राजस्थान के जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का संकट गहराया, MBBS डॉक्टरों के भरोसे चल रही स्वास्थ्य व्यवस्था बढ़े रेफरल और मौतों पर उठे सवाल

The CSR Journal Magazine
राजस्थान के जिला और उप जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गई है। हाल के दिनों में कोटा, बीकानेर, नागौर, डीडवाना और जोधपुर में प्रसूताओं की मौत और गंभीर स्वास्थ्य मामलों के बाद सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। पड़ताल में सामने आया है कि राज्य के अधिकांश छोटे अस्पताल एमबीबीएस मेडिकल ऑफिसरों के भरोसे संचालित हो रहे हैं, जबकि देश के कई राज्यों में एमडी-एमएस विशेषज्ञ डॉक्टरों की सीधी नियुक्ति जिला और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर तक की जाती है।

10 राज्यों में सीधी भर्ती, राजस्थान में अब भी पुरानी व्यवस्था

उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल और आंध्रप्रदेश सहित 10 से अधिक राज्यों में स्त्री रोग, शिशु रोग, सर्जरी और हड्डी रोग विशेषज्ञों की सीधी भर्ती सीएचसी, उप जिला अस्पताल और जिला अस्पताल स्तर पर की जाती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही उपचार मिल जाता है और मेडिकल कॉलेजों पर दबाव कम होता है। विशेषज्ञों का दावा है कि इन राज्यों में रेफरल की संख्या में 50 प्रतिशत से अधिक कमी आई है, जबकि राजस्थान में सामान्य प्रसव और मामूली ऑपरेशन के मामलों में भी मरीजों को बड़े अस्पतालों में भेजना पड़ता है।

विशेषज्ञों की कमी से बढ़ रहा मरीजों का जोखिम

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए गर्भवती महिलाओं को अधिकतम 30 मिनट के भीतर विशेषज्ञ चिकित्सक की सुविधा मिलनी चाहिए, लेकिन राजस्थान में कई मामलों में मरीजों को तीन घंटे या उससे अधिक समय तक इंतजार करना पड़ता है। विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक व्यास का कहना है कि यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर गायनी, पीडियाट्रिक, एनेस्थीसिया और सर्जरी के चार प्रमुख विशेषज्ञ उपलब्ध कराए जाएं तो आधे से अधिक रेफरल वहीं रुक सकते हैं। इससे गंभीर मरीजों को समय पर उपचार मिल सकेगा और मौतों की घटनाओं में कमी आएगी।

नागौर में प्रसूता की मौत के बाद विरोध, कार्रवाई की मांग

नागौर में प्रसूता रूकमा की मौत के बाद परिजनों का आक्रोश लगातार बना हुआ है। दूसरे दिन भी जिला अस्पताल की मोर्चरी के बाहर धरना जारी रहा और परिजन चिकित्सकों तथा नर्सिंग स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई, आर्थिक सहायता और नवजात के पालन-पोषण की व्यवस्था की मांग पर अड़े रहे। पोस्टमार्टम नहीं हो सका और शाम को बड़ी संख्या में लोगों ने कलक्ट्रेट तक कैंडल मार्च निकालकर न्याय की मांग की। इससे पहले कोटा, बीकानेर और जोधपुर के मामलों ने भी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

स्वास्थ्य मंत्री बोले- नीतिगत बदलाव की समीक्षा करेंगे

चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने हालिया घटनाओं को अलग-अलग कारणों से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि कोटा मामले में ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता और अत्यधिक गर्मी को संभावित कारण माना गया है तथा संबंधित फैक्ट्री बंद कर दी गई है। वहीं बीकानेर और जोधपुर के मामलों में गंभीर और रेफर मरीजों की स्थिति जिम्मेदार रही। विशेषज्ञ डॉक्टरों की सीधी भर्ती के सवाल पर मंत्री ने माना कि यह नीतिगत बदलाव का विषय हो सकता है और सरकार इसकी समीक्षा करेगी। फिलहाल एम्स की सलाह के आधार पर उपचार प्रोटोकॉल और एसओपी को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि जब कई राज्यों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता से स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हुई हैं, तो राजस्थान में जिला अस्पताल अब भी केवल एमबीबीएस डॉक्टरों के भरोसे क्यों चल रहे हैं।

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