अब सैटेलाइट से जुड़ेगा मोबाइल! TRAI की नई सिफारिश से बिना टावर वाले इलाकों में भी नेटवर्क सुविधा

The CSR Journal Magazine

बिना टावर के भी मिलेगी कॉलिंग और इंटरनेट की सुविधा? TRAI के नए प्रस्ताव से बदल सकती है दूरसंचार की तस्वीर

भारत में मोबाइल नेटवर्क और सैटेलाइट इंटरनेट की दुनिया में बड़ा बदलाव आने की संभावना है। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) के लिए अलग प्राधिकरण व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसका उद्देश्य सैटेलाइट कंपनियों और पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना और देश में अंतरिक्ष आधारित संचार सेवाओं का विस्तार करना है। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य सैटेलाइट कंपनियों को दूरसंचार कंपनियों के लिए नेटवर्क उपलब्ध कराने की अनुमति देना है, ताकि मौजूदा मोबाइल सेवाओं की पहुंच उन क्षेत्रों तक भी बढ़ाई जा सके जहां पारंपरिक मोबाइल टावर लगाना मुश्किल या महंगा है।

TRAI की सिफारिश में क्या है खास?

TRAI ने 5 नवंबर 2026 को सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क प्रोवाइडर के लिए नए प्राधिकरण और स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़ी सिफारिशें जारी की हैं। यह व्यवस्था दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 3(1)(b) के तहत प्रस्तावित है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सैटेलाइट नेटवर्क तैयार करने वाली कंपनियां अपना पूरा नेटवर्क अलग-अलग मोबाइल ग्राहकों को बेचने के बजाय दूरसंचार सेवा देने वाली कंपनियों को उपलब्ध करा सकेंगी। इस व्यवस्था को सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क एज ए सर्विस (SCNaaS) कहा गया है। इससे सैटेलाइट कंपनियों को नेटवर्क का बुनियादी ढांचा तैयार करने और उसका संचालन करने का अवसर मिलेगा, जबकि मोबाइल कंपनियां उस नेटवर्क का इस्तेमाल करके अपने ग्राहकों को सेवाएं दे सकेंगी। इससे हर कंपनी को अलग-अलग सैटेलाइट नेटवर्क तैयार करने की जरूरत कम हो सकती है। साथ ही, मौजूदा दूरसंचार कंपनियों और सैटेलाइट सेवा प्रदाताओं के बीच साझेदारी को बढ़ावा मिलेगा। TRAI ने इस प्राधिकरण के लिए पूरे देश में काम करने की अनुमति देने की सिफारिश की है। इसकी अवधि अधिकतम 20 साल रखने और शर्तों के अधीन अगले 20 साल तक नवीनीकरण की सुविधा देने का प्रस्ताव है।

सैटेलाइट से सीधे मोबाइल फोन तक पहुंचेगा नेटवर्क

इस प्रस्ताव का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) तकनीक है। इसके तहत भविष्य में कुछ ऐसे मोबाइल फोन भी सैटेलाइट से सीधे जुड़ सकेंगे, जिन्हें इस तकनीक के अनुकूल बनाया गया होगा। इसका अर्थ है कि मोबाइल फोन को नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए हर स्थिति में जमीन पर लगे पारंपरिक मोबाइल टावर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। फिलहाल मोबाइल फोन से कॉल करने या इंटरनेट चलाने के लिए आमतौर पर मोबाइल टावर और दूरसंचार नेटवर्क की जरूरत होती है। लेकिन सैटेलाइट आधारित डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक इस निर्भरता को कुछ परिस्थितियों में कम कर सकती है। उदाहरण के तौर पर पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों, समुद्र के बीच या ऐसे दूरदराज के क्षेत्रों में जहां मोबाइल टावर लगाना मुश्किल है, वहां सैटेलाइट के माध्यम से संपर्क उपलब्ध कराया जा सकता है। प्राकृतिक आपदा के दौरान जब बाढ़, भूकंप या तूफान से मोबाइल टावर और जमीन पर मौजूद संचार व्यवस्था क्षतिग्रस्त हो जाती है, तब भी यह तकनीक वैकल्पिक संचार माध्यम बन सकती है। हालांकि, इसके लिए मोबाइल फोन में जरूरी तकनीकी क्षमता और संबंधित सैटेलाइट आवृत्तियों का समर्थन होना आवश्यक होगा। इसलिए यह मानना सही नहीं होगा कि मौजूदा सभी स्मार्टफोन बिना किसी बदलाव के सैटेलाइट से जुड़ जाएंगे।

