अमेरिकी डॉलर का नया बोझ: क्या मिडिल क्लास भारतीय छात्रों के लिए बंद हो जाएंगे सिलिकॉन वैली के रास्ते?

The CSR Journal Magazine

US Student Visa Shock: शिक्षा के बाद नौकरी के लिए 70,000 डॉलर का नया चार्ज, अंतरराष्ट्रीय छात्रों की मुश्किलें बढ़ी

डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने एक बड़ा झटका दिया है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक नया नीतिगत प्रस्ताव जारी किया है, जिसके तहत विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करने से जुड़े ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम पर 70,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 68 लाख रुपये) का भारी-भरकम शुरुआती शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इतना ही नहीं, इस वर्क परमिट के नवीनीकरण (रिन्यूअल) के लिए भी 30,000 डॉलर (लगभग 29 लाख रुपये) की अतिरिक्त फीस प्रस्तावित की गई है। इस कड़े फैसले से अमेरिका में मौजूद 3.5 लाख से अधिक भारतीय छात्रों के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।

क्या है ट्रम्प सरकार का नया प्रस्ताव?

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) द्वारा 7 अक्टूबर 2026 को जारी किए गए आधिकारिक नोटिस के अनुसार F-1 वीजा वाले गैर-आप्रवासी छात्रों के लिए नियम बेहद कड़े किए जा रहे हैं।
• शुरुआती आवेदन शुल्क: किसी भी विदेशी छात्र को पढ़ाई के बाद मिलने वाली पहली ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग (OPT) की सिफारिश के लिए संस्थान को 70,000 डॉलर चुकाने होंगे।
• नवीनीकरण शुल्क: यदि कोई छात्र अपनी कार्य अवधि को आगे बढ़ाना चाहता है या स्टेम (STEM) एक्सटेंशन लेता है, तो उसे दोबारा 30,000 डॉलर की फीस देनी होगी।
• कुल वित्तीय बोझ: इस प्रकार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) पृष्ठभूमि वाले छात्रों को ३६ महीने (३ साल) की कुल कार्य अवधि के लिए करीब 97 लाख रुपये ($1,00,000) तक का भुगतान करना पड़ सकता है। वर्तमान में इसके लिए छात्रों को मात्र 48,000 रुपये ($500-600) के आसपास का मामूली शुल्क देना होता है।

तकनीकी पेच: भुगतान सीधे छात्र नहीं, संस्थान करेंगे

इस नीति में सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी बिंदु यह है कि यह भारी-भरकम शुल्क सीधे छात्रों के बैंक खाते से नहीं लिया जाएगा। DHS के प्रस्ताव के अनुसार, यह चार्ज ‘स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विजिटर प्रोग्राम’ (SEVP) से प्रमाणित शिक्षण संस्थानों (यूनिवर्सिटी और कॉलेजों) पर लगाया जाएगा। हालांकि, विभाग ने अपने ड्राफ्ट में यह साफ कर दिया है कि विश्वविद्यालय इस वित्तीय दायित्व का बोझ पूरी तरह से F-1 छात्रों, सभी नामांकित विद्यार्थियों, या उन्हें नौकरी देने वाले नियोक्ताओं (Employers) पर डाल सकते हैं। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो कोई भी अमेरिकी विश्वविद्यालय या कंपनी अपने मुनाफे से इतनी बड़ी रकम नहीं भरेगी, जिसका सीधा मतलब है कि अंततः यह मार छात्रों की जेब पर ही पड़ेगी।

ट्रम्प प्रशासन का तर्क: ‘धोखाधड़ी रोकना और अमेरिकी कामगारों की सुरक्षा’

