यौन उत्पीड़न मामले में तरुण तेजपाल दोषी करार, हाई कोर्ट बोला-No Means No

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तरुण तेजपाल: यौन उत्पीड़न मामले में दोषी, 10 साल की सजा का खतरा! बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने ‘तहेलका’ पत्रिका के पूर्व मुख्य संपादक तरुण तेजपाल को साल 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में दोषी करार दिया है। न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले और न्यायमूर्ति अमित जामसंडेकर की खंडपीठ ने 6 अगस्त 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मापुसा की सेशंस कोर्ट के 2021 के उस आदेश को पूरी तरह पलट दिया, जिसमें तेजपाल को बरी किया गया था।  अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद अब तरुण तेजपाल को कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा मिलने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, तरुण तेजपाल यौन उत्पीड़न मामले में दोषी करार

पत्रकारिता जगत और देश के सबसे हाई-प्रोफाइल कानूनी मामलों में से एक, ‘तहेलका’ पत्रिका के संस्थापक और पूर्व मुख्य संपादक तरुण तेजपाल (62 वर्षीय) को बॉम्बे हाई कोर्ट से बहुत बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने गुरुवार को साल 2013 के बहुचर्चित यौन उत्पीड़न मामले में तेजपाल को बलात्कार और महिला की अस्मत पर हमला करने के संगीन आरोपों के तहत दोषी पाया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने मई 2021 में गोवा की मापुसा सत्र अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा दिए गए बरी करने के फैसले को पूरी तरह खारिज और निरस्त कर दिया है। अदालत ने पाया कि निचली अदालत का फैसला ‘विपरीत’ और पूर्वाग्रह से ग्रसित था, जिसमें पीड़िता के बयानों को परखने के बजाय खुद पीड़िता के चरित्र पर ही ट्रायल शुरू कर दिया गया था। भारतीय दंड संहिता (IPC) की कड़ी धाराओं के तहत दोषी ठहराए जाने के बाद तेजपाल पर कानूनन कम से कम 10 साल की कठोर कैद से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा की तलवार लटक गई है।

किन धाराओं में दोषी पाए गए तेजपाल?

रिपोर्ट के अनुसार, न्यायालय के आधिकारिक बयानों के आधार पर खंडपीठ ने तरुण तेजपाल को निम्नलिखित धाराओं के तहत कसूरवार माना है-
IPC धारा 376(2)(f): इसके तहत कोई भी व्यक्ति जो भरोसे या अधिकार के पद पर रहते हुए किसी महिला के साथ दुष्कर्म करता है, वह कड़ी सजा का भागीदार होता है।
IPC धारा 376(2)(k): नियंत्रण या प्रबंधन की स्थिति में पद का दुरुपयोग कर किया गया बलात्कार।
IPC धारा 354A: कार्यस्थल या अन्य जगह पर यौन उत्पीड़न (शारीरिक संपर्क की चेष्टा या यौन अनुग्रह की मांग)।
IPC धारा 354B: किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना।
इन धाराओं में धारा 376 के तहत न्यूनतम कानूनन सजा 10 वर्ष की तय की गई है।

13 साल पुराना पूरा घटनाक्रम: क्या था मामला?

यह मामला नवंबर 2013 का है, जब गोवा के एक आलीशान फाइव-स्टार होटल (बंबोलिम) में तहलका पत्रिका द्वारा वार्षिक ‘थिंकफेस्ट’ (ThinkFest) कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन के दौरान, तहलका में ही कार्यरत एक जूनियर महिला पत्रकार ने आरोप लगाया था कि 7 और 8 नवंबर 2013 की रात को तरुण तेजपाल ने होटल की लिफ्ट के भीतर उसके साथ दो बार जबरन यौन उत्पीड़न और बलात्कार की वारदात को अंजाम दिया। जब पीड़िता ने इस घटना की शिकायत तहलका की तत्कालीन प्रबंध संपादक शोमा चौधरी से की, तो यह मामला मीडिया और जनमानस के सामने आ गया। बढ़ते दबाव के बीच, गोवा पुलिस ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए 23 नवंबर 2013 को तेजपाल के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की। इसके बाद 30 नवंबर 2013 को तेजपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। वह लगभग सात महीने तक जेल में रहे, जिसके बाद जुलाई 2014 में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी।

