मौत के बाद न दाह संस्कार, न दफनाने की जरूरत; अब इंसानी शरीर से बनेगी खाद, ऑस्ट्रेलिया ने दी ह्यूमन कंपोस्टिंग को मंजूरी

The CSR Journal Magazine

मौत के बाद प्रकृति में लौटेगा इंसानी शरीर, ऑस्ट्रेलिया ने बदली अंतिम संस्कार की परंपरा, क्या भारत में भी आएगा ह्यूमन कंपोस्टिंग?

मौत के बाद किसी व्यक्ति के शरीर का अंतिम संस्कार करना या उसे दफनाना दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों और परंपराओं का हिस्सा रहा है। लेकिन बदलते समय के साथ अंतिम संस्कार के ऐसे विकल्प भी सामने आ रहे हैं, जिनका उद्देश्य पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना है। इसी दिशा में ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स राज्य ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यहां मानव शरीर को प्राकृतिक प्रक्रिया के जरिये विघटित करके मिट्टी जैसे उपयोगी पदार्थ में बदलने की विधि, जिसे ‘ह्यूमन कंपोस्टिंग’ या ‘टेरामेशन’ कहा जाता है, को कानूनी मंजूरी दी गई है। यह तरीका पारंपरिक दाह संस्कार और शव को जमीन में दफनाने से अलग है। इसमें शरीर को विशेष नियंत्रित परिस्थितियों में रखा जाता है, जहां सूक्ष्मजीव, नमी, तापमान और जैविक पदार्थों की मदद से उसका विघटन होता है। निर्धारित अवधि के बाद हड्डियों के बचे हुए अंशों सहित सामग्री को संसाधित करके मिट्टी जैसी खाद तैयार की जा सकती है। हालांकि, यह सामान्य घरेलू खाद बनाने जैसी प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए विशेष व्यवस्था, स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा मानकों और कानूनी नियमों का पालन जरूरी होता है।
इस व्यवस्था ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या भविष्य में अंतिम संस्कार के पारंपरिक तरीकों की जगह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अधिक लोकप्रिय हो सकते हैं। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे भूमि की जरूरत और कुछ प्रकार के पर्यावरणीय प्रभावों को कम किया जा सकता है। वहीं, धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक परंपराओं, जैविक सुरक्षा और मृतक के शरीर से जुड़ी नैतिक चिंताओं को लेकर कई सवाल भी उठते हैं।

क्या है ह्यूमन कंपोस्टिंग और इसे टेरामेशन क्यों कहते हैं?

ह्यूमन कंपोस्टिंग अंतिम संस्कार की एक वैकल्पिक विधि है, जिसमें मृत व्यक्ति के शरीर को नियंत्रित परिस्थितियों में प्राकृतिक रूप से विघटित किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य शरीर के जैविक पदार्थों को स्थिर, मिट्टी जैसे पदार्थ में बदलना है। इसे कुछ स्थानों पर ‘नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन’ यानी प्राकृतिक जैविक विघटन भी कहा जाता है। ‘टेरामेशन’ शब्द का इस्तेमाल भी इसी तरह की प्रक्रिया के लिए किया जाता है, हालांकि अलग-अलग देशों और संस्थाओं में इन शब्दों के इस्तेमाल तथा प्रक्रिया के विवरण में अंतर हो सकता है। सामान्य दाह संस्कार में शरीर को उच्च तापमान पर जलाया जाता है, जबकि दफनाने की परंपरा में शव को जमीन में रखा जाता है। इसके विपरीत, ह्यूमन कंपोस्टिंग में शरीर को जलाया नहीं जाता और न ही उसे पारंपरिक तरीके से जमीन में दफनाया जाता है। शरीर को एक विशेष पात्र या कक्ष में लकड़ी के छोटे टुकड़ों, पौधों के अवशेष और अन्य उपयुक्त जैविक पदार्थों के साथ रखा जाता है। इसके बाद नियंत्रित वातावरण में सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों को तोड़ने का काम करते हैं।
यहां यह समझना जरूरी है कि इस प्रक्रिया से मिलने वाला पदार्थ सीधे खेतों में इस्तेमाल होने वाली सामान्य खाद के समान नहीं मान लिया जाना चाहिए। इसकी गुणवत्ता, सुरक्षा, उपयोग और वितरण से जुड़े नियम संबंधित कानूनों तथा नियामक संस्थाओं पर निर्भर करते हैं। मानव अवशेषों से तैयार पदार्थ का इस्तेमाल कहां और किस तरह किया जा सकता है, यह भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।

