लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल: मंगल ग्रह पर जिंदा ईंटों से आएगी क्रांति, वैज्ञानिक ऐसे बसाएंगे पहली मानव बस्ती

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स्पेस क्रांति: लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल से मंगल ग्रह पर बिना सीमेंट-सरिया के बनेंगे मजबूत घर

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ‘लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल’ (MLBM) यानी जीवित निर्माण सामग्री विकसित की है, जो जेनेटिकली इंजीनियर किए गए यीस्ट (खमीर), जिलेटिन और रेत के मिश्रण से तैयार होती है और मंगल ग्रह के विषम वातावरण में 3D प्रिंटर द्वारा मजबूत शेल्टर बनाने में सक्षम है। अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में इसे एक अभूतपूर्व मोड़ माना जा रहा है। अब तक लाल ग्रह (Mars) पर इंसानी बस्ती बसाने की राह में सबसे बड़ी रुकावट वहां रहने के लिए अनुकूल और मजबूत घर तैयार करना था। पृथ्वी से भारी-भरकम सीमेंट, सरिया या पारंपरिक ईंटें अंतरिक्ष यान के जरिए मंगल तक ले जाना आर्थिक और व्यावहारिक दोनों ही लिहाज से पूरी तरह असंभव है। इस वैश्विक समस्या का समाधान खोजते हुए हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने इस बायोटेक चमत्कार को अंजाम दिया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल केम सर्कुलैरिटी (Chem Circularity) में प्रकाशित किया गया है।

क्या है ‘लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल’ और कैसे काम करती है यह तकनीक?

लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल (MLBM) वास्तव में जैविक रूप से सक्रिय एक ऐसी निर्माण सामग्री है जो पर्यावरण के अनुसार खुद को ढालती है। इस विशेष तकनीक में मुख्य रूप से तीन घटकों का उपयोग किया जाता है:
1. इंजीनियर किया हुआ यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae): वैज्ञानिकों ने जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए यीस्ट (खमीर) की कोशिकाओं में बदलाव किया है। यह यीस्ट अपनी सतह पर एक बेहद चिपचिपा जैविक प्रोटीन (अधातु गोंद) स्रावित करता है। यह ठीक उसी प्रकार का प्रोटीन होता है जो समुद्री जीवों (जैसे मस्कल्स) को लहरों के बीच भी चट्टानों से मजबूती से चिपकाए रखता है।
2. जिलेटिन-आधारित हाइड्रोजेल: यह एक पानी-आधारित मैट्रिक्स है जो यीस्ट और रेत के कणों को एक निश्चित संरचना में बांधने के लिए शुरुआती मचान (स्कैफोल्ड) का काम करता है।
3. स्थानीय रेत या मार्स रेगोलिथ: मंगल ग्रह पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध लाल मिट्टी या दानेदार रेत।
जब इन तीनों को मिलाया जाता है, तो यीस्ट के सूक्ष्म कण एक ‘बायोलॉजिकल सीमेंट’ या जैविक गोंद की तरह काम करते हैं। यह गोंद जिलेटिन और रेत के बारीक कणों को आपस में आणविक स्तर पर जकड़ लेती है।

मंगल का जानलेवा माहौल ही बनेगा इसकी ताकत

भविष्य के अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से भारी ईंटों के बजाय बेहद हल्का यीस्ट और जिलेटिन का पाउडर अपने साथ ले जाएंगे। मंगल पर उतरकर वहां की स्थानीय रेत (रेगोलिथ) में इस पाउडर को थोड़े से पानी के साथ मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट बनाया जाएगा। इसके बाद रोबोटिक 3D प्रिंटर की मदद से कंप्यूटर डिजाइन के अनुसार सीधे दीवारों और कमरों का ढांचा तैयार कर लिया जाएगा।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि मंगल ग्रह का जो वातावरण इंसानों के लिए जानलेवा है, वही इस सामग्री को पत्थर जैसा मजबूत बनाने में मदद करेगा। मंगल पर वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की तुलना में बेहद कम (लगभग 0.01 atm) है और तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे (-30°C से -55°C तक) रहता है। इस अत्यधिक कम दबाव और ठंड के कारण पेस्ट में मौजूद पानी तेजी से जम जाता है और सीधे वाष्प बनकर (Sublimation) बाहर निकल जाता है। जैसे ही पानी बाहर निकलता है, जिलेटिन का क्रॉसलिंकिंग नेटवर्क और यीस्ट के चिपकने वाले प्रोटीन रेत के कणों के बीच एक बेहद सघन और ठोस ढांचा बना देते हैं।

ताकत में बेजोड़ और 100% रिसाइक्लिंग के अनुकूल

प्रयोगशाला में मंगल जैसी कृत्रिम परिस्थितियों को पैदा करके जब इस जीवित सामग्री का परीक्षण किया गया, तो इसके नतीजे चौंकाने वाले थे।
• कम्प्रेसिव स्ट्रेंथ (दबाव क्षमता): इस सामग्री की कम्प्रेसिव स्ट्रेंथ लगभग 12 मेगापास्कल (MPa) और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ 6 MPa दर्ज की गई है। यह सामान्य कंक्रीट और पारंपरिक निर्माण सामग्रियों के बराबर है, जो मंगल के तूफानों और वायुमंडलीय दबाव को झेलने के लिए पर्याप्त है।
• कम ऊर्जा की खपत: पारंपरिक तरीकों से यदि मंगल की मिट्टी को पिघलाकर ईंटें बनाई जाएं (सिंटरिंग प्रक्रिया), तो 1000°C से अधिक तापमान और भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। इसके विपरीत, इस बायो-तकनीक से महज 1 घंटे की सोलर पावर क्षमता का उपयोग करके 1 क्यूबिक मीटर मजबूत निर्माण सामग्री तैयार की जा सकती है।
• पुनर्चक्रण (Recycling) की अद्भुत क्षमता: इस मटेरियल की सबसे बड़ी यूटिलिटी यह है कि इसे बार-बार रीसाइकल किया जा सकता है। यदि कोई ढांचा टूट जाता है या उसे बदलने की जरूरत होती है, तो उसे क्रश करके (कुचलकर) और हल्का गर्म करके फिर से 3D प्रिंटिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कई चक्रों के बाद भी न तो इसकी मजबूती कम होती है और न ही इसके अंदर मौजूद यीस्ट कोशिकाएं मरती हैं।

भविष्य की राह और पृथ्वी पर इसका उपयोग

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक न केवल मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियों का सपना सच करेगी, बल्कि भविष्य में पृथ्वी पर भी उन दुर्गम इलाकों (जैसे अत्यधिक ठंडे रेगिस्तान, पहाड़ों या आपदा प्रभावित क्षेत्रों) में घर बनाने के काम आएगी जहां भारी मशीनरी और पारंपरिक सीमेंट पहुंचाना बेहद कठिन होता है। हालांकि, पूर्ण रूप से मंगल मिशन में इस्तेमाल करने से पहले अभी इस पर और शोध होना बाकी है, जिसमें यह जांचा जाएगा कि यह सामग्री मंगल के खतरनाक ब्रह्मांडीय विकिरण (Cosmic Radiation) को कितनी सटीकता से रोक पाती है। लेकिन निश्चित रूप से, यह आविष्कार अंतरिक्ष वास्तुकला (Space Architecture) के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत है।

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