दुनिया के इतिहास में यह तथ्य आज भी वैज्ञानिकों और आम लोगों को चौंकाता है कि 12 जनवरी 1967 से एक इंसान का शरीर बर्फ से भी ठंडे तापमान पर सुरक्षित रखा गया है। यह शरीर है Dr. James Bedford का! कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और दुनिया के पहले व्यक्ति, जिन्हें क्रायोनिक प्रिज़र्वेशन (Cryonic Preservation) के तहत संरक्षित किया गया।
जीवन और मृत्यु के बीच जमी एक उम्मीद: इंसान को अमर बनाने की पहली वैज्ञानिक कोशिश
यह बात आज भी विज्ञान की दुनिया में उतनी ही चौंकाने वाली मानी जाती है, जितनी 59 साल पहले थी। 12 जनवरी 1967 को एक इंसान का शरीर मृत्यु के बाद तरल नाइट्रोजन में जमा दिया गया, इस उम्मीद के साथ कि भविष्य का विज्ञान उसे दोबारा जीवन दे सकेगा। यह व्यक्ति थे Dr. James Bedford ! कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और दुनिया के पहले इंसान, जिन्हें क्रायोनिक प्रिज़र्वेशन के तहत संरक्षित किया गया।आज, लगभग छह दशक बाद भी, उनका शरीर अमेरिका के एरिज़ोना राज्य में स्थित Alcor Life Extension Foundation में -196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा गया है। यह केवल एक शव नहीं, बल्कि मानव इतिहास का सबसे साहसी वैज्ञानिक प्रयोग माना जाता है।
मृत्यु से पहले लिया गया ऐतिहासिक फैसला
डॉ. जेम्स बेडफोर्ड गंभीर किडनी कैंसर से पीड़ित थे। जब उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि उस समय की चिकित्सा विज्ञान उनकी जान नहीं बचा पाएगी, तो उन्होंने मृत्यु को अंतिम सत्य मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने स्वेच्छा से यह फैसला लिया कि उनकी मृत्यु के तुरंत बाद उनके शरीर को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाए, ताकि भविष्य में जब चिकित्सा विज्ञान उन्नत हो जाए, तब उन्हें फिर से जीवित किया जा सके। यह फैसला किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि भविष्य के विज्ञान में गहरे विश्वास के कारण लिया गया था। बेडफोर्ड का मानना था कि जिस तरह मानव ने असंभव माने जाने वाले कई काम कर दिखाए हैं, उसी तरह मृत्यु भी एक दिन पराजित होगी।
क्या है क्रायोनिक्स? विज्ञान की परिभाषा
क्रायोनिक्स (Cryonics) वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से मृत घोषित किए जाने के तुरंत बाद उसके शरीर या केवल मस्तिष्क को बेहद कम तापमान पर ठंडा कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य होता है-
• शरीर के भीतर चल रही रासायनिक और जैविक क्रियाओं को पूरी तरह रोक देना,
• कोशिकाओं के सड़ने (Decomposition) की प्रक्रिया को थामना,
• मस्तिष्क की संरचना और स्मृति से जुड़े न्यूरॉन्स को सुरक्षित रखना!
क्रायोनिक्स में शरीर को धीरे-धीरे ठंडा कर तरल नाइट्रोजन में रखा जाता है, जहां समय मानो थम जाता है।
मस्तिष्क क्यों है सबसे अहम?
क्रायोनिक्स के समर्थकों का मानना है कि इंसान की पहचान, यादें और व्यक्तित्व मस्तिष्क की संरचना में सुरक्षित होते हैं। अगर मस्तिष्क को नुकसान से बचाया जा सके, तो सैद्धांतिक रूप से इंसान को दोबारा जीवित करना संभव हो सकता है। वैज्ञानिक प्रयोगों में यह प्रमाणित हो चुका है कि-
• कुछ मानव कोशिकाएं और भ्रूण जमाने के बाद फिर से सक्रिय हो सकते हैं!
• अंग प्रत्यारोपण में आज भी अंगों को लंबे समय तक ठंडा रखकर सुरक्षित किया जाता है!
हालांकि, पूरे मानव शरीर को दोबारा जीवित करना अभी तक वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं हो पाया है।
भविष्य की तकनीक पर टिकी उम्मीद
डॉ. बेडफोर्ड और क्रायोनिक्स समर्थकों की उम्मीद भविष्य की नैनोटेक्नोलॉजी पर टिकी है। उनका मानना है कि आने वाले समय में-
• नैनो-रोबोट्स शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत कर सकेंगे!
• कैंसर जैसी बीमारियों को जड़ से खत्म किया जा सकेगा!
• उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को रोका या पलटा जा सकेगा! आज ये सभी बातें वैज्ञानिक संभावना हैं, लेकिन फिलहाल व्यावहारिक वास्तविकता नहीं।
आज की स्थिति: प्रयोग या भ्रम?
वर्तमान समय में दुनिया में सैकड़ों लोग क्रायोनिक्स के लिए अनुबंध कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई भी क्रायोनिक रूप से संरक्षित इंसान दोबारा जीवित नहीं किया गया है। मुख्यधारा का मेडिकल साइंस इसे अब भी अनिश्चित और अप्रमाणित तकनीक मानता है। इसके बावजूद, क्रायोनिक्स को भविष्य की चिकित्सा क्रांति की नींव भी माना जाता है।
विज्ञान, विश्वास और मानव सपना
डॉ. जेम्स बेडफोर्ड का जमे रहना केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि यह मानव की उस जिद का प्रतीक है, जो मृत्यु को भी चुनौती देती है। यह प्रयोग आज भी सवाल पूछता है- “क्या मृत्यु वास्तव में अंत है, या केवल एक तकनीकी समस्या?” इस सवाल का जवाब आज भी तरल नाइट्रोजन की ठंडी खामोशी में सुरक्षित रखा हुआ है।
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