कैसे काम करती है यह प्रक्रिया?

ह्यूमन कंपोस्टिंग के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए बंद पात्र या कक्ष का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें शरीर के साथ लकड़ी के छोटे टुकड़े, सूखी पत्तियां, पुआल या अन्य कार्बनयुक्त जैविक सामग्री रखी जा सकती है। इन पदार्थों से सूक्ष्मजीवों को काम करने के लिए अनुकूल वातावरण मिलता है। प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए नमी, तापमान और हवा की उपलब्धता जैसे कारकों पर नियंत्रण रखा जाता है। शरीर में मौजूद जैविक पदार्थ समय के साथ टूटने लगते हैं। सूक्ष्मजीव इस विघटन में अहम भूमिका निभाते हैं। इस दौरान तापमान बढ़ सकता है, जिससे कुछ रोगजनक सूक्ष्मजीवों को निष्क्रिय करने में मदद मिलती है। हालांकि, रोगजनकों का नियंत्रण केवल तापमान पर निर्भर नहीं करता। इसके लिए निर्धारित तापमान को कितनी देर तक बनाए रखा गया, सामग्री को किस तरह संभाला गया और पूरी प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन हुआ या नहीं, ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं।

हफ्तों से लेकर महीनों की प्रक्रिया

विघटन के दौरान शरीर के कोमल ऊतक धीरे-धीरे टूट जाते हैं। हड्डियां अपेक्षाकृत अधिक समय तक बनी रह सकती हैं। इसलिए प्रक्रिया पूरी होने के बाद हड्डियों के बचे हुए अंशों को अलग से संसाधित किया जा सकता है, ताकि अंतिम सामग्री अधिक समान रूप में तैयार हो सके। इसके बाद तैयार पदार्थ को कुछ समय तक स्थिर होने दिया जाता है और आवश्यक जांच तथा प्रसंस्करण के बाद ही उसका उपयोग किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह से लेकर कुछ महीनों तक का समय लग सकता है। वास्तविक अवधि शरीर की परिस्थितियों, इस्तेमाल की गई तकनीक, तापमान, नमी और संबंधित संस्था की कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर मामले में शरीर एक निश्चित अवधि में खाद में बदल जाता है।

क्या इसमें शरीर को बिल्कुल नहीं जलाया जाता?

ह्यूमन कंपोस्टिंग की मुख्य विशेषता यही है कि इसमें शरीर को पारंपरिक अग्नि-दाह की तरह नहीं जलाया जाता। शरीर का विघटन जैविक प्रक्रिया के जरिये होता है। हालांकि, पूरी व्यवस्था में तापमान नियंत्रित करने के लिए उपकरणों या ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है। इसका अर्थ यह है कि यह प्रक्रिया ऊर्जा का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करती, ऐसा दावा करना भी सही नहीं होगा। इसी तरह, दफनाने के विकल्प के रूप में इसका उद्देश्य शरीर को सीधे जमीन में दबाना नहीं, बल्कि नियंत्रित वातावरण में विघटित करके मिट्टी जैसा पदार्थ तैयार करना है। इससे पारंपरिक कब्र के लिए जमीन की जरूरत कम हो सकती है, लेकिन अंतिम पदार्थ को सुरक्षित रखने, ले जाने या निर्धारित स्थान पर उपयोग करने की व्यवस्था फिर भी आवश्यक होती है।

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में क्या बदला?

