लाल हुआ पृथ्वी का नक्शा: WMO का ‘सुपर-डुपर अल-नीनो’ का अलर्ट, अल नीनो से तापमान में होगा भारी इजाफा
संयुक्त राष्ट्र की मौसम संबंधी शीर्ष संस्था विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने वैश्विक जलवायु को लेकर अब तक की सबसे भयानक चेतावनी जारी की है। पैसिफिक यानी प्रशांत महासागर में तेजी से विकसित हो रहा अल-नीनो अब एक ‘सुपर-डुपर अल-नीनो’ का रूप ले चुका है, जिसने पूरी पृथ्वी के तापमान के नक्शे को लाल रंग में बदल दिया है। WMO की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस बात की लगभग 100% संभावना है कि यह विनाशकारी अल-नीनो फरवरी 2027 तक लगातार सक्रिय रहेगा।
यह इतिहास में पहली बार है जब मौसम वैज्ञानिकों ने किसी अल-नीनो घटना के लंबे समय तक टिके रहने को लेकर इतनी सटीक और अचूक भविष्यवाणी की है। इस मौसमी बदलाव के कारण पूरी दुनिया में सूखा, जानलेवा हीटवेव (तपन), भीषण बाढ़ और जंगलों की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं का एक ऐसा चक्र शुरू होने जा रहा है, जिसे मानवता ने शायद ही पहले कभी देखा हो।
तापमान में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी: 3.7 डिग्री सेल्सियस तक खौलेगा समुद्र
WMO की रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आंकड़े समुद्र की सतह के तापमान से जुड़े हैं। अल-नीनो का मुख्य केंद्र माने जाने वाले मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से रिकॉर्ड 3.7 डिग्री सेल्सियस (6.7 डिग्री फारेनहाइट) अधिक होने का अनुमान है।
यह आंकड़ा कितना डरावनी स्थिति को दर्शाता है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इससे पहले साल 2015-16 में आए खतरनाक अल-नीनो के दौरान यह विसंगति (Anomaly) महज 2.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, समुद्र की 100 मीटर की गहराई पर तापमान सामान्य से लगभग 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक पहुंच चुका है।
WMO की महानिदेशक सेलेस्टे साउलो ने इस वैश्विक संकट पर चिंता जताते हुए कहा, “अल-नीनो हमारी आंखों के सामने एक महा-दानव (Supersized) का रूप ले रहा है। वैज्ञानिक आंकड़े साफ बताते हैं कि हमारी पृथ्वी इस वक्त अज्ञात और बेहद खतरनाक रास्तों पर है। समुद्र का पानी जितना गर्म हमने आज तक मापा है, यह उससे भी कहीं ज्यादा गर्म हो चुका है, जिसका सीधा मतलब है कि वातावरण में भारी मात्रा में गर्मी रिलीज होने वाली है।”
क्या है ‘सुपर-डुपर अल-नीनो’ और क्यों लाल हुआ नक्शा?
अल-नीनो एक प्राकृतिक रूप से घटने वाली मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के गर्म होने से जुड़ी है। हर दो से सात साल में आने वाला यह चक्र आमतौर पर 9 से 12 महीनों तक रहता है। लेकिन इस बार इंसानी गतिविधियों और जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने इसे “सुपर-डुपर” श्रेणी में डाल दिया है। प्रशांत महासागर से निकलने वाली यह अत्यधिक गर्मी जब वायुमंडल में फैलती है, तो पूरी दुनिया के मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है। WMO द्वारा जारी किए गए पृथ्वी के नए मौसमी मानचित्र में दुनिया के अधिकांश हिस्सों को गहरे लाल रंग में दिखाया गया है, जो इस बात का प्रतीक है कि भूभागों का तापमान सामान्य से कई गुना ज्यादा रहने वाला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस महा-अल-नीनो के कारण साल 2027 इतिहास का सबसे गर्म साल बन सकता है, जो 2024 के पिछले सभी रिकॉर्ड्स को भी ध्वस्त कर देगा।
भारत पर मंडराया दोहरा खतरा: सूखी सर्दी और भीषण प्री-मानसून तपन
भले ही अल-नीनो की उत्पत्ति भारत से हजारों मील दूर प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इसका सबसे विनाशकारी असर भारतीय उपमहाद्वीप पर ही पड़ता है। भारतीय मौसम वैज्ञानिकों (IMD) और अंतर्राष्ट्रीय जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार, यह सुपर अल-नीनो भारत के मौसम को दोतरफा चोट पहुंचाने वाला है:
• गर्म और सूखी सर्दी (Warmer Winter): साल 2026 के आखिरी महीनों से लेकर 2027 की शुरुआत तक, भारत में पारंपरिक कड़ाके की ठंड नदारद रह सकती है। उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में शीत लहर की जगह सामान्य से कहीं अधिक तापमान दर्ज किया जाएगा।
• भीषण प्री-मानसून हीटवेव: जैसे ही भारत 2027 के शुरुआती महीनों में कदम रखेगा, देश को सामान्य से काफी पहले और अत्यधिक आक्रामक प्री-मानसून हीटवेव (तपती लू) का सामना करना पड़ सकता है।
• कृषि और जल संकट का खतरा: मॉनसून में पहले ही दर्ज की गई कमी के बाद अब सर्दियों में बारिश न होने से देश के जलाशयों का जलस्तर घट सकता है। यह स्थिति रबी की फसलों (जैसे गेहूं) और आने वाली खरीफ की फसलों के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ी कर सकती है।
भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने पहले ही राज्यों को अलर्ट जारी करते हुए जिला स्तर पर आपातकालीन कार्ययोजना (Contingency Plans) लागू करने और कम पानी में उगने वाली फसलों (जैसे बाजरा और मोटे अनाज) को बढ़ावा देने के निर्देश दिए हैं।
वैश्विक तबाही का खाका: 4.5 लाख से अधिक मौतों की आशंका
यह सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी बनने की ओर अग्रसर है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह भयानक अनुमान लगाया गया है कि इस सुपर-अल-नीनो के कारण जून से लेकर फरवरी 2027 के बीच दुनिया भर में लगभग 4,51,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। ये मौतें अत्यधिक गर्मी, फसलों की बर्बादी से भुखमरी और मौसम जनित बीमारियों के कारण होंगी।
• अफ्रीका और लातवियाई देश: इन क्षेत्रों में ऐतिहासिक सूखे के कारण भुखमरी का खतरा पैदा हो गया है, कई देशों ने पहले ही आपातकाल घोषित कर दिया है।
• तटीय इलाकों में बाढ़: जहां एक तरफ दुनिया का बड़ा हिस्सा सूखे की मार झेलेगा, वहीं चेन्नई (भारत) जैसे तटीय शहरों और प्रशांत महासागर के द्वीपों में अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश और विनाशकारी बाढ़ आने की आशंका है।
• पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान: समुद्र के खौलते पानी के कारण समुद्री जीवों और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) का बड़े पैमाने पर विनाश (Coral Bleaching) शुरू हो चुका है।
समय रहते तैयारियों की जरूरत
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने भी आगाह किया है कि जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता इस संकट को और बदतर बना रही है। अब समय आ गया है कि दुनिया भर की सरकारें WMO के इस अंतिम अर्ली वार्निंग (पूर्व चेतावनी) सिस्टम को गंभीरता से लें। बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, स्वास्थ्य प्रणालियों को हीटवेव के लिए तैयार करना और पानी का सही संचयन ही इस आने वाले महा-संकट से मानवता को बचा सकता है।
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