यूपी वोटर लिस्ट में 16 लाख नए नाम जोड़ने पर बवाल, चुनाव आयोग की सफाई से सुलझेगा विवाद

The CSR Journal Magazine

यूपी में चुनाव से पहले 16.18 लाख वोटर्स के नाम जोड़ने का बवाल: जानें 4 प्रमुख सवाल

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची (Voter List) के विशेष पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर एक बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स  की खोजी रिपोर्ट के बाद राज्य की राजनीति में 16.18 लाख ‘रहस्यमयी’ वोटर्स के नाम जोड़े जाने को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। आरोप लगाया जा रहा है कि चुनाव आयोग ने इन मतदाताओं की पहचान, नाम और पते की जानकारी वेबसाइट पर साझा न करके पारदर्शिता के नियमों का उल्लंघन किया है। इस गंभीर मुद्दे पर बढ़ते विवाद को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) नवदीप रिणवा ने एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और इसे भ्रामक बताया है।

क्या यूपी की वोटर लिस्ट में 16.18 लाख वोटर्स ‘रहस्यमयी’ तरीके से जोड़े गए हैं?

विपक्षी दलों और खोजी रिपोर्टों में यह चिंता जताई गई थी कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने अंतिम वोटर लिस्ट में चुपके से 16.18 लाख नए मतदाताओं को शामिल कर लिया है। सबसे गंभीर आरोप यह था कि इन नए जुड़े वोटर्स के व्यक्तिगत आवेदन पत्र (Form-6) राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की आधिकारिक वेबसाइट पर निरीक्षण के लिए उपलब्ध नहीं थे। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act), 1950 के नियमों के तहत किसी भी नए मतदाता का नाम शामिल करने से पहले उसके आवेदन को सार्वजनिक करना अनिवार्य होता है ताकि आम जनता या राजनीतिक दल उस पर कोई आपत्ति दर्ज करा सकें। इस सार्वजनिक डेटा के गायब होने की वजह से इन वोटर्स को ‘गुप्त’ या ‘संदिग्ध’ करार दिया जा रहा था।

चुनाव आयोग की सफाई

यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग का कहना है कि ये 16.18 लाख कोई रहस्यमयी नाम नहीं हैं, बल्कि यह उन पात्र नागरिकों द्वारा भरे गए फॉर्म-6 (Form-6) की कुल संख्या है, जिन्हें 27 अक्टूबर 2025 से 6 जनवरी 2026 के बीच बीएलओ (Booth Level Officers) द्वारा किए गए घर-घर सर्वे के दौरान एकत्र किया गया था। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब यह विशेष पुनरीक्षण अभियान शुरू हुआ था, तब इन नागरिकों के नाम पुरानी मतदाता सूची में शामिल नहीं थे, जिसके कारण इनके नाम पहले से छपे हुए एन्यूमरेशन (गणना) फॉर्म में नहीं आ सके थे। इसलिए नियमानुसार इनसे नए फॉर्म-6 भरवाए गए थे, और इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया गया है।

डेटा गैप का गणित क्या है और वेबसाइट से आवेदन क्यों गायब थे?

आंकड़ों की बाजीगरी को लेकर यह सवाल उठा कि निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध फॉर्म-6 के सार्वजनिक डेटा और चुनाव आयोग द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस व विज्ञप्तियों में घोषित किए गए आंकड़ों में भारी अंतर दिख रहा था। आरोप लगाया गया कि तकरीबन 18.5% नए वोटर्स का ब्योरा जनता की नजरों से ओझल रखा गया।

प्रशासनिक पक्ष

मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने स्पष्ट किया कि आंकड़ों में कोई विसंगति या गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह केवल डेटा की व्याख्या करने के गलत तरीके (Interpretation Issue) के कारण उपजा भ्रम है। आयोग के अनुसार, ये सभी फॉर्म ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के आधिकारिक प्रकाशन से पहले (Pre-draft चरण में) ही बीएलओ के माध्यम से जमीनी स्तर पर सत्यापित किए जा चुके थे। आयोग ने जोर देकर कहा कि दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान सभी आवश्यक सूचियां तय प्रक्रियाओं के तहत उपलब्ध कराई गई थीं, और चुनावी डेटा पूरी तरह से पारदर्शी व सुरक्षित ऑडिट ट्रेल के दायरे में है।

क्या वोटर्स को जोड़ने की ‘स्वीकृति दर’ (Approval Rate) असामान्य रूप से अधिक थी?