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स राज्य में इस विधि को कानूनी मंजूरी मिलने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि मानव शरीर के अंतिम संस्कार से संबंधित नियम आमतौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य, शव प्रबंधन, धार्मिक-सामाजिक परंपराओं और स्थानीय कानूनों से जुड़े होते हैं। किसी नई विधि को अनुमति देने के लिए केवल तकनीकी संभावना पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसके संचालन, निगरानी और सुरक्षा की व्यवस्था भी जरूरी होती है। कानूनी मान्यता का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति अपने घर में इस तरह की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। ऐसी व्यवस्था के संचालन के लिए संबंधित कानूनों, अनुमति, सुविधाओं और निर्धारित मानकों का पालन करना पड़ता है। यह भी जरूरी है कि मृतक की इच्छा, परिजनों की भूमिका और शरीर के अंतिम प्रबंधन से जुड़े नियम स्पष्ट हों।
इस विषय में एक सावधानी भी जरूरी है। किसी राज्य में नई विधि को मंजूरी मिलने की खबर और उसके लिए सभी व्यावहारिक सेवाओं का उपलब्ध हो जाना दो अलग बातें हैं। कानून पारित होने, उसके लागू होने, नियमों के प्रभावी होने और वास्तव में सेवा शुरू होने के बीच समय का अंतर हो सकता है। इसलिए न्यू साउथ वेल्स में इसकी वर्तमान उपलब्धता, लागू होने की तारीख और संचालन संबंधी शर्तों की पुष्टि आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों से करना आवश्यक है।

पर्यावरण के लिए कितना फायदेमंद हो सकता है यह तरीका?

ह्यूमन कंपोस्टिंग के समर्थक इसे पर्यावरण के अनुकूल अंतिम संस्कार के विकल्प के रूप में देखते हैं। इसकी वजह यह है कि पारंपरिक दाह संस्कार में ईंधन की खपत होती है और कार्बन डाइऑक्साइड सहित अन्य उत्सर्जन हो सकते हैं। दूसरी ओर, दफनाने के लिए भूमि की जरूरत होती है और कब्रिस्तान के रखरखाव में भी संसाधन खर्च होते हैं। कुछ प्रकार के दफन में ताबूत, धातु, कंक्रीट और रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल भी किया जाता है। ह्यूमन कंपोस्टिंग में शरीर के जैविक पदार्थों का विघटन नियंत्रित परिस्थितियों में होता है। इसमें पारंपरिक दाह संस्कार जैसी प्रत्यक्ष अग्नि-दहन प्रक्रिया नहीं होती। साथ ही, शरीर को स्थायी कब्र में रखने की आवश्यकता भी नहीं रहती। इस कारण कुछ परिस्थितियों में भूमि और ऊर्जा की खपत कम हो सकती है।

वैज्ञानिक तथ्यों का आकलन जरूरी

पर्यावरणीय लाभ को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी प्रक्रिया का प्राकृतिक दिखना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसका कुल पर्यावरणीय प्रभाव हर स्थिति में कम होगा। विशेष पात्रों का निर्माण, तापमान और नमी नियंत्रित करने के लिए ऊर्जा, जैविक सामग्री की आपूर्ति, परिवहन और अंतिम पदार्थ का प्रबंधन भी पर्यावरणीय गणना का हिस्सा हैं। सही तुलना के लिए इन सभी पहलुओं का आकलन करना जरूरी है। इसके अलावा, यह देखना होगा कि अंतिम पदार्थ में मौजूद पोषक तत्वों का उपयोग किस प्रकार होता है और उससे मिट्टी को वास्तव में कितना लाभ मिलता है। यदि इसे सुरक्षित रूप से उपयोग किया जाता है, तो यह जैविक पदार्थों को दोबारा प्राकृतिक चक्र में शामिल करने का एक तरीका बन सकता है। फिर भी, इसके लाभों के बारे में व्यापक दावे करने से पहले स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक अध्ययनों को ध्यान में रखना चाहिए।

क्या इससे तैयार खाद पौधों और खेतों में इस्तेमाल की जा सकती है?

