अब तक के सबसे शक्तिशाली अल नीनो की आहट, प्रशांत महासागर की गर्मी से बदल सकता है दुनिया का मौसम, बढ़ेगा वैश्विक संकट

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प्रशांत महासागर में बढ़ती गर्मी, अल नीनो का खतरा गहराया; जापान, चीन, ताइवान और फिलीपींस पर मंडरा रहा भीषण तूफानों का खतरा

प्रशांत महासागर के असामान्य रूप से गर्म होते पानी ने वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। समुद्र की सतह का तापमान बढ़ने से दुनिया के मौसम चक्र में बड़े बदलाव आने की आशंका है। इसी बीच अल नीनो की संभावित वापसी और उसके प्रभावों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। मौसम विज्ञानियों की चिंता केवल समुद्र के गर्म होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका तक पड़ सकता है। कहीं अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं भारी बारिश, बाढ़ और उष्णकटिबंधीय तूफानों का खतरा बढ़ सकता है। पूर्वी एशिया के जापान, चीन, ताइवान और फिलीपींस जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन देशों की बड़ी आबादी समुद्र तटों के आसपास रहती है और यहां पहले से ही उष्णकटिबंधीय चक्रवात, समुद्री तूफान तथा भारी बारिश का खतरा बना रहता है। ऐसे में समुद्र के तापमान में असामान्य वृद्धि और प्रशांत महासागर की मौसमी परिस्थितियों में बदलाव आपदा का जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि अल नीनो आने का अर्थ यह नहीं है कि इन सभी देशों में निश्चित रूप से एक साथ भीषण तूफान आएंगे। तूफानों की संख्या, उनकी दिशा और तीव्रता पर कई दूसरे मौसमी कारक भी प्रभाव डालते हैं।

क्या है अल नीनो और समुद्र का तापमान क्यों बढ़ रहा है?

अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। ये हवाएं गर्म समुद्री पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके कारण दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के पास अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ने लगती हैं। परिणामस्वरूप मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। गर्म पानी का यह फैलाव समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा के आदान-प्रदान को प्रभावित करता है। इससे हवाओं, बादलों, वर्षा और मौसमी गतिविधियों का सामान्य क्रम बदलने लगता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के 8 अक्टूबर 2026 के आकलन के अनुसार, प्रशांत महासागर में अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है। संगठन ने अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में असाधारण वृद्धि का अनुमान जताया है। इसके लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नीनो 3.4 सूचकांक में अगस्त 2026 में तापमान सामान्य से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। अक्टूबर-दिसंबर के लिए इसका मौसमी औसत लगभग 3.7 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान दिया गया है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2015-16 के शक्तिशाली अल नीनो के दौरान इसी अवधि के आसपास दर्ज अधिकतम तापमान विसंगति लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस थी। इस तरह मौजूदा अनुमान पिछली बड़ी घटना से भी अधिक मजबूत स्थिति की ओर संकेत करता है। हालांकि, यह एक मौसमी पूर्वानुमान है, अंतिम रूप से दर्ज हो चुका तापमान नहीं। WMO के मुताबिक, मौजूदा घटना 1950 के बाद की सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं में शामिल हो सकती है।

प्रशांत महासागर के गर्म होने से क्यों बढ़ सकती है तबाही?

समुद्र केवल पानी का विशाल भंडार नहीं है, बल्कि पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण नियंत्रक भी है। समुद्र अपने भीतर बड़ी मात्रा में गर्मी जमा करता है और वायुमंडल के साथ उसका आदान-प्रदान करता रहता है। जब समुद्र का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है, तब वाष्पीकरण बढ़ सकता है। इससे वातावरण में नमी की मात्रा बढ़ती है और अनुकूल परिस्थितियों में भारी बारिश तथा तीव्र मौसमी घटनाओं को ऊर्जा मिल सकती है। समुद्र का गर्म पानी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए ऊर्जा का स्रोत बन सकता है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में हवा की गति, वायुमंडलीय दबाव, नमी और अन्य परिस्थितियां अनुकूल हों तो तूफान अधिक शक्तिशाली बन सकता है। लेकिन केवल समुद्र का गर्म होना किसी तूफान के बनने या उसकी तीव्रता बढ़ने की गारंटी नहीं है। एक और महत्वपूर्ण पहलू समुद्री गर्मी की लहरें यानी मरीन हीटवेव हैं। जब समुद्र का कोई हिस्सा लंबे समय तक सामान्य से अधिक गर्म रहता है, तब समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव पड़ता है। मूंगे की चट्टानों का रंग उड़ने और उनके कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। मछलियों के आवास और समुद्री खाद्य शृंखला पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

जापान, चीन, ताइवान और फिलीपींस के सामने क्या चुनौती है?