वाशिंगटन में ट्रम्प प्रशासन ने इस बेहद आक्रामक कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, इमिग्रेशन सिस्टम की अखंडता और घरेलू रोजगार का हवाला दिया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग के प्रवक्ताओं का कहना है कि:
• सस्ते श्रम पर लगाम: OPT कार्यक्रम को विदेशी नागरिकों के लिए ‘सस्ते श्रम की आपूर्ति का पिछला रास्ता’ (Backdoor Entry) बना दिया गया था, जिससे अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसर प्रभावित हो रहे थे।
• फर्जीवाड़े पर रोक: पिछले कुछ वर्षों में OPT कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और नियमों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। कई शेल कंपनियों और फर्जी नियोक्ताओं द्वारा पैसे लेकर कार्य अनुभव के फर्जी दस्तावेज बनाने के रैकेट पकड़े गए हैं।
• कठोर चयन प्रक्रिया: इतनी भारी फीस के बाद केवल वही छात्र अमेरिका में रुक पाएंगे जो वास्तव में असाधारण प्रतिभाशाली हैं और जिनके नियोक्ता उनके लिए भारी खर्च उठाने को तैयार हैं।

भारतीय छात्रों पर सबसे बड़ा प्रहार क्यों?

इस नीति का सबसे गंभीर असर भारतीय युवाओं पर होना तय है। आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में अमेरिका में ३.५ लाख से ज्यादा भारतीय छात्र उच्च शिक्षा ले रहे हैं, जिनमें से एक बड़ी संख्या STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथ) कोर्सेज में नामांकित है।
आमतौर पर भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे शिक्षा ऋण (Education Loan) लेकर अमेरिका जाते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT अवधि के दौरान अमेरिकी डॉलर में कमाकर अपना कर्ज चुकाना और कार्य अनुभव हासिल करना होता है। यदि पढ़ाई पूरी होते ही ६८ लाख रुपये का नया वित्तीय बोझ सामने आ खड़ा होगा, तो अधिकांश छात्रों के लिए वहां रुकना और लोन चुकाना पूरी तरह से असंभव हो जाएगा।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों और कॉर्पोरेट जगत में खलबली

ट्रम्प सरकार के इस फैसले का अमेरिका के भीतर भी कड़ा विरोध शुरू हो गया है। अंतरराष्ट्रीय शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठन NAFSA (National Association of Foreign Student Advisers) की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) फैंटा ऑ (Fanta Aw) ने इस प्रस्ताव की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों की प्रतिभा, दृष्टिकोण और आकांक्षाओं को अमेरिका से दूर खदेड़ने से देश के नवाचार, आर्थिक विकास और वैश्विक नेतृत्व को ही नुकसान पहुंचेगा। अमेरिकी विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों से मिलने वाली भारी ट्यूशन फीस पर निर्भर हैं। यदि विदेशी छात्रों का आना कम होता है, तो इन संस्थानों को भारी वित्तीय घाटा होगा। इसके अतिरिक्त, सिलिकॉन वैली की दिग्गज टेक कंपनियां जो तकनीकी भूमिकाओं के लिए बड़े पैमाने पर इन अंतरराष्ट्रीय स्नातकों को नियुक्त करती हैं, उन्हें भी कुशल श्रम की भारी किल्लत का सामना करना पड़ेगा।

आगे क्या होगा? कानूनी चुनौतियों की उम्मीद

इमिग्रेशन विशेषज्ञों और पूर्व सरकारी सलाहकारों का मानना है कि यह प्रस्ताव अभी कानून नहीं बना है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, इस नियम को अंतिम रूप देने से पहले 60 दिनों के लिए सार्वजनिक प्रतिक्रिया (Public Comment Period) के लिए खुला रखा गया है। इस अवधि के बाद, इसके खिलाफ अमेरिकी अदालतों में बड़े पैमाने पर कानूनी चुनौतियां (Lawsuits) दी जाने की पूरी संभावना है। इससे पहले भी ट्रम्प प्रशासन ने H-1B वीजा पर 1,00,000  डॉलर का शुल्क लगाने का प्रयास किया था, जिसे अमेरिकी अदालतों ने खारिज कर दिया था। विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि विश्वविद्यालय और व्यापारिक संगठन इस जनविरोधी और शिक्षा-विरोधी नीति को भी अदालत के जरिए रुकवाने में कामयाब हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, इस नए नीतिगत झटके ने अमेरिकी शिक्षा के बाजार को हिलाकर रख दिया है और भारतीय छात्रों को अब अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में अन्य देशों (जैसे कनाडा या यूरोप) के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

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