सत्र न्यायालय का विवादित फैसला और हाई कोर्ट में चुनौती

गोवा पुलिस की क्राइम ब्रांच ने फरवरी 2014 में तेजपाल के खिलाफ 2,846 पन्नों की लंबी-चौड़ी चार्जशीट दाखिल की थी। मामले का ट्रायल साल 2017 में शुरू हुआ। अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने के लिए कुल 71 गवाहों की जांच की और कई इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जैसे ईमेल, व्हाट्सएप संदेश और CCTV फुटेज कोर्ट के सामने रखे। हालांकि, 21 मई 2021 को मापुसा की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी ने एक चौंकाने वाला फैसला सुनाते हुए तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया। सत्र न्यायालय ने अपने 527 पन्नों के फैसले में पीड़िता के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत का कहना था कि पीड़िता ने घटना के बाद “सामान्य व्यवहार” नहीं दिखाया, जो कि एक यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को दिखाना चाहिए। इस फैसले की देशव्यापी आलोचना हुई और इसे बेहद ‘महिला विरोधी’ तथा रूढ़िवादी माना गया। इस फैसले के खिलाफ गोवा सरकार ने तुरंत बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया। सरकार ने दलील दी कि निचली अदालत ने आरोपी के अपराधों को देखने के बजाय पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और मामले के प्राथमिक सबूतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

कोर्ट रूम ड्रामा: ‘No Means No’ बनाम ‘राजनैतिक षड्यंत्र’

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। गोवा सरकार की ओर से पेश हुए देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में जोरदार पैरवी की।

अभियोजन पक्ष (सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता) की दलीलें:व्यवहार का कोई तय पैमाना नहीं

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि किसी भी पीड़िता के लिए कोई निश्चित या मानक व्यवहारिक मानदंड नहीं होता कि वह हादसे के बाद कैसा बर्ताव करे। आघात (Trauma) से उबरने का हर इंसान का तरीका अलग होता है।

माफीनामा सबसे बड़ा सबूत

अभियोजन ने कोर्ट का ध्यान तरुण तेजपाल द्वारा घटना के तुरंत बाद पीड़िता को भेजे गए उस ‘निजी माफीनामे’ (Apology Email) की ओर खींचा, जिसमें तेजपाल ने स्पष्ट रूप से अपने कृत्य के लिए बिना शर्त माफी मांगी थी और इसे “गलत समझ” तथा “विवेक की कमी” माना था।

कड़ा संदेश देने की जरूरत

तुषार मेहता ने अदालत से तेजपाल को अधिकतम सजा देने की मांग करते हुए कहा, “इस अदालत को समाज को एक बेहद स्पष्ट और कड़ा संदेश देना चाहिए कि जब एक लड़की ‘ना’ (No) कहती है, तो उसका मतलब सिर्फ ‘ना’ होता है। इसमें कोई और अर्थ नहीं निकाला जा सकता।”

बचाव पक्ष (वरिष्ठ अधिवक्ता आबाद पोंडा) की दलीलें

तरुण तेजपाल के वकील आबाद पोंडा ने हाई कोर्ट में इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करने की कोशिश की।
कहानी गढ़ने का आरोप: बचाव पक्ष ने दावा किया कि पीड़िता ने केवल एक पुस्तक के लिए एक लाख रुपये की फेलोशिप अनुदान प्राप्त करने के उद्देश्य से यौन शोषण की यह झूठी कहानी गढ़ी थी।
लापता CCTV फुटेज: वकील ने कोर्ट को बताया कि होटल की पहली मंजिल का मुख्य CCTV फुटेज अचानक गायब हो गया, जो अभियोजन की मंशा पर संदेह पैदा करता है।

उम्र का हवाला और नरमी की गुहार

दोषी करार दिए जाने के बाद स्वयं तरुण तेजपाल ने कोर्ट रूम में खड़े होकर भावुक अपील की।  उन्होंने कहा, “मैं 62 वर्ष का हो चुका हूँ। मैं एक राजनैतिक प्रतिशोध (Political Victim) का शिकार हूँ। मेरी दो बेटियां हैं और एक पत्नी है। कृपया मेरे प्रति नरमी बरती जाए।”

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी और आगे की कानूनी राह

जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसंडेकर की पीठ ने बचाव पक्ष की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि तेजपाल द्वारा भेजा गया लिखित माफीनामा और पीड़िता की लगातार बनी रही गवाही यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि लिफ्ट के भीतर पद का दुरुपयोग कर यौन शोषण किया गया था। हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद तरुण तेजपाल के पास अब केवल देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में इस फैसले को चुनौती देने का विकल्प बचा है। तेजपाल के वकीलों ने हाई कोर्ट से सजा के आदेश पर आठ सप्ताह की रोक (Stay) लगाने की मांग की है ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकें। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि मामला महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराध और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़ा है, इसलिए तेजपाल के लिए ऊपरी अदालत से तुरंत राहत पाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
यह फैसला देश में काम करने वाली लाखों महिलाओं के अधिकारों और कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा (POSH कानून और आपराधिक न्याय प्रणाली) के लिहाज से एक मील का पत्थर माना जा रहा है। अदालत इस मामले में सजा की अवधि (Quantum of Sentence) पर आगे का आदेश जल्द ही विस्तृत रूप से जारी करेगी।

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