डिप्टी बनकर भी ‘किंग’ रहे डीके शिवकुमार: सिद्धारमैया के सामने कैसे बचाए रखा अपना दबदबा?

The CSR Journal Magazine

डीके शिवकुमार की सियासी चतुराईः सिद्धारमैया के डिप्टी रहकर भी कैसे बनाए रखा अपना दर्जा?

डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहते हुए संगठन पर अपनी मजबूत पकड़, आलाकमान के प्रति वफादारी और महत्वपूर्ण विभागों के नियंत्रण के जरिए सत्ता संतुलन बनाए रखा। मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच कड़ा मुकाबला था। हालांकि, आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद शिवकुमार ने उपमुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया, लेकिन अपनी सियासी चतुरता से सरकार और पार्टी दोनों में अपना रुतबा मुख्यमंत्री के बराबर बनाए रखा।

कर्नाटक में बड़ा बदलाव

कर्नाटक में सिद्धारमैया ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है। अब डीके शिवकुमार को कमान मिलने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। यह बदलाव तीन साल पहले की गई सियासी तैयारी का नतीजा है। इन तीन सालों में सिद्धारमैया सीएम रहे, जबकि शिवकुमार ने अपनी शक्ति को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चुनावी नतीजे 2023 में कांग्रेस के लिए संतोषजनक रहे। अब एक बार फिर से सत्ता की बागडोर किसके हाथ में होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

सत्ता साझा करने का खेल

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद, जब मुख्यमंत्री चुनने की बारी आई, तो सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच आत्मीय सहमति की चर्चाएँ शुरू हुईं। जानकार बताते हैं कि एक समझौता हुआ था, जिसमें पहले ढाई साल सिद्धारमैया और फिर बचे ढाई साल डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने की बातें चल रही थीं। हालांकि, यह सब सार्वजनिक रूप से कहा नहीं गया। परंतु, पार्टी के अंदर की हलचलें इसे खुद ब खुद दर्शाती हैं।

सभा में मजबूत नेतृत्व

ये तीन साल काफी अहम रहे हैं, क्योंकि इस दौरान कई बार नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठी। लेकिन शिवकुमार ने धैर्य बनाए रखा। उन्होंने हमेशा यही कहा कि अंतिम निर्णय दिल्ली में होगा। अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए, शिवकुमार ने संगठन और प्रशासन पर अच्छी पकड़ बनाकर रखी। टकराव की राजनीति से दूर रहकर, उन्होंने पार्टी को एकजुट रखा।

ताज़ा घटनाक्रम की पृष्ठभूमि

मई 2026 में हुए ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के तहत, सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है और डीके शिवकुमार के नए मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है। सिद्धारमैया के कार्यकाल के दौरान शिवकुमार ने जिन रणनीतियों के तहत अपना कद बनाए रखा, वे निम्नलिखित हैं-
संगठनात्मक शक्ति (KPCC अध्यक्ष पद पर नियंत्रण)- शिवकुमार केवल उपमुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि वे कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष भी बने रहे।
विधायकों पर पकड़- संगठन प्रमुख होने के नाते टिकट वितरण से लेकर पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और विधायकों पर उनका सीधा नियंत्रण रहा।

मलाईदार और रणनीतिक विभागों का संचालन

बेंगलुरु का प्रभार- शिवकुमार ने बेंगलुरु विकास और नगर नियोजन जैसे सबसे महत्वपूर्ण विभागों की कमान अपने हाथ में रखी। बेंगलुरु राज्य के राजस्व का मुख्य स्रोत है, जिससे प्रशासनिक तंत्र पर उनका दबदबा बना रहा।
जल संसाधन मंत्रालय- इस महत्वपूर्ण मंत्रालय के जरिए उन्होंने राज्य के ग्रामीण और किसान संकटों को हल करने में बड़ी भूमिका निभाई।

कांग्रेस आलाकमान का ‘संकटमोचक’ (Troubleshooter) बने रहना

गांधी परिवार से निकटता- शिवकुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए हमेशा संकटमोचक (Crisis Manager) की भूमिका निभाई है। चाहे अन्य राज्यों के विधायकों की बाड़ेबंदी करनी हो या चुनाव फंड की व्यवस्था, वे आलाकमान की पहली पसंद रहे।
दिल्ली का समर्थन- इसी वफादारी के कारण कांग्रेस हाईकमान (मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी) ने सरकार में उनके हितों से कभी समझौता नहीं होने दिया।

 ‘रोटेशनल सीएम’ फॉर्मूले का मौन दबाव

50-50 का गुप्त समझौता- 2023 में सरकार गठन के दौरान यह चर्चा हमेशा गर्म रही कि ढाई साल बाद सत्ता का हस्तांतरण होगा।
धैर्य और रणनीति- शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से कोई बगावत नहीं की, लेकिन अपने समर्थकों के जरिए लगातार इस फॉर्मूले की याद दिलाई, जिससे सिद्धारमैया सरकार पर हमेशा एक दबाव बना रहा।

सामाजिक समीकरण और वोक्कालिगा समुदाय का नेतृत्व

वोट बैंक की ताकत- सिद्धारमैया जहां ‘अहिंदा’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के मास लीडर हैं, वहीं शिवकुमार कर्नाटक के प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे।
वर्चस्व का संतुलन- वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन के बिना कांग्रेस ओल्ड मैसूर क्षेत्र में जीत नहीं सकती थी, जिसने शिवकुमार के दर्जे को मुख्यमंत्री के समकक्ष रखा।

परिपक्वता और सौहार्द का प्रदर्शन

मतभेदों को छिपाना- सरकार के भीतर दोनों नेताओं में कई बार मतभेद दिखे, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर शिवकुमार ने हमेशा एकजुटता दिखाई।
ताजा घटनाक्रम में सम्मान- 28 मई 2026 को सिद्धारमैया की ब्रेकफास्ट मीटिंग में जब इस्तीफे की बात तय हुई, तो शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से सिद्धारमैया के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। इससे उन्होंने यह संदेश दिया कि वे सत्ता छीन नहीं रहे, बल्कि सम्मानपूर्वक कमान संभाल रहे हैं।

धैर्य और मजबूती का परिणाम

कुल मिलाकर यह देखा गया है कि शिवकुमार ने धैर्य से काम लिया, अपनी भूमिका को बनाए रखा और पार्टी से जुड़े रहकर अपनी दावेदारी को मजबूत किया। कांग्रेस ने इस बार अपने पिछले अनुभवों का सही उपयोग किया है। इससे पहले पार्टी ने कई राज्यों में नेता बदलने की गलतियाँ की थीं, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा था।

कांग्रेस का संतुलन बनाए रखना

पंजाब में अमरिंदर सिंह और सिद्धू, मध्य प्रदेश में कमल नाथ और सिंधिया के मामलों में कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा था। इससे यह स्पष्ट है कि इस बार कांग्रेस ने अपनी गलती नहीं दोहराई। राजस्थान, असम और छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर सत्ता बदलने की जोखिम नहीं ली थी। कर्नाटक में, कांग्रेस ने सूझबूझ दिखाई और तेजी से स्थिति को संभाला।

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