सूखते जलस्रोत, सुलगती महंगाई: भारत की आर्थिक तरक्की के सामने जल संकट बना सबसे बड़ा रोड़ा

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भारत की आर्थिक तरक्की के लिए जल संकट बना बड़ा खतरा, महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका और कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव

विकसित भारत 2047 के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे भारत के आर्थिक रथ के सामने पानी की भारी किल्लत सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी है। एल नीनो के कारण इस वर्ष मानसून में आई भारी कमी और देश के प्रमुख जलाशयों में पानी के ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर ने न केवल भारत के कृषि क्षेत्र की कमर तोड़ दी है, बल्कि देश में दोहरे अंकों वाली खाद्य महंगाई (Food Inflation) के खतरे को भी बढ़ा दिया है। रेटिंग एजेंसियों और सरकारी थिंक-टैंक नीति आयोग की चेतावनियों के अनुसार, यदि समय रहते इस संकट का ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो यह गंभीर जल संकट भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) दर में सीधे 6 फीसदी तक की बड़ी गिरावट ला सकता है।

सूखते जलस्रोत और दम तोड़ती कृषि: मॉनसून की अनिश्चितता का नया दौर

भारत मूल रूप से एक कृषि प्रधान देश है जहां की 50 फीसदी से अधिक आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की हालिया रिपोर्टों से पता चलता है कि देश के 166 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्टॉक उनकी कुल क्षमता के औसत स्तर से काफी नीचे गिर गया है। इस साल जून से सितंबर के दौरान औसत मानसूनी बारिश में 11 से 12 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है, जिसने बीते एक दशक का सबसे सूखा दौर सामने ला खड़ा किया है।
पानी की इस कमी का सबसे सीधा और पहला प्रहार चालू रबी (सर्दियों की फसलों) सीजन की बुवाई पर देखने को मिल रहा है। देश के पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों—विशेषकर महाराष्ट्र के जालना, कर्नाटक के आंतरिक हिस्सों और आंध्र प्रदेश—में मिट्टी की नमी (Soil Moisture) इस स्तर तक खत्म हो चुकी है कि किसान गेहूं, चना और सरसों जैसी पारंपरिक रबी फसलों की बुवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

किसानों की टूटी कमर

78 वर्षीय किसान अमरसिंह गुशिंगे, जो मुंबई से लगभग 400 किलोमीटर पूर्व जालना जिले के राजेवाड़ी गांव के रहने वाले हैं, इस संकट को बयां करते हुए कहते हैं, “इस साल हमारे इलाके में औसत से 48 फीसदी कम बारिश हुई है। जमीन सूखी और कड़क हो चुकी है। खेतों में अगली फसल बोने के लिए पर्याप्त नमी ही नहीं बची है और जो पूंजी बची थी, वह पिछली खरीफ फसल को बचाने के चक्कर में सिंचाई के महंगे साधनों में ही उड़ गई। अब हमारे पास न पानी बचा है और न ही अगली बुवाई के लिए पैसा।”
खेती में पानी के इस संकट ने देश में उर्वरकों (फर्टिलाइजर) की मांग और बिक्री को भी प्रभावित किया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर की छमाही के दौरान यूरिया समेत तमाम प्रमुख उर्वरकों की बिक्री में बड़ी गिरावट आई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि किसान सूखे की स्थिति को देखते हुए अब खेती में नया निवेश करने से कतरा रहे हैं।

