कानपुर में वन्यजीवों के लिए बना सुपर फास्ट बायोसेंसर डिवाइस

The CSR Journal Magazine
कानपुर के डीबीएस डिग्री कॉलेज के सहायक प्रोफेसर आलोक श्रीवास्तव और उनकी टीम ने एक नई तकनीक विकसित की है जो वन्यजीवों में बीमारी की पहचान को तेज बनाएगी। जंगली जानवरों के अचानक बीमार होने पर डॉक्टरों को सही वजह जानने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। खासकर जब संक्रमण बैक्टीरिया या अन्य माइक्रोब्स से हो। यह नई डिवाइस इन समस्याओं का समाधान करने का दावा करती है। इस बायोसेंसर और इंफ्रारेड तकनीक पर आधारित उपकरण को केंद्र सरकार से पेटेंट भी मिल चुका है।

सही समय पर इलाज, जानवरों की सुरक्षा

नेशनल पार्कों और चिड़ियाघरों में इलाज की प्रक्रिया में समय लगने के कारण जानवरों की तबियत बिगड़ सकती है। इस डिवाइस के माध्यम से, डॉक्टरों को जांच की प्रक्रिया में कमी आने की उम्मीद है। कैनाइन डिस्टेंपर जैसी बीमारियों में भी जल्दी पहचान महत्वपूर्ण होती है। कानपुर जू में बर्ड फ्लू के मामले में भी इस तकनीक की आवश्यकता महसूस की गई थी।

कैसे काम करता है यह डिवाइस?

प्रो. आलोक श्रीवास्तव ने बताया कि इस डिवाइस का आकार छोटा रखा गया है, जिससे डॉक्टर इसे आसानी से ले जा सकें। जैसे ही यह संक्रमित या बीमार जानवर के पास जाता है, इसके सेंसर बीमारी के संकेतों को पहचान लेते हैं। इसमें पैथोजेन्स, यानी रोग फैलाने वाले माइक्रोब्स की जानकारी पहले से अपलोड की गई है। इससे डॉक्टरों को प्राथमिक जानकारी मिलती है, जिससे वे जल्दी निर्णय ले सकते हैं कि आगे किस प्रकार का उपचार चाहिए।

तुरंत टेस्ट, कम समय में रिजल्ट

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा इसकी रफ्तार है। पारंपरिक तरीके में कई बार सैंपल को लैब भेजने की आवश्यकता होती है, जिससे समय लगता है। अब नई डिवाइस के माध्यम से त्वरित जानकारी मिलने की संभावना है। यह गंभीर स्थिति वाले वन्यजीवों के इलाज में भी मदद कर सकती है।

बंदीपुर नेशनल पार्क में सफल परीक्षण

कर्नाटक के बंदीपुर नेशनल पार्क में इस डिवाइस का परीक्षण किया गया है। प्रो. आलोक के अनुसार, यहाँ विभिन्न वन्यजीवों पर लंबे समय तक अध्ययन किया गया। इसने कम समय में परिणाम प्रदान किए, जिससे उम्मीद जगी कि यह तकनीक बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए प्रभावी हो सकती है।

आम लोगों के लिए होगी किफायती

इस डिवाइस को भी आम जन के लिए सुलभ बनाने की योजना है। इसका प्रॉडक्शन कॉम्पैक्ट और हैंडी है, ताकि इसे विभिन्न स्थलों पर ले जाया जा सके। हालांकि, अभी इसकी कीमत निर्धारित नहीं हुई है। प्रो. आलोक का मानना है कि इसे इस तरह से बनाया जाएगा कि यह आम जनता और संस्थानों की पहुँच में रहे।

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