दो तरीकों से मिलेगी सैटेलाइट कनेक्टिविटी

TRAI ने डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा के लिए दो तरह की व्यवस्था का समर्थन किया है। पहली व्यवस्था मोबाइल सैटेलाइट सर्विस (MSS) स्पेक्ट्रम पर आधारित होगी। इसमें मोबाइल उपकरण सीधे सैटेलाइट नेटवर्क से जुड़ सकेंगे। इसके लिए दूरसंचार कंपनियां अधिकृत सैटेलाइट नेटवर्क प्रदाताओं के साथ साझेदारी कर सकेंगी। TRAI ने स्मार्टफोन निर्माता कंपनियों को भविष्य के उपकरणों में जरूरी MSS बैंड मॉड्यूल शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करने की भी सिफारिश की है। दूसरी व्यवस्था इंटरनेशनल मोबाइल टेलीकम्युनिकेशन (IMT) स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल से जुड़ी है। इसमें मोबाइल कंपनियों को पहले से आवंटित अपने स्पेक्ट्रम का उपयोग सैटेलाइट के माध्यम से मोबाइल फोन तक नेटवर्क पहुंचाने के लिए करने की अनुमति देने की सिफारिश की गई है। इस व्यवस्था के लिए TRAI ने 600 मेगाहर्ट्ज, 700 मेगाहर्ट्ज, 800 मेगाहर्ट्ज, 900 मेगाहर्ट्ज, 1800 मेगाहर्ट्ज और 2100 मेगाहर्ट्ज बैंड का उल्लेख किया है। इस सेवा को गैर-हस्तक्षेप और गैर-संरक्षण के आधार पर अनुमति देने का सुझाव दिया गया है। यानी इस तरह की सेवा से अन्य आवंटित स्पेक्ट्रम उपयोगकर्ताओं के काम में बाधा नहीं आनी चाहिए और इसे किसी तरह का अतिरिक्त संरक्षण प्राप्त नहीं होगा। TRAI ने यह भी सिफारिश की है कि दूरसंचार कंपनियों को अपने पहले से आवंटित IMT स्पेक्ट्रम का सैटेलाइट आधारित D2D सेवा में इस्तेमाल करने के लिए अलग से अतिरिक्त स्पेक्ट्रम शुल्क नहीं देना पड़े। हालांकि, इसके लिए निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करना होगा।

स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए क्या है प्रस्ताव?

सैटेलाइट नेटवर्क के संचालन के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम बेहद जरूरी होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए TRAI ने सैटेलाइट कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटित करने की प्रक्रिया और उसकी अवधि को लेकर भी सुझाव दिए हैं। प्राधिकरण ने फिक्स्ड सैटेलाइट सर्विस (FSS) और मोबाइल सैटेलाइट सर्विस (MSS) के लिए संबंधित स्पेक्ट्रम का प्रशासनिक तरीके से आवंटन करने की सिफारिश की है। इसके तहत फीडर लिंक और यूजर लिंक के लिए निर्धारित आवृत्तियों का इस्तेमाल किया जा सकेगा। प्रस्ताव के अनुसार, स्पेक्ट्रम आवंटन की शुरुआती अवधि अधिकतम पांच साल रखने और जरूरत पड़ने पर इसे दो साल तक बढ़ाने का विकल्प देने की सिफारिश की गई है। सैटेलाइट सेवाओं में C-बैंड, Ku-बैंड, Ka-बैंड और Q/V-बैंड जैसी आवृत्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। वहीं मोबाइल सैटेलाइट सेवाओं के लिए L-बैंड और S-बैंड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

कंपनियों पर कितना लगेगा शुल्क?

TRAI ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क प्रदाताओं के लिए वित्तीय शर्तें भी प्रस्तावित की हैं। इसके तहत कंपनियों से उनके समायोजित सकल राजस्व (AGR) का 8 प्रतिशत प्राधिकरण शुल्क लेने की सिफारिश की गई है। इस शुल्क के लिए न्यूनतम अनिवार्य राशि निर्धारित नहीं करने का सुझाव भी दिया गया है। प्रस्ताव में कुछ अन्य वित्तीय शर्तें भी शामिल हैं। ये शुल्क और वित्तीय शर्तें TRAI की सिफारिशों का हिस्सा हैं। इन्हें अंतिम सरकारी नियम नहीं समझना चाहिए।

स्टारलिंक, वनवेब और जियो जैसी कंपनियों को कैसे मिलेगा फायदा?

