UPI पर MDR को लेकर सियासी घमासान: निर्मला सीतारमण ने कहा-अफवाह न फैलाएं

The CSR Journal Magazine

UPI पर MDR को लेकर बढ़ी बहस; वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया- प्रस्तावित बदलाव व्यापारियों से जुड़े हैं, आम ग्राहकों पर नहीं पड़ेगा सीधा असर

कराधान एवं अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक, 2026 (Taxation and Other Laws (Amendment) Bill, 2026) में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) से जुड़े प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा सरकार पर डिजिटल भुगतान प्रणाली को प्रभावित करने और व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डालने का आरोप लगाने के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को तीखा जवाब दिया। वित्त मंत्री ने कहा कि UPI लेनदेन पर प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर भ्रम और अफवाह फैलाना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate-MDR) केवल व्यापारियों (Merchants) पर लागू होती है, आम उपभोक्ताओं या ग्राहकों पर नहीं। इसलिए यह कहना कि ग्राहकों से यूपीआई भुगतान पर शुल्क लिया जाएगा, सही नहीं है।

क्या है पूरा विवाद?

कराधान एवं अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक, 2026 के कुछ प्रावधानों को लेकर विपक्ष ने आशंका जताई कि सरकार यूपीआई भुगतान प्रणाली में ऐसा बदलाव करने जा रही है जिससे डिजिटल लेनदेन महंगा हो सकता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि प्रस्तावित बदलावों का असर डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर पड़ सकता है। इसके बाद यह विषय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। इसी विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोशल मीडिया के माध्यम से और सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखते हुए विपक्ष के आरोपों को भ्रामक बताया।

“MDR ग्राहक नहीं, व्यापारी देते हैं”

निर्मला सीतारमण ने कहा कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) की अवधारणा को लेकर गलत जानकारी फैल रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि—
  • MDR अंतिम उपभोक्ता से नहीं लिया जाता।
  • यह शुल्क व्यापारी और भुगतान सेवा प्रदाता के बीच का विषय होता है।
  • आम ग्राहक जब यूपीआई के माध्यम से भुगतान करता है, तो उससे MDR नहीं वसूला जाता।
उन्होंने कहा कि इस तथ्य को नजरअंदाज कर लोगों में भ्रम फैलाना उचित नहीं है।

वित्त मंत्री का विपक्ष को जवाब

निर्मला सीतारमण ने वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से पहले पूरे विषय को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि- “अफवाह फैलाने से पहले कृपया इस बात पर विचार करें कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट केवल व्यापारियों पर लागू होता है, अंतिम उपयोगकर्ताओं या ग्राहकों पर नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए मजबूत वित्तीय ढांचा आवश्यक है।

बैंकों और फिनटेक कंपनियों को होगा लाभ

वित्त मंत्री के अनुसार प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल भुगतान प्रणाली से जुड़े संस्थानों को वित्तीय रूप से अधिक सक्षम बनाना है। उन्होंने कहा कि यदि बैंकों और फिनटेक कंपनियों को पर्याप्त संसाधन मिलेंगे तो वे—
  • भुगतान नेटवर्क को अधिक मजबूत बना सकेंगे।
  • साइबर सुरक्षा पर अधिक निवेश कर सकेंगे।
  • नई तकनीकों का विकास कर सकेंगे।
  • सर्वर क्षमता और लेनदेन की गति बढ़ा सकेंगे।
  • डिजिटल भुगतान प्रणाली को अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बना सकेंगे।

अंततः ग्राहकों को मिलेगा फायदा

सीतारमण ने कहा कि जब बैंक और फिनटेक कंपनियां अपने डिजिटल ढांचे में निवेश करेंगी, तो इसका लाभ अंततः यूपीआई का उपयोग करने वाले करोड़ों ग्राहकों को मिलेगा। उन्होंने कहा कि—
  • भुगतान और तेज होंगे।
  • तकनीकी खराबियां कम होंगी।
  • साइबर धोखाधड़ी से सुरक्षा बेहतर होगी।
  • डिजिटल भुगतान का अनुभव और सुगम बनेगा।

क्या होता है MDR?

मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate) वह शुल्क होता है जो व्यापारी डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर भुगतान सेवा प्रदाता या बैंक को देता है। यह शुल्क सामान्यत बैंक, पेमेंट गेटवे, कार्ड नेटवर्क, या अन्य भुगतान सेवा प्रदाताओं के बीच तय व्यवस्था का हिस्सा होता है। यह अंतिम ग्राहक द्वारा भुगतान की जाने वाली राशि से अलग होता है।

UPI की सफलता और वर्तमान व्यवस्था

भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) दुनिया की सबसे बड़ी रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान प्रणालियों में से एक बन चुका है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन UPI के माध्यम से किए जाते हैं। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारी, टैक्सी चालक, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, अस्पताल, स्कूल और सरकारी सेवाएं तक इस प्रणाली का व्यापक उपयोग कर रहे हैं। UPI की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि अधिकांश सामान्य लेनदेन उपभोक्ताओं के लिए बिना किसी प्रत्यक्ष शुल्क के उपलब्ध रहे हैं।

डिजिटल भुगतान उद्योग की मांग

पिछले कुछ वर्षों से बैंकिंग और फिनटेक उद्योग के कई प्रतिनिधि यह कहते रहे हैं कि तेजी से बढ़ते डिजिटल भुगतान नेटवर्क के रखरखाव, सर्वर क्षमता, साइबर सुरक्षा और तकनीकी उन्नयन पर लगातार बड़ा खर्च आता है। उद्योग का तर्क है कि यदि इस बुनियादी ढांचे के लिए स्थायी राजस्व व्यवस्था उपलब्ध हो, तो डिजिटल भुगतान प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। हालांकि इस विषय पर अंतिम नीति और उसका स्वरूप सरकार द्वारा अधिसूचित नियमों तथा संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

विपक्ष की आशंकाएं

विपक्षी दलों का कहना है कि डिजिटल भुगतान प्रणाली आम लोगों के लिए आसान और कम लागत वाली बनी रहनी चाहिए। उनका तर्क है कि यदि किसी भी स्तर पर अतिरिक्त शुल्क का प्रभाव व्यापारियों पर बढ़ता है, तो उसका अप्रत्यक्ष असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।इसी आधार पर विपक्ष ने सरकार से स्पष्टता की मांग की है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का कहना है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है और सरकार यूपीआई जैसी प्रणालियों को और मजबूत करना चाहती है। सरकार का दावा है कि प्रस्तावित प्रावधानों का उद्देश्य ग्राहकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र (Digital Payment Ecosystem) को दीर्घकालीन रूप से टिकाऊ और सुरक्षित बनाना है।

आगे क्या?

कराधान एवं अन्य विधियां (संशोधन) विधेयक, 2026 पर संसद में चर्चा के दौरान इस मुद्दे पर और बहस होने की संभावना है। विपक्ष सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांग सकता है, जबकि सरकार यह स्पष्ट करने का प्रयास करेगी कि प्रस्तावित बदलावों का वास्तविक प्रभाव क्या होगा। नीतिगत निर्णयों, अधिसूचनाओं और नियमों के अंतिम स्वरूप के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि डिजिटल भुगतान उद्योग, व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर इनका वास्तविक प्रभाव किस प्रकार पड़ेगा।

व्यापारियों से संबंधित व्यवस्था है MDR

UPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। ऐसे में इससे जुड़े किसी भी प्रस्तावित बदलाव पर स्वाभाविक रूप से व्यापक चर्चा होती है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) अंतिम उपभोक्ता पर लागू नहीं होता, बल्कि व्यापारियों से संबंधित व्यवस्था है, और इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान अवसंरचना को अधिक मजबूत बनाना है। दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार से अधिक पारदर्शिता और स्पष्टता की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में संसद में होने वाली चर्चा और सरकार द्वारा जारी आधिकारिक नियमों के आधार पर इस विषय की अंतिम तस्वीर और अधिक स्पष्ट होगी।

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