थोक और खुदरा महंगाई पर आफत: रसोई का बजट बिगड़ने की कगार पर

कृषि उत्पादन में आने वाली गिरावट का दूसरा और सबसे डरावना पहलू है महंगाई का भड़कना। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस साल अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में भारत की खाद्य महंगाई दर 10 फीसदी के स्तर को छू सकती है। सितंबर महीने के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खुदरा खाद्य महंगाई पहले ही बढ़कर 7.74 फीसदी तक पहुंच चुकी थी, जिसने देश की हेडलाइन खुदरा महंगाई को 5.54 फीसदी पर ला खड़ा किया, जो कि आरबीआई के 6 फीसदी के ऊपरी सुरक्षा दायरे के बिल्कुल करीब है। अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत का कहना है कि, “कमजोर मानसून, वैश्विक बाजारों में खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों और डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही गिरावट के चलते खाद्य मुद्रास्फीति को काबू में रख पाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। खाद्य पदार्थों के दाम इसी तरह बढ़ते रहे, तो दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में 50 से 75 बेसिस पॉइंट तक की बढ़ोतरी करने पर मजबूर होना पड़ सकता है।”
खाद्य उत्पादों के साथ-साथ दूध, पोल्ट्री और डेयरी उत्पादों के दाम भी तेजी से ऊपर भाग रहे हैं, क्योंकि पानी की कमी के चलते पशुओं के लिए हरे चारे की गंभीर किल्लत पैदा हो गई है।

आर्थिक तरक्की पर ‘वाटर स्ट्रेस’ का ब्रेक: मूडीज और नीति आयोग की गंभीर चेतावनी

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s Ratings) ने अपनी ताजा व्यापक रिपोर्ट में भारत सरकार को आगाह किया है कि देश में पानी की लगातार बढ़ती कमी और ‘वाटर स्ट्रेस’ (Water Stress) भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा व्यापक-आर्थिक जोखिम (Macroeconomic Risk) बन चुका है। नीति आयोग के ‘कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स’ (CWMI) के अनुसार, वर्तमान में भारत के लगभग 60 करोड़ लोग गंभीर से लेकर अत्यधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं। रिपोर्ट के मुख्य और चौंकाने वाले बिंदु इस प्रकार हैं:
मांग और आपूर्ति में दोगुना अंतर: साल 2030 तक भारत में पानी की कुल मांग उपलब्ध आपूर्ति के मुकाबले दोगुनी हो जाएगी।
जीडीपी को बड़ा झटका: पानी की आपूर्ति सुचारू न होने के कारण उद्योगों और कृषि के ठप होने से साल 2050 तक देश की जीडीपी में 6 फीसदी का सीधा संकुचन आ सकता है।
बैंकिंग क्षेत्र पर संकट: भारतीय बैंकों के लोन पोर्टफोलियो का लगभग 40 फीसदी हिस्सा ऐसे उद्योगों (जैसे बिजली उत्पादन, कपड़ा उद्योग और कृषि) को दिया गया है जो पूरी तरह पानी की उपलब्धता पर निर्भर हैं। पानी के संकट से यदि इन उद्योगों में उत्पादन रुकता है, तो बैंकों का एनपीए (NPA) अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकता है।
भूजल का अत्यधिक दोहन: पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा भूजल (Groundwater) का दोहन भारत में होता है, जो कि वैश्विक निकासी का लगभग 25 फीसदी (~250 बिलियन क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष) है। देश के 15 में से 11 प्रमुख नदी बेसिन पहले से ही पानी की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं।
शहरी केंद्रों में ‘डे ज़ीरो’ का संकट: दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद समेत भारत के 21 बड़े शहरों में आने वाले समय में भूजल के पूरी तरह समाप्त होने यानी ‘डे ज़ीरो’ (Day Zero) की स्थिति की आशंका जताई गई है।

विदेशी मुद्रा की कमाई पर चोट: कृषि निर्यात भी संकट में

जल संकट का दुष्प्रभाव केवल देश की घरेलू अर्थव्यवस्था और रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को भी चोट पहुंचा रहा है। भारत दुनिया के शीर्ष 15 कृषि निर्यातकों में शामिल है। भारत की फल, सब्जियां, चावल और मसाले पूरी दुनिया में भेजे जाते हैं। लेकिन पानी की कमी और जल स्रोतों के प्रदूषित होने के कारण फसलों की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का लगभग 70 फीसदी पानी प्रदूषित है, जिसके कारण वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर आता है। हाल ही में अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे बड़े बाजारों ने भारत से निर्यात की जाने वाली मिर्च, आम और ककड़ी जैसी खेपों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग (जो कम पानी के कारण फसलों में जमा रह जाते हैं) के चलते प्रतिबंधित कर दिया था।

