सावन का महीना और अयोध्या में मछली की दावत… सवाल आस्था और सनातन का भी है

The CSR Journal Magazine
सावन का महीना हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दौरान कई लोग मांसाहार से दूर रहते हैं। लेकिन अयोध्या में मछली भोज को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में मछली भोजन की सामान्य बात मानी जाती है। सवाल है कि क्या धार्मिक नगरी अयोध्या में ऐसे भोज का आयोजन ठीक है? यह मुद्दा आस्था का बन गया है।

आस्था और मर्यादा का टकराव, भोजन का चयन और धर्म

अयोध्या को राम की जन्मभूमि माना जाता है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। यहां सावन के महीने में मछली खाने का वाकया कुछ कथित सार्वजनिक व्यक्तियों की ओर से किया गया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने हनुमानगढ़ी में पूजा करने के बाद मछली-भात भोज में भाग लिया। इससे धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। भारतीय समाज में खान-पान की परंपराएं विभिन्नता से भरी हैं। परंतु मांसाहार जैसे कार्य को धार्मिक अवसरों पर करना गलत माना जा सकता है। जब कोई सार्वजनिक समारोह होता है, तो यह व्यक्तिगत अधिकार से बाहर जाकर सार्वजनिक जागरूकता का विषय बन जाता है।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य, कांग्रेस अध्यक्ष का बयान

जब कोई सार्वजनिक व्यक्ति धार्मिक स्थल पर पूजा करता है और बाद में मांसाहार का आयोजन करता है, तो यह क्रिया कई सवाल खड़े करती है। क्या यह कोई सोची-समझी रणनीति है? बहुत से लोग इसे राजनीतिक स्वार्थ से जोड़कर देख रहे हैं। ऐसे अवसरों पर, आस्था का अपमान होने के आरोप लगते हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने इस मामले में स्पष्ट किया है कि उन्होंने केवल निषाद समाज के कार्यक्रम में भाग लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ झूठी बात फैलायी जा रही है। राय ने मछली खाने की तस्वीर या वीडियो दिखाने पर इस्तीफा देने की बात की है।

धार्मिक अस्मिता पर सवाल

ऐसी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक पहचान को लेकर संवेदनशीलता की कमी है। हाल ही में वाराणसी में हुए इफ्तार पार्टी के दौरान मांसाहार परोसने का मामला भी इसी तरह का था। ये घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और धार्मिक अस्मिता का सवाल उठाती हैं।

समाज का गुस्सा और प्रशासन की प्रतिक्रिया

अयोध्या में मछली भोज पर संत समाज का गुस्सा स्वाभाविक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पर प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि सभी को धर्म और आस्था का सम्मान करना चाहिए। जब पब्लिक फिगर्स ऐसे कार्य करते हैं, तो इससे आम श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती हैं।

क्या यह सब कुछ राजनीतिक है?

कई लोग मानते हैं कि यह सब कुछ वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। ऐसे हालात में, जो लोग आस्था के प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं, वे समाज में विभाजन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में, हर किसी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए।

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