पूर्वी एशिया और पश्चिमी प्रशांत का समुद्री क्षेत्र दुनिया के सबसे सक्रिय उष्णकटिबंधीय चक्रवात क्षेत्रों में शामिल है। फिलीपींस को हर साल कई उष्णकटिबंधीय तूफानों का सामना करना पड़ता है। जापान, ताइवान और चीन के तटीय इलाकों में भी तेज हवाओं, समुद्री लहरों, भूस्खलन और भारी बारिश से नुकसान होता रहा है। अल नीनो के दौरान पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण बदलने से तूफानों के बनने वाले स्थान और उनके रास्तों में बदलाव आ सकता है। कुछ परिस्थितियों में तूफान समुद्र के ऊपर अधिक समय बिता सकते हैं और आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ सकते हैं। हालांकि, इसका प्रभाव हर वर्ष और हर देश में एक जैसा नहीं होता।
फिलीपींस: यहां सबसे बड़ी चिंता पानी की उपलब्धता, सूखे और कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव की है। फिलीपींस की मौसम एजेंसी PAGASA ने 4 नवंबर 2026 को जारी बयान में कहा है कि उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में बहुत शक्तिशाली अल नीनो मौजूद है और इसके 2027 की पहली छमाही तक बने रहने की आशंका है। एजेंसी के अनुसार, अक्टूबर में पांच प्रांतों में मौसम संबंधी सूखा, 11 प्रांतों में शुष्क अवधि और 10 प्रांतों में शुष्क परिस्थितियां दर्ज की गईं। नवंबर में भी देश के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश का अनुमान है। इसके बावजूद उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के कारण भारी बारिश की घटनाएं हो सकती हैं।
ताइवान: यहां तेज बारिश, पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा महत्वपूर्ण है। समुद्र के तापमान में वृद्धि के साथ तूफानों की दिशा और तीव्रता पर नजर रखना जरूरी होगा। विशेष रूप से निचले तटीय क्षेत्रों और पहाड़ी ढलानों के पास रहने वाले लोगों के लिए समय रहते चेतावनी मिलना महत्वपूर्ण है।
चीन: चीन के दक्षिणी और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के कारण भारी बारिश और बाढ़ का खतरा रहता है। शहरों में जल निकासी व्यवस्था पर दबाव, नदियों का जलस्तर बढ़ना और तटीय बस्तियों में जलभराव जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।
जापान: जापान में समुद्री तूफान और तेज बारिश के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन तथा नदियों में अचानक बाढ़ आने का जोखिम रहता है। विशेष रूप से तटीय शहरों, बंदरगाहों और द्वीपों पर मौसम की चेतावनियों को गंभीरता से लेना जरूरी है।

सरकारों ने लोगों को राशन और पानी जमा करने की सलाह दी

समुद्र में बढ़ती गर्मी और अल नीनो के संभावित प्रभावों को देखते हुए कई देशों में आपदा प्रबंधन और जल संरक्षण की तैयारियां तेज की जा रही हैं। हालांकि, यह दावा करना सही नहीं होगा कि जापान, चीन, ताइवान और फिलीपींस की सभी सरकारों ने लोगों को एक साथ बड़े पैमाने पर राशन और पानी जमा करने का निर्देश दिया है। फिलीपींस की मौसम एजेंसी PAGASA ने लोगों और सरकारी विभागों को पानी का संरक्षण करने, जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने और सूखे तथा भारी बारिश से प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों में पहले से तैयारी रखने की सलाह दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी 5 नवंबर 2026 को जारी अपनी रिपोर्ट में पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के कई द्वीपीय देशों में पानी की कमी को लेकर चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप, वानुआतु, फिजी और टोंगा में मई से अक्टूबर के बीच लगातार कम बारिश के कारण जल संकट की स्थिति बनी। नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच भी पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। ऐसे में इन देशों में जल संरक्षण, पेयजल प्रबंधन और सूखे से निपटने की तैयारी बेहद जरूरी हो गई है। आम लोगों के लिए इसका मतलब यह है कि आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए। घर में पीने का पर्याप्त पानी, जरूरी दवाइयां, सूखा खाद्य पदार्थ, टॉर्च, बैटरी, प्राथमिक उपचार सामग्री और आवश्यक दस्तावेज सुरक्षित रखना समझदारी है। हालांकि, बिना जरूरत बड़ी मात्रा में राशन खरीदकर जमा करना उचित नहीं है।