खोजी रिपोर्टों में एक तुलनात्मक सवाल यह भी उठाया गया था कि यदि इन 16.18 लाख आवेदनों को शामिल कर लिया जाए, तो उत्तर प्रदेश में मतदाता आवेदनों की स्वीकृति दर (Approval Rate) लगभग 96.27% तक पहुँच जाती है। सामान्य तौर पर अन्य राज्यों में यह समावेशन दर 60% से 70% के बीच होती है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में इसी अवधि के दौरान हुए पुनरीक्षण में यह दर मात्र 18.5% के आसपास दर्ज की गई थी। ऐसे में यूपी में इतनी ऊंची स्वीकृति दर पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहे थे कि क्या बिना उचित जांच-पड़ताल के थोक के भाव में नाम स्वीकृत किए गए?

चुनाव आयोग का पक्ष

आयोग ने प्रतिशत आधारित इस तर्क को पूरी तरह से काल्पनिक और तार्किक आधार से परे बताया है। बयान में साफ किया गया कि चुनाव आयोग किसी निश्चित या तय प्रतिशत के फॉर्मूले (Fixed Formula) के आधार पर आवेदनों को स्वीकृत या अस्वीकृत नहीं करता है। प्रत्येक फॉर्म-6 को एक स्वतंत्र और विधिक प्रक्रिया के तहत परखा जाता है। यदि आवेदक पात्रता के सभी मापदंडों को पूरा करता है और बीएलओ द्वारा उसके निवास स्थान का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) सफल पाया जाता है, तो उसे नियमानुसार सूची में जगह दी जाती है। इसलिए इसकी तुलना किसी अन्य राज्य के आंकड़ों से करके विसंगति का दावा करना पूरी तरह से गलत है।

इस पूरे विवाद पर राजनीतिक दलों का क्या रुख है?

उत्तर प्रदेश में यह पूरा मामला सामने आते ही मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) और अन्य विपक्षी गुटों ने सरकार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठानी शुरू कर दी हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है कि आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने के उद्देश्य से मतदाता सूचियों में हेरफेर किया जा रहा है। दूसरी ओर, इस विशेष पुनरीक्षण अभियान (SIR) के शुरुआती दौर में जब ड्राफ्ट लिस्ट से बड़ी संख्या में (लगभग 2.89 करोड़) नाम काटे गए थे, तब सत्ताधारी दल भाजपा के भीतर भी बूथ स्तर पर चिंताएं देखी गई थीं।

संसदीय लोकतंत्र और सर्वदलीय भागीदारी

निर्वाचन आयोग ने अपने आधिकारिक बचाव में इस बात को मजबूती से रेखांकित किया है कि उत्तर प्रदेश में हुआ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पूरी तरह से सहभागी (Participatory) प्रक्रिया थी। इस पूरे अभियान के दौरान सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंटों (BLAs) की सक्रिय भागीदारी रही है। आयोग के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा कुल 92 शिकायतें दर्ज कराई गई थीं (जिसमें समाजवादी पार्टी की 78 और भाजपा की 8 शिकायतें शामिल थीं), और आयोग ने समय रहते इन सभी 92 शिकायतों का पारदर्शी तरीके से निस्तारण कर दिया था। इसके अतिरिक्त, अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने आधिकारिक तौर पर लिखित रूप में 16.18 लाख मतदाताओं से जुड़े इस कथित ‘रहस्यमयी’ दावे को लेकर चुनाव आयोग के समक्ष कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई है।

यूपी SIR मुद्दा संवेदनशील मोड़ पर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता को लेकर उपजा यह विवाद बेहद संवेदनशील मोड़ पर है। जहाँ एक तरफ स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता और विपक्षी दल डेटा के सार्वजनिक खुलासे में विसंगतियों को लेकर तकनीकी सवाल उठा रहे हैं, वहीं देश की सर्वोच्च चुनावी संस्था (ECI) की राज्य इकाई ने कड़े विधिक और प्रशासनिक तर्कों के साथ सभी शंकाओं को निर्मूल करार दिया है। लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की शुचिता सर्वोपरि है, और चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह जनता के बीच अपने भरोसे को अक्षुण्ण बनाए रखे।

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