ह्यूमन कंपोस्टिंग से तैयार पदार्थ को मिट्टी जैसा जैविक पदार्थ कहा जा सकता है, लेकिन उसका उपयोग स्वतः हर जगह और हर उद्देश्य के लिए मान्य नहीं होता। इसमें खनिज तत्व, विघटित जैविक पदार्थ और हड्डियों से संबंधित अवशेष मौजूद हो सकते हैं। इसकी संरचना और गुणवत्ता प्रक्रिया के तरीके तथा इस्तेमाल की गई सामग्री के आधार पर बदल सकती है। इसलिए इसे सीधे बाजार में बिकने वाली खाद के समान समझना उचित नहीं है। अंतिम पदार्थ की जांच, रोगजनकों के नियंत्रण, संभावित दूषित तत्वों और स्थानीय नियमों का पालन महत्वपूर्ण है। यदि कानून अनुमति देता है, तो इसका इस्तेमाल निर्धारित स्थानों पर मिट्टी सुधारने या पौधों के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि इससे बनी सामग्री को बिना जांच के किसी भी खेत, बगीचे या खाद्य फसल में डालना सुरक्षित है।
कुछ व्यवस्थाओं में तैयार पदार्थ को प्राकृतिक क्षेत्रों या पौधों के आसपास इस्तेमाल करने का विकल्प दिया जा सकता है। इसका उद्देश्य मृतक के शरीर को पर्यावरणीय चक्र में वापस शामिल करने का प्रतीकात्मक और व्यावहारिक अवसर देना है। हालांकि, वास्तविक उपयोग संबंधित राज्य के नियमों और सेवा प्रदाता की शर्तों पर निर्भर करेगा।

क्या ह्यूमन कंपोस्टिंग पूरी तरह सुरक्षित है?

किसी भी ऐसी प्रक्रिया में, जिसमें मानव अवशेषों को संभाला जाता है, सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। शरीर के विघटन के दौरान रोगजनकों के नियंत्रण, कर्मचारियों की सुरक्षा, उपकरणों की सफाई और अंतिम पदार्थ की गुणवत्ता की जांच आवश्यक है। इसके लिए वैज्ञानिक रूप से निर्धारित प्रक्रियाओं और नियामकीय निगरानी की जरूरत होती है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर मृत शरीर की परिस्थितियां समान नहीं होतीं। मृत्यु का कारण, कुछ संक्रामक रोग, शरीर में मौजूद रासायनिक पदार्थ या चिकित्सा उपचार के दौरान इस्तेमाल की गई सामग्री प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में अतिरिक्त प्रतिबंध या विशेष प्रबंधन की जरूरत हो सकती है।
इसी वजह से ह्यूमन कंपोस्टिंग को केवल प्राकृतिक विघटन की सामान्य प्रक्रिया मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए प्रशिक्षित कर्मियों, उपयुक्त तकनीक, निर्धारित मानकों और जवाबदेही की व्यवस्था आवश्यक है। किसी भी देश या राज्य में इसकी अनुमति का आधार यही होना चाहिए कि मृतक के शरीर का सम्मान बना रहे और सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा न हो।

धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं से जुड़ी बहस

अंतिम संस्कार केवल शरीर के निपटान की प्रक्रिया नहीं है। यह शोक, स्मृति, धार्मिक विश्वास और परिवार की भावनाओं से गहराई से जुड़ा होता है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में दाह संस्कार और दफनाने की परंपराएं धार्मिक तथा सांस्कृतिक मान्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में ह्यूमन कंपोस्टिंग जैसी विधि को स्वीकार करना हर व्यक्ति या समुदाय के लिए आसान नहीं होगा। कुछ लोगों को यह विचार आकर्षक लग सकता है कि मृत्यु के बाद शरीर को मिट्टी में वापस लौटाकर प्रकृति के चक्र का हिस्सा बनाया जाए। वहीं, दूसरे लोगों को यह अपनी धार्मिक मान्यताओं या पारिवारिक परंपराओं के विरुद्ध लग सकता है। किसी भी विकल्प को चुनने में व्यक्तिगत इच्छा और मृतक की पहले से व्यक्त की गई प्राथमिकताओं का सम्मान महत्वपूर्ण रहेगा।
इस विषय पर चर्चा करते समय यह भी जरूरी है कि किसी एक अंतिम संस्कार पद्धति को सभी के लिए बेहतर या श्रेष्ठ घोषित न किया जाए। लोगों की मान्यताएं अलग होती हैं और अंतिम संस्कार के चुनाव में धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक भावनाओं तथा कानूनी अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

क्या भारत में भी शुरू हो सकती है यह व्यवस्था?

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में इस विधि को मंजूरी मिलने से भारत में भी इस पर चर्चा हो सकती है, लेकिन किसी दूसरे देश में अनुमति मिलना भारत में इसे अपने आप कानूनी नहीं बना देता। भारत में शव प्रबंधन और अंतिम संस्कार से जुड़े नियमों, स्थानीय निकायों की जिम्मेदारियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों की अलग से जांच करनी होगी। यदि भविष्य में भारत में इस तरह की व्यवस्था शुरू करने का प्रस्ताव आता है, तो उसके लिए तकनीकी मानक, अनुमति देने वाली संस्थाएं, स्वास्थ्य सुरक्षा, अंतिम पदार्थ के उपयोग और मृतक की सहमति से जुड़े सवालों पर स्पष्ट नीति की जरूरत होगी। साथ ही, विभिन्न धार्मिक समुदायों की मान्यताओं और परिवारों की पसंद को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। भारत में पर्यावरण के अनुकूल अंतिम संस्कार के विकल्पों पर चर्चा का दायरा बढ़ सकता है, लेकिन किसी भी नई व्यवस्था को अपनाने का निर्णय वैज्ञानिक प्रमाण, कानून और सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर होना चाहिए। केवल विदेश में लागू हुई किसी व्यवस्था को देखकर उसके तत्काल भारतीय परिस्थितियों में लागू होने की उम्मीद करना सही नहीं होगा।

अंतिम संस्कार के बदलते विकल्पों की ओर एक नया कदम

ह्यूमन कंपोस्टिंग आधुनिक समाज में मृत्यु के बाद शरीर के प्रबंधन को लेकर बदलती सोच का उदाहरण है। इसका मूल विचार यह है कि शरीर को जलाने या पारंपरिक तरीके से दफनाने के बजाय नियंत्रित जैविक प्रक्रिया से मिट्टी जैसे पदार्थ में बदला जा सकता है। इसके संभावित लाभों में भूमि की जरूरत कम करना, कुछ परिस्थितियों में ऊर्जा की खपत घटाना और जैविक पदार्थों को प्राकृतिक चक्र में वापस शामिल करना शामिल हैं। हालांकि, इसे पर्यावरण की सभी समस्याओं का समाधान मानना जल्दबाजी होगी। इसकी वास्तविक उपयोगिता प्रक्रिया की गुणवत्ता, ऊर्जा की जरूरत, रोगजनकों के नियंत्रण, तैयार पदार्थ के सुरक्षित उपयोग और स्थानीय कानूनों पर निर्भर करती है। इसके साथ ही धार्मिक और सामाजिक स्वीकार्यता भी अहम रहेगी।
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में इस विधि को कानूनी मंजूरी मिलने की खबर ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है—क्या मृत्यु के बाद शरीर को प्रकृति में लौटाने का यह तरीका भविष्य में अंतिम संस्कार का एक सामान्य विकल्प बन सकेगा? इसका उत्तर केवल तकनीक से तय नहीं होगा। इसके लिए वैज्ञानिक प्रमाण, स्पष्ट कानून, पर्यावरणीय आकलन और लोगों की व्यक्तिगत मान्यताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

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