अल नीनो का भारत पर भी पड़ सकता है असर

भारत के लिए भी मौजूदा अल नीनो की स्थिति महत्वपूर्ण है। देश की कृषि व्यवस्था मानसूनी बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती है। अल नीनो के दौरान भारतीय मानसून कमजोर रहने की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि, हर अल नीनो वर्ष में मानसून कमजोर ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। हिंद महासागर की परिस्थितियां, मानसून परिसंचरण और अन्य मौसमी कारक भी बारिश को प्रभावित करते हैं। WMO के अक्टूबर-दिसंबर 2026 के वैश्विक मौसमी पूर्वानुमान में भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है। इसका असर कृषि, जलाशयों, भूजल और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक बारिश कम होती है तो खरीफ और रबी फसलों की बुवाई तथा उत्पादन प्रभावित हो सकता है। धान, मक्का, सोयाबीन और दालों जैसी फसलों पर विशेष दबाव पड़ सकता है। सिंचाई के लिए पानी की मांग बढ़ने से किसानों की लागत भी बढ़ सकती है। इसके अलावा जलाशयों में पानी कम होने पर पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन को लेकर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। मुंबई और महाराष्ट्र के संदर्भ में भी यह विषय महत्वपूर्ण है। यहां पेयजल की आपूर्ति बड़े पैमाने पर जलाशयों और मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। यदि आने वाले मौसमी चक्र में बारिश सामान्य से कम रहती है तो जल प्रबंधन, भूजल संरक्षण और जलाशयों की स्थिति पर विशेष ध्यान देना होगा। हालांकि, अभी केवल अल नीनो के आधार पर मुंबई में पानी की कटौती की घोषणा या निश्चित जल संकट का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

खेती से लेकर खाद्य पदार्थों की कीमतों तक पड़ सकता है असर

अल नीनो का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। इसका असर खाद्य उत्पादन, व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। जिन देशों में बारिश कम होती है, वहां फसलों का उत्पादन घटने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ से खेतों, भंडारण केंद्रों और परिवहन व्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है। यदि भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका जैसे प्रमुख कृषि उत्पादक क्षेत्रों में मौसम प्रतिकूल रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। चावल, गेहूं, मक्का, कॉफी, कोको और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा अत्यधिक गर्मी से बिजली की मांग बढ़ सकती है। एयर कंडीशनर और शीतलन उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ने से ऊर्जा खपत में वृद्धि होगी। यदि किसी देश में सूखे के कारण जलविद्युत उत्पादन घटता है तो बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

क्या यह अब तक का सबसे खतरनाक अल नीनो है?

मौजूदा अल नीनो की तीव्रता को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता के ठोस कारण हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपने आकलन में बताया कि नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान की विसंगति बढ़कर 2.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई थी। संगठन ने जनवरी-मार्च 2027 तक शक्तिशाली से अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो बने रहने की संभावना जताई थी। जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (JMA) ने भी 9 अक्टूबर के अपने पूर्वानुमान में बताया कि सितंबर 2026 में नीनो 3 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस अधिक था। एजेंसी के अनुसार, यह 1949 से उपलब्ध रिकॉर्ड में सबसे अधिक था। हालांकि, वैज्ञानिक अल नीनो को लेकर ‘सुपर अल नीनो’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल में सावधानी बरतते हैं। WMO का कहना है कि यह कोई मानकीकृत वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है। अल नीनो की ताकत का आकलन समुद्र के तापमान, उसकी अवधि और वायुमंडलीय परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो एक ही चीज नहीं हैं। अल नीनो प्राकृतिक समुद्र-वायुमंडल प्रक्रिया है, जबकि मानव गतिविधियों से बढ़ रही वैश्विक गर्मी पृथ्वी के औसत तापमान को बढ़ा रही है। WMO के अनुसार, वैश्विक गर्मी अल नीनो से जुड़े प्रभावों को अधिक गंभीर बना सकती है, क्योंकि गर्म वातावरण और समुद्र में अधिक ऊर्जा तथा नमी उपलब्ध रहती है।

आने वाले महीनों में क्यों जरूरी होगी सतर्कता?

वैज्ञानिकों के अनुसार, मौजूदा अल नीनो का प्रभाव 2026 के अंत से लेकर 2027 के शुरुआती महीनों तक विशेष रूप से महत्वपूर्ण रह सकता है। इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखाई देगा। कहीं सूखे और पानी की कमी का खतरा होगा तो कहीं भारी बारिश, बाढ़ और तूफानों की आशंका बढ़ सकती है। WMO ने सरकारों को मौसमी पूर्वानुमानों के आधार पर कृषि, जल संसाधन, स्वास्थ्य, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन से जुड़ी तैयारियां करने की जरूरत बताई है। समय रहते चेतावनी मिलने से जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। फिलीपींस, ताइवान, चीन और जापान जैसे देशों के लिए समुद्री तूफानों की निगरानी, तटीय सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण और लोगों को समय पर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होगा। वहीं प्रशांत द्वीपीय देशों के लिए पेयजल की उपलब्धता और सूखे से निपटने की व्यवस्था बड़ी चुनौती बन सकती है।
कुल मिलाकर, प्रशांत महासागर का असामान्य रूप से गर्म होना दुनिया के लिए गंभीर मौसमी चेतावनी है। मौजूदा अल नीनो की ताकत ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचने की आशंका है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया में एक साथ तबाही आने वाली है। असली चुनौती यह है कि अलग-अलग देशों में मौसम के बदलते स्वरूप के अनुसार समय रहते तैयारी की जाए। वैज्ञानिकों की निगरानी, सरकारों की आपदा प्रबंधन योजनाएं और आम लोगों की सतर्कता ही इस संभावित संकट से होने वाले नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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