UGC Equity Rules पर मोदी सरकार का मंथन: सुप्रीम कोर्ट ने बनाई कमेटी, सभी छात्रों को मिलेगी सुरक्षा

The CSR Journal Magazine
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना संबंधी विनियम, 2026’ जारी किए थे। इन नियमों पर विवाद तब से बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए इनके लागू होने पर रोक लगा दी थी। अब अदालत चाहती है कि एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाए, जिसमें किसी भी वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव न हो।

सरकार का नया कदम: नियमों की समीक्षा

5 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने UGC के नए नियमों पर अपनी बात रखी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि सरकार एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य नियमों की दोबारा समीक्षा करना और सभी छात्रों के हितों की रक्षा करना है। हालांकि, कमेटी के गठन का औपचारिक आदेश अभी नहीं आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई थी रोक?

UGC ने 13 जनवरी 2026 को नए नियमों को अधिसूचित किया था। इन नियमों को चुनौती मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इनके लागू होने पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि कुछ प्रावधानों की भाषा स्पष्ट नहीं है और उनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

UGC Equity Rules 2026: नए नियमों की विशेषताएँ

नए नियमों में प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में ‘Equal Opportunity Centre’ बनाना अनिवार्य किया गया था। इसके अलावा, समता समिति का गठन भी आवश्यक था, जिसमें SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल करना जरूरी था। नियमों के तहत इक्विटी कमेटी को शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर बैठक करने और 15 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने का प्रावधान था।

नए नियमों पर रोक, लेकिन पुराने नियम जारी

सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाते समय यह भी कहा था कि अगले आदेश तक UGC के 2012 के Promotion of Equity Regulations लागू रहेंगे। इसका मतलब यह है कि छात्रों के पास भेदभाव के खिलाफ शिकायत करने का कानूनी रास्ता बना रहेगा। यह व्यवस्था इसलिए जरूरी थी ताकि नए नियमों की समीक्षा के दौरान किसी भी छात्र को सुरक्षा से वंचित न होना पड़े।

आगे की राह: क्या मिल पाएगी सभी को समान सुरक्षा?

इस पूरे मामले में दो महत्वपूर्ण जरूरतें सामने आई हैं। पहली, जातिगत और अन्य प्रकार के भेदभाव से पीड़ित छात्रों को प्रभावी कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। दूसरी, शिकायत व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी भी छात्र के साथ अनुचित व्यवहार न हो। 5 नवंबर की सुनवाई में पीठ ने केंद्र को सुझाव दिया कि वह नियमों पर दोबारा विचार करे।

सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई का इंतजार

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि भेदभाव रोकने वाले नियम सभी छात्रों को समान कानूनी सुरक्षा कैसे दे सकते हैं। अदालत ने फिलहाल सुनवाई स्थगित कर दी है और सरकार के अगले कदम का इंतजार करने की बात कही है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार की अगली कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर है।

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