बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हुए राम आसरे कुशवाहा, क्या बदलेगा कानपुर बेल्ट का खेल?

The CSR Journal Magazine

नेताओं का पार्टी में आना-जाना जारी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की नजदीकियों के बीच एक बार फिर से नेताओं के एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने का दौरा शुरू हो गया है। हाल ही में पूर्व मंत्री राम आसरे कुशवाहा ने बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। यह ध्यान देने वाली बात है कि राम आसरे पहले भी सपा का हिस्सा रह चुके हैं। वर्ष 2013 में वे सपा को छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे। अब चुनावी साल 2027 के पहले उन्होंने एक बार फिर से सपा में वापसी की है।

सपा में राम आसरे की वापसी का महत्व

सपा में शामिल होने के बाद राम आसरे कुशवाहा ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है मानो नेताजी, यानी मुलायम सिंह यादव, उनके बीच मौजूद हैं। उन्होंने अखिलेश यादव को दिए सम्मान का भी जिक्र किया। राम आसरे के पास यूपी सरकार में 6 बार मंत्री रहने का अनुभव है। कानपुर बेल्ट से आने वाले इस ओबीसी नेता की वापसी सपा के लिए एक बड़ा खेल साबित हो सकती है। क्या वे कानपुर बेल्ट में बीजेपी के लिए चुनौती पेश कर पाएंगे? यह सवाल सपा और बीजेपी दोनों के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

कुशवाहा का राजनीतिक सफर

राम आसरे कुशवाहा, जो ओबीसी समुदाय के एक दिग्गज नेता माने जाते हैं, ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बसपा से की थी। अस्सी के दशक में उन्होंने इस पार्टी में कदम रखा और 1996 में कानपुर से विधायक बने। उनके सियासी सफर में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। कुशवाहा की वापसी से सपा को ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने में मदद मिल सकती है, खासकर जब बात कानपुर और बुंदेलखंड क्षेत्रों की आती है।

कानपुर में कुशवाहा का प्रभाव

कानपुर बेल्ट में कुशवाहा समाज की आबादी लगभग 15 प्रतिशत है। ऐसे में साधारण से लेकर ओबीसी तक के नेताओं का प्रभाव डाले बिना कोई भी पार्टी सफल नहीं हो सकती। बीजेपी ने 2017 और 2022 के चुनावों में इस क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन किया था। अब यह देखना होगा कि क्या कुशवाहा अपनी सपा के साथ मिलकर इस समीकरण को बदल पाएंगे।

भाजपा के लिए बड़ा झटका

राम आसरे की सपा में वापसी बीजेपी के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है। उन्हें ओबीसी में सम्मान और प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए देखा जा सकता है। कुशवाहा के अनुसार, ‘जहां सम्मान होगा, वहीं कुछ मिलेगा।’ इस बयान से सपा ने अपने लिए एक नया नैरेटिव तैयार किया है, जिससे वह बीजेपी के ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करेगी।

कानपुर बेल्ट में चुनावी रणनीति

कानपुर नगर और इससे जुड़े पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में कुल 29 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां बीजेपी ने पिछले चुनावों में अच्छी स्थिति बनाई थी। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में समीकरण बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। राम आसरे कुशवाहा का पार्टी परिवर्तन बीजेपी के लिए चुनौती पेश कर सकता है। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कुशवाहा के आने से सपा को एक मजबूत गैर-यादव ओबीसी चेहरा मिल गया है, जो कानपुर बेल्ट में बीजेपी के लिए घेराबंदी कर सकता है।

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