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट और संचार सेवाओं के क्षेत्र में कई बड़ी कंपनियां सक्रिय हैं। इनमें एलन मस्क की स्टारलिंक, भारती समूह समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस जियो की सैटेलाइट संचार इकाई शामिल हैं। TRAI की प्रस्तावित व्यवस्था से ऐसी कंपनियों के लिए सैटेलाइट नेटवर्क का बुनियादी ढांचा तैयार करने और उसे अन्य दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के साथ साझा करने का रास्ता स्पष्ट हो सकता है। इस व्यवस्था में सैटेलाइट कंपनियां नेटवर्क उपलब्ध कराएंगी, जबकि अधिकृत दूरसंचार कंपनियां ग्राहकों को वास्तविक सेवाएं देंगी। इससे नेटवर्क तैयार करने की लागत और संसाधनों के इस्तेमाल को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इन सभी कंपनियों को इस प्रस्ताव के आधार पर स्वतः सेवाएं शुरू करने की अनुमति मिल गई है। इसके लिए संबंधित प्राधिकरण, स्पेक्ट्रम आवंटन और अन्य नियामकीय शर्तों का पालन करना होगा।

क्या बिना सिम कार्ड के भी कर सकेंगे कॉल?

इस प्रस्ताव को लेकर स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भविष्य में बिना सिम कार्ड और मोबाइल टावर के भी कॉलिंग और इंटरनेट की सुविधा मिलेगी? इसका जवाब तकनीक और सेवा के प्रकार पर निर्भर करेगा। डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक में अनुकूल मोबाइल फोन सीधे सैटेलाइट से संपर्क स्थापित कर सकते हैं। इससे पारंपरिक मोबाइल टावर की अनुपस्थिति में भी कुछ संचार सेवाएं उपलब्ध कराना संभव हो सकता है। लेकिन सैटेलाइट से सीधे जुड़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर फोन में सिम कार्ड की जरूरत पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। उपयोगकर्ता की पहचान, नेटवर्क पर पंजीकरण, दूरसंचार कंपनी की सेवा और फोन की तकनीकी क्षमता जैसी व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण रहेंगी। इसी तरह, शुरुआत में हर तरह की कॉलिंग और तेज गति वाला इंटरनेट उपलब्ध होने की गारंटी भी नहीं है। इसलिए भविष्य में कुछ विशेष परिस्थितियों में सैटेलाइट के माध्यम से संदेश, आपातकालीन संपर्क और अन्य संचार सेवाएं मिल सकती हैं, लेकिन इनकी वास्तविक उपलब्धता तकनीकी और व्यावसायिक व्यवस्था पर निर्भर करेगी।

दूरसंचार क्षेत्र में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

भारत जैसे बड़े देश में आज भी कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां मोबाइल नेटवर्क की पहुंच सीमित है। पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों, द्वीपों और दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल टावर लगाना और उनका रखरखाव करना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे क्षेत्रों में सैटेलाइट नेटवर्क पारंपरिक दूरसंचार व्यवस्था का विकल्प बनने के बजाय उसका पूरक बन सकता है। इससे दूरसंचार कंपनियों को उन इलाकों तक सेवाएं पहुंचाने का एक अतिरिक्त माध्यम मिलेगा, जहां जमीन पर आधारित नेटवर्क का विस्तार कठिन है। इसका फायदा आपदा प्रबंधन, समुद्री परिवहन, विमानन, दूरदराज के उद्योगों, रक्षा से जुड़े संचार और आपातकालीन सेवाओं में भी मिल सकता है। हालांकि, इन सभी क्षेत्रों में सेवा का स्वरूप और उपलब्धता संबंधित तकनीकी तथा नियामकीय मंजूरियों पर निर्भर करेगी।

अभी ग्राहकों को करना होगा इंतजार

TRAI की 5 नवंबर 2026 को जारी सिफारिशें भारत के सैटेलाइट संचार क्षेत्र के लिए नई नियामकीय व्यवस्था का आधार तैयार करती हैं। इससे पहले प्राधिकरण ने 8 अप्रैल 2026 को इस विषय पर परामर्श पत्र जारी किया था और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे थे। अब अंतिम सिफारिशें दूरसंचार विभाग (DoT) को भेजी गई हैं। अगला कदम केंद्र सरकार और दूरसंचार विभाग की ओर से इन सिफारिशों पर विचार करना और आवश्यक नियमों को अंतिम रूप देना होगा। इसके बाद ही कंपनियों के लिए प्राधिकरण, स्पेक्ट्रम आवंटन और सेवा शुरू करने की प्रक्रिया स्पष्ट होगी। कुल मिलाकर, TRAI का यह प्रस्ताव भारत में मोबाइल नेटवर्क और सैटेलाइट संचार के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो स्मार्टफोन के जरिए सैटेलाइट से सीधे संपर्क की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे उन लोगों को भी संचार सुविधा मिलने का रास्ता खुल सकता है जो फिलहाल मोबाइल टावरों की सीमित पहुंच के कारण नेटवर्क की समस्या से जूझते हैं। लेकिन बिना सिम और बिना टावर के हर स्मार्टफोन पर कॉलिंग और इंटरनेट की सुविधा तत्काल शुरू होने का दावा करना अभी सही नहीं होगा।

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