चीन से भारत में स्टील की डंपिंग थमने का नाम नहीं ले रही है। वैश्विक अस्थिरता, जैसे यूक्रेन-रूस संघर्ष और पश्चिम एशिया के हालात, ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है। चीन की स्टील कंपनियां अब कम गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील को भारत जैसे बाजारों में तेजी से भेज रही हैं। इससे भारतीय स्टील उद्योग की मुश्किलें बढ़ रही हैं और स्वास्थ्य-सुरक्षा का भी खतरा पैदा हो रहा है। उद्योग जगत ने सरकार को इस गंभीर समस्या के बारे में बताया है, लेकिन सरकार के कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं।
आयात में अप्रत्याशित वृद्धि
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2026 में चीन से स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों का आयात 53,271 मीट्रिक टन तक पहुँच गया, जो वित्त वर्ष 2026 के औसत मासिक आयात 18,576 मीट्रिक टन का लगभग 2.9 गुना है। जून-जुलाई 2025 से जून-जुलाई 2026 तक इस आयात में 197 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सितंबर 2026 में चीन से भारत को निर्यात 65,000 टन रहा, जो वर्ष-दर-वर्ष 367 प्रतिशत अधिक था।
अन्य देशों से भी बढ़ता आयात
हालांकि मुख्य स्रोत चीन है, लेकिन इंडोनेशिया, वियतनाम और दक्षिण कोरिया से भी स्टील का आयात हो रहा है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि इन देशों से भी चीन की कंपनियों का ही स्टील भारत में आ रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि सरकार एक तरफ डंपिंग रोकने की बात करती है, लेकिन कुछ नियम इसको बढ़ावा देने वाले साबित हो रहे हैं।
सरकारी नीतियों का दुष्प्रभाव
27 अप्रैल, 2026 के आदेश के अनुसार, स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों पर गुणवत्ता संबंधी नियंत्रण आदेश को निलंबित कर दिया गया। यह फैसला छोटे और मझोले उद्योगों की सहूलियत के लिए किया गया था, लेकिन इसके बाद सस्ते और गैर-मानकीकृत स्टील का आयात तेजी से बढ़ा है। भारत सरकार की एजेंसियां (डीजीटीआर) चीन, इंडोनेशिया और वियतनाम से स्टेनलेस स्टील पर एंटी-डंपिंग जांच कर रही हैं, लेकिन अभी तक कोई शुल्क नहीं लगाया गया है।
स्वास्थ्य और सुरक्षा पर प्रभाव
जिंदल स्टेनलेस के सीईओ तरुण कुमार खुल्बे ने बताया कि स्टेनलेस स्टील का उपयोग स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्रों में होता है। इसका उपयोग बर्तनों, परमाणु, ऊर्जा, फार्मा और यातायात जैसे विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में किया जाता है। ऐसे अनुप्रयोगों में गुणवत्ता का होना बेहद जरूरी है। लेकिन भारत में गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों के निलंबन के कारण, कई व्यापारी गुणवत्ता के बजाय कीमत को प्राथमिकता देते हुए सस्ते माल का उपयोग कर रहे हैं।
लंबी अवधि के दुष्प्रभाव
इसका सीधा असर कई बार स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर तुरंत दिखाई देता है, लेकिन आमतौर पर ये प्रतिकूल परिणाम लंबे समय के बाद ही प्रत्यक्ष होते हैं। खुल्बे ने कहा कि यदि हम वैश्विक स्तर पर देखें, तो कम गुणवत्ता वाली सामग्री का स्रोत चीन है। यह केवल स्टेनलेस स्टील की बात नहीं है, बल्कि अन्य उत्पादों में भी ऐसा देखने को मिलता है।
जागरूकता की कमी
भारत में बहुत से लोग सस्ते बिना गुणवत्ता वाले सामान खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। इस बात को लेकर जागरूकता की कमी है कि कम गुणवत्ता की सामग्री के उपयोग के दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं। उद्योग जगत की तरफ से बार-बार सरकार को इस बारे में चेताया जा रहा है। जून 2026 में स्टील मंत्रालय को पत्र लिखकर गुणवत्ता नियंत्रण आदेश की बहाली की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि क्यूसीओ के निलंबन ने चीन से सस्ते आयात का द्वार खोल दिया है और हजारों नौकरियां व निवेश खतरे में हैं।
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