टीवी के प्रमुख विजय की राजनीतिक रैली में हुई भगदड़ ने पूरे तमिलनाडु को हिला दिया है। इस त्रासदी में अब तक 41 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें से पांच केवल करूर शहर से आठ किलोमीटर दूर बसे छोटे से गांव एमूर के थे। गांव पर ऐसा कहर टूटा है कि एक-एक घर से चीख-पुकार उठ रही है।
एमूर गांव में मातम का सन्नाटा
गांव के निवासी के. शक्तिवेल ने अपनी पत्नी और 14 वर्षीय बेटी को इस हादसे में खो दिया। गम से टूटे शक्तिवेल कहते हैं, “मेरी बड़ी बेटी पहले ही गुजर चुकी थी। अब पत्नी और छोटी बेटी भी चली गईं। दोनों विजय अन्ना के बड़े प्रशंसक थीं। भीड़ बढ़ने का डर था, मैंने बहुत रोका, लेकिन वे किसी भी कीमत पर विजय को देखना चाहती थीं।घंटों फोन करने के बाद उन्हें यह खबर मिली कि उनकी पत्नी और बेटी अलग-अलग जगहों पर भगदड़ में कुचलकर मारी गईं।
इसी गांव के पी. सेल्वराज ने भी अपनी पत्नी को खो दिया। उनके साथ गया बेटा बाल-बाल बचा। पी. सेल्वराज का कहना है, “अब मेरे दोनों बेटे, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी, बिल्कुल असहाय हो गए हैं। उन्हें कोई संभालने वाला नहीं बचा।”
उपिदमंगलम में टूटी खुशियां
करूर जिले के ही उपिदमंगलम गांव में भी त्रासदी ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। एक दंपती ने अपनी बेटी और उसके मंगेतर को खो दिया। दोनों की नवंबर में शादी होने वाली थी। परिजन बताते हैं कि भीड़ के डर से भाई बाहर ही रुका रहा, लेकिन बेटी और मंगेतर अंदर चले गए और फिर कभी लौटे नहीं।
बेटी की मां एस. मालती रोते हुए बोलीं, “मैंने उसे अपने परिवार की पहली ग्रेजुएट बनाया था। अब उसकी पढ़ाई, सपने और जीवन सब खत्म हो गया।”
मां और दो बेटियां भी बनीं शिकार
पीड़ितों में एक मां और उसकी दो छोटी बेटियां भी शामिल थीं। करूर और आसपास के कई परिवार एक ही पल में उजड़ गए। हर तरफ गम और मातम का माहौल है।
हादसे के बाद का खौफनाक नजारा
रविवार को हादसे वाली जगह का मंजर किसी युद्धक्षेत्र से कम नहीं था। हर तरफ टूटी चप्पलें, झंडे, कपड़ों के टुकड़े, बोतलें और बिखरा हुआ कचरा पड़ा था। कई पेड़ों की डालियां टूटी हुई थीं और आस-पास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हो गई थीं।
स्थानीय दुकानदार एस. भास्कर ने बताया, “लोग पेड़ों पर चढ़ने लगे थे, कई गड्ढों में गिर गए। जनरेटर एरिया भर गया तो उसे बंद करना पड़ा और फ्लडलाइट्स गिर गईं। विजय को कम से कम अस्पताल जाकर घायलों से मिलना चाहिए।”
सवालों के घेरे में सुरक्षा इंतजाम
हादसे के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि इतनी बड़ी रैली में सुरक्षा व्यवस्था क्यों नाकाम रही। अगर पुलिस और प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के बेहतर इंतजाम किए होते तो शायद इतनी जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
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