उद्योगों का पहिया भी थमा: केवल खेती नहीं, फैक्ट्रियां भी प्यासी

आमतौर पर माना जाता है कि जल संकट का संबंध सिर्फ खेती से है, लेकिन असलियत यह है कि देश का औद्योगिक पहिया भी बिना पानी के आगे नहीं घूम सकता। कपड़ा उद्योग (Textile), इस्पात (Steel), चमड़ा उद्योग और भारी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को सुचारू संचालन के लिए रोजाना लाखों गैलन पानी की जरूरत होती है। इतना ही नहीं, भारत के डेटा सेंटर (Data Centers) उद्योग, जो देश की डिजिटल क्रांति का आधार हैं, उनके सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिससे जल स्रोतों पर दबाव और अधिक बढ़ गया है। इसके अलावा, इस साल जलाशयों में पानी घटने से बिजली उत्पादन (Hydropower Output) में भी करीब 16 फीसदी की भारी गिरावट आई है, जिसने देश के कई औद्योगिक राज्यों में बिजली संकट को जन्म दिया है।

आगे की राह: संकट से समाधान की ओर कैसे बढ़े कदम?

विशेषज्ञों और जल नीति निर्माताओं का मानना है कि भारत को अब पानी के ‘आपूर्ति-आधारित प्रबंधन’ को छोड़कर ‘मांग-आधारित प्रबंधन’ (Demand-Side Management) की नीति को अपनाना होगा।
सिंचाई तकनीकों में आमूलचूल बदलाव: चूंकि भारत के कुल मीठे पानी का 80 से 87 फीसदी हिस्सा अकेले कृषि क्षेत्र में खप जाता है, इसलिए पारंपरिक बाढ़ जैसी सिंचाई (Flood Irrigation) पद्धति को तुरंत बंद कर ‘ड्रिप इरिगेशन’ (टपक सिंचाई) और ‘स्प्रिंकलर’ (फव्वारा सिंचाई) को युद्ध स्तर पर अनिवार्य बनाना होगा।
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में धान (चावल) और गन्ने जैसी अत्यधिक पानी सोखने वाली फसलों की जगह बाजरा, रागी, दालें और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा, जिसके लिए किसानों को उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए।
पारंपरिक जल संरचनाओं का पुनरुद्धार: सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘जल शक्ति अभियान’, ‘अटल भूजल योजना’ और ‘अमृत सरोवर मिशन’ की गति को दोगुना करना होगा। देश के गांवों में पुराने तालाबों, बावड़ियों और चेक डैमों को साफ कर वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को जन-आंदोलन का रूप देना होगा।
अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण (Water Recycling): बड़े शहरों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले सीवेज और गंदे पानी को आधुनिक तकनीकों से ट्रीट कर उद्योगों तथा बागवानी के लिए दोबारा इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए ताकि ताजे पानी के स्रोतों पर दबाव कम हो सके।

पानी की बूंद-बूंद है अनमोल

भारत की आर्थिक तरक्की और देश की विशाल आबादी की खाद्य सुरक्षा अब सीधे तौर पर इस बात से जुड़ी है कि हम अपनी जल संपदा का प्रबंधन कितनी बुद्धिमत्ता से करते हैं। यदि भारत को अपनी 8 से 9 फीसदी की तेज आर्थिक विकास दर को बनाए रखना है और आम नागरिकों को महंगाई की तपिश से बचाना है, तो देश के नीति निर्माताओं को पानी के इस अदृश्य संकट को सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता पर रखकर कदम उठाने होंगे। पानी की हर एक गिरती बूंद के साथ देश की आर्थिक समृद्धि की रफ्तार भी कम हो रही है, इसे रोकना अब हमारी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी।

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