां पूरे भारत के स्तर (Pan-India Basis) पर लागू होनी चाहिए।
निगरानी केंद्रों की बदहाली पर सवाल: अदालत ने बेहद तल्ख लहजे में पूछा कि दिल्ली में स्थापित कुल 39 प्रदूषण निगरानी केंद्रों में से केवल 9 केंद्र ही सक्रिय रूप से काम क्यों कर रहे हैं? बाकी के केंद्र बंद क्यों पड़े हैं और उनसे डेटा क्यों नहीं मिल पा रहा है?
पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ संतुलित रास्ता
पटाखा उद्योग से जुड़े श्रमिकों की आजीविका और त्योहार के दौरान लोगों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह पटाखों के उपयोग पर पूरी तरह से अव्यावहारिक और पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) लगाने के पक्ष में नहीं है।
अदालत ने एक व्यावहारिक दृष्टिकोण (Practical Approach) अपनाने पर ज़ोर दिया, जिसके तहत:
समय का निर्धारण: अदालत चौबीसों घंटे पटाखे जलाने की अनुमति नहीं देगी। इसके बजाय त्योहारों के दिनों में पटाखे फोड़ने के लिए कुछ निश्चित घंटे (Specific Time Slots) तय किए जा सकते हैं, जिससे बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और छोटे बच्चों को अत्यधिक शोर और धुएं से बचाया जा सके।
जन जागरूकता की आवश्यकता: कोर्ट ने टिप्पणी की कि केवल दंड या प्रतिबंध लागू करने से ज्यादा प्रभावी यह होगा कि आम जनता में प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए। लोग स्वयं अपनी मर्ज़ी से पटाखों का उपयोग कम करें। इसके लिए अदालत ने खेल और मनोरंजन जगत की बड़ी हस्तियों, जैसे विराट कोहली, के माध्यम से जन जागरूकता अभियान चलाने का सुझाव भी दिया ताकि लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हों।
दिल्ली-NCR की मौजूदा स्थिति और चिकित्सा विशेषज्ञों की चेतावनी
त्योहारों के मौसम और दशहरे के बाद से ही दिल्ली-NCR की वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ती जा रही है। पिछले दिनों दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 241 से ऊपर दर्ज किया गया, जो ‘खराब’ श्रेणी में आता है। सर्दियों की शुरुआत, हवा की धीमी गति और पराली जलाने की घटनाओं (Stubble Burning) के कारण आने वाले दिनों में इसके ‘गंभीर’ (Severe) स्तर पर पहुंचने की आशंका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और डॉक्टरों के अनुसार, पटाखों के धुएं से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5 और PM 10) और भारी धातुएं (जैसे बेरियम, सल्फर और नाइट्रेट) मानव शरीर के फेफड़ों, श्वसन तंत्र और हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सांस